संत-साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप की चर्चा कीजिए। (UPSC 2023, 15 Marks, )

Theme: संत-साहित्य में खड़ी बोली का स्वरूप Where in Syllabus: (Hindi Literature)
संत-साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप की चर्चा कीजिए।

Introduction

संत-साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप भारतीय साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कबीर, तुलसीदास, और सूरदास जैसे संत कवियों ने इसे अपनी रचनाओं में अपनाया, जिससे यह जनमानस के बीच लोकप्रिय हुई। खड़ी बोली की सरलता और स्पष्टता ने इसे धार्मिक और सामाजिक संदेशों के प्रसार का सशक्त माध्यम बनाया। रामचंद्र शुक्ल ने इसे जनभाषा के रूप में मान्यता दी, जो साहित्यिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनी।

संत-साहित्य में खड़ी बोली का स्वरूप

 ● खड़ी बोली का उद्भव:  
        ○ खड़ी बोली का आधुनिक साहित्य भारतेंदु युग (1857-1900 ई.) की देन है।
        ○ मध्यकालीन भक्ति और शृंगार की भाषा ब्रजभाषा रही, लेकिन जनजागरण और समाज सुधार संबंधी काव्य खड़ी बोली में लिखा गया।
  ● सधुक्कड़ी खड़ी बोली:  
        ○ 18वीं शताब्दी से प्रचलित सधुक्कड़ी खड़ी बोली में संतों की वाणी रचित हुई।
        ○ इसे 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, जो कई स्थानों की भाषाओं के संयोग से निर्मित हुई।
  ● संत साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग:  
        ○ संत साहित्य की प्रारंभिक रचनाओं में राजस्थानी एवं पूर्वी हिन्दी का प्रयोग अधिक था।
        ○ संत साहित्य के उत्तरार्द्ध में खड़ी बोली का प्रभाव अधिक स्पष्ट हुआ।
  ● उदाहरण:  
        ○ मलूकदास का दोहा:
          ○ **"अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
        दास मलूका कह गए सबके दाता राम।"**
          ○ इस दोहे में 'काम', 'दाता', 'गए', 'कहा', 'अजगर', 'सबके' जैसे शब्द खड़ी बोली के हैं।
  ● रीतिकालीन संत कवि:  
        ○ दरिया साहब, पलटू साहब, यारी साहब जैसे संत कवियों की भाषा खड़ी बोली के निकट थी।
        ○ उदाहरण:
          ○ **"जात हमारी ब्रह्म है, मात पिता हैं राम
        गिरह हमारा सुन्न में, अनहद में बिसराम।"**
          ○ इस उदाहरण में खड़ी बोली की अकारांतता और अधिकरण कारक 'में' का प्रयोग देखा जा सकता है।
  ● खड़ी बोली की विशेषताएँ:  
        ○ खड़ी बोली में व्याकरणिक आधार और शब्दावली का प्रयोग संत साहित्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
        ○ संत साहित्य ने खड़ी बोली के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Conclusion

संत-साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली ने भारतीय साहित्य को एक नया आयाम दिया। कबीर, तुलसीदास और सूरदास जैसे संतों ने इसे जनमानस की भाषा बनाया। खड़ी बोली की सरलता और स्पष्टता ने इसे व्यापक रूप से स्वीकार्य बनाया। रामचंद्र शुक्ल ने इसे "जनभाषा का स्वरूप" कहा। आगे बढ़ते हुए, खड़ी बोली का साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व बढ़ता गया, जिससे यह आधुनिक हिंदी साहित्य की नींव बनी। इसका विकास और प्रसार आज भी जारी है।