आप लोगों की नाराज़गी मुझ पर है तो मुझे ही झेलनी चाहिए और अकेले ही झेलनी चाहिए। दूसरों को इसमें साझीदार बनाना तो दूसरों के साथ अन्याय होगा। कुछ समय पहले आप लोगों ने अपना प्यार और विश्वास दिया था मुझे। मैंने सिर-आँखों पर ही लिया था उसे। आज यदि आप अपनी नाराज़गी देंगे तो उसे भी सिर-आँखों पर ही लूँगा। मेरी गलती पर नाराज़ होना आपका अधिकार है और उसे झेलना मेरा कर्तव्य। (UPSC 2009, 20 Marks, )

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