मोहन माँग्यो अपनो रूप। या ब्रज बसत अँचै तुम बैठीं, ता बिनु तहाँ निरूप। मेरो मन, मेरो अलि ! लोचन लै जो गए धुपधूप। हमसो बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप।। अपनो काज सँवारि सूर, सुनु, हमहि बतावत कूप। लेवा-देइ बराबर में है, कौन रंक को भूप।। (UPSC 1996, 20 Marks, )

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