सतगुर मार्‌या बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि। अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूंटि। चोपडि मांडी चौहटे, अरध उरव बाजार। कहै कबीरा राम जन, खेलौ संत विचार ॥ रात्यूँ रूंनी विरहनीं, ज्यू बंचौ कूं कुज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या विरहा पुज ॥ नैनी नीझरि लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूं पिव पिव करों, कवरू मिलहुगे राम ॥ (UPSC 1994, 20 Marks, )

सतगुर मार्‌या बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि। अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूंटि। चोपडि मांडी चौहटे, अरध उरव बाजार। कहै कबीरा राम जन, खेलौ संत विचार ॥ रात्यूँ रूंनी विरहनीं, ज्यू बंचौ कूं कुज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या विरहा पुज ॥ नैनी नीझरि लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूं पिव पिव करों, कवरू मिलहुगे राम ॥
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पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान। कहिबे कूं सोभा नहीं, देख्याही परवान॥ अगम अगोचर गमि नहीं, तहां जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी, तहां पाप पुन्य नहीं छोति॥ हदे छाड़ि बेहदि गया, हुवा निरंतर बास। कवल ज फूल्या फूल बिन, को निरषै निज दास॥ कबीर मन मधुकर भया, रह्या निरंतर बास। कवल ज्यू फूल्या जलह बिन, को देखै निज दास॥ (UPSC 1991, 20 Marks, )

पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान। कहिबे कूं सोभा नहीं, देख्याही परवान॥ अगम अगोचर गमि नहीं, तहां जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी, तहां पाप पुन्य नहीं छोति॥ हदे छाड़ि बेहदि गया, हुवा निरंतर बास। कवल ज फूल्या फूल बिन, को निरषै निज दास॥ कबीर मन मधुकर भया, रह्या निरंतर बास। कवल ज्यू फूल्या जलह बिन, को देखै निज दास॥
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दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूत॥ (UPSC 1981, 20 Marks, )

दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूत॥
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रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि। देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥ अगनि जू लागि नीर में, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि बिचारि॥ दौ लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह न पालवै सतगुर गया लगाइ॥ देवल माहैं देहुरी, तिल जे है बिस्तार। माहैं पाती माहि जल, माहैं पूजणहार॥ (UPSC 1980, 20 Marks, )

रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि। देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥ अगनि जू लागि नीर में, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि बिचारि॥ दौ लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह न पालवै सतगुर गया लगाइ॥ देवल माहैं देहुरी, तिल जे है बिस्तार। माहैं पाती माहि जल, माहैं पूजणहार॥
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सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजाये नित्त। और न कोई सुणि सके, के साईं क चित्त॥ समंदरं लागी भ्रागि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि: कबीरा जागि, मंछी रुखा चढ़ि गई॥ मन लागा उन मन्न सौ, गगन पहुंचा जाइ। देख्या चंद बिहुंणां चांदिणां तहां. अलख निरंजनराई॥ गगन गरजि अमृत चवे, कदली कवल प्रकास। तहां कबीरा बंदिगी, कै कोई निज दास॥ (UPSC 1979, 20 Marks, )

सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजाये नित्त। और न कोई सुणि सके, के साईं क चित्त॥ समंदरं लागी भ्रागि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि: कबीरा जागि, मंछी रुखा चढ़ि गई॥ मन लागा उन मन्न सौ, गगन पहुंचा जाइ। देख्या चंद बिहुंणां चांदिणां तहां. अलख निरंजनराई॥ गगन गरजि अमृत चवे, कदली कवल प्रकास। तहां कबीरा बंदिगी, कै कोई निज दास॥
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