खड़ी बोली के विकास में संत साहित्य की भूमिका।
(UPSC 2020, 10 Marks, )
Theme:
संत साहित्य और खड़ी बोली का विकास
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
खड़ी बोली के विकास में संत साहित्य की भूमिका।
खड़ी बोली के विकास में संत साहित्य की भूमिका।
(UPSC 2020, 10 Marks, )
Theme:
संत साहित्य और खड़ी बोली का विकास
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
खड़ी बोली के विकास में संत साहित्य की भूमिका।
Introduction
खड़ी बोली के विकास में संत साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संत कवियों जैसे कबीर, रैदास, और तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में खड़ी बोली का प्रयोग कर इसे जनमानस तक पहुँचाया। इनकी रचनाएँ सरल और प्रभावी भाषा में थीं, जिससे खड़ी बोली को साहित्यिक मान्यता मिली। रामचरितमानस और साखी जैसे ग्रंथों ने खड़ी बोली को लोकप्रिय बनाया, जिससे यह हिंदी साहित्य की प्रमुख भाषा बनी।
संत साहित्य और खड़ी बोली का विकास
● खड़ी बोली का विकास: खड़ी बोली, जिसे वर्तमान हिंदी का पूर्व रूप माना जाता है, का विकास संत साहित्य के माध्यम से हुआ। यह बोली संस्कृत, फारसी, और अरबी के शब्दों के मिश्रण से बनी है।
● संत साहित्य की भूमिका: संत साहित्य ने खड़ी बोली के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संतों ने सधुक्कड़ी शैली में रचनाएँ कीं, जो खड़ी बोली और राजस्थानी के मिश्रण पर आधारित थी।
● द्विविध शैली: संत साहित्य में द्विविध शैली का उपयोग किया गया, जिसमें सगुण भक्ति के पद ब्रज भाषा में और निर्गुण बानी खड़ी बोली या सधुक्कड़ी में लिखी गई।
● भाषागत विविधता: सधुक्कड़ी शैली में राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली, और पूर्वी के रूपों का मिश्रण मिलता है।
● भौगोलिक प्रभाव: खड़ी बोली का संबंध कुरु-जनपद से था, और यह शैली दिल्ली के आसपास पनप रही थी। मुस्लिम काल में इस क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व बढ़ा, जिससे खड़ी बोली को प्रचार और प्रोत्साहन मिला।
● मुस्लिम लेखकों का योगदान: खड़ी बोली को अपनाने और लोकप्रिय बनाने में मुस्लिम लेखकों का योगदान महत्वपूर्ण था।
● नाथ-योगी परंपरा: आरंभिक नाथ-योगी परंपरा में शुद्ध सधुक्कड़ी की परंपरा मिलती है। गोरखबानी की भाषा-शैली की मूल संरचना खड़ी बोली की है।
● भक्ति आंदोलन: भक्ति आंदोलन के सगुणवादी पक्ष ने ब्रज भाषा को अपनाया, जबकि निर्गुणवादी पक्ष ने सधुक्कड़ी को अपने प्रचार का माध्यम बनाया।
● सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव: संत साहित्य ने सामाजिक खंडन-मंडन और निर्गुण चर्चा जैसे विषयों को प्रस्तुत करने के लिए खड़ी बोली को माध्यम बनाया।
● पुनरुत्थान: मध्यकाल के नाथ-संतों और मुस्लिम कवियों ने खड़ी बोली की शैली का पुनरुत्थान किया, जिससे यह भाषा साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हुई।
इन बिंदुओं के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संत साहित्य ने खड़ी बोली के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे यह भाषा आज की राष्ट्रभाषा हिंदी के रूप में विकसित हुई।
● संत साहित्य की भूमिका: संत साहित्य ने खड़ी बोली के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संतों ने सधुक्कड़ी शैली में रचनाएँ कीं, जो खड़ी बोली और राजस्थानी के मिश्रण पर आधारित थी।
● द्विविध शैली: संत साहित्य में द्विविध शैली का उपयोग किया गया, जिसमें सगुण भक्ति के पद ब्रज भाषा में और निर्गुण बानी खड़ी बोली या सधुक्कड़ी में लिखी गई।
● भाषागत विविधता: सधुक्कड़ी शैली में राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली, और पूर्वी के रूपों का मिश्रण मिलता है।
● भौगोलिक प्रभाव: खड़ी बोली का संबंध कुरु-जनपद से था, और यह शैली दिल्ली के आसपास पनप रही थी। मुस्लिम काल में इस क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व बढ़ा, जिससे खड़ी बोली को प्रचार और प्रोत्साहन मिला।
● मुस्लिम लेखकों का योगदान: खड़ी बोली को अपनाने और लोकप्रिय बनाने में मुस्लिम लेखकों का योगदान महत्वपूर्ण था।
● नाथ-योगी परंपरा: आरंभिक नाथ-योगी परंपरा में शुद्ध सधुक्कड़ी की परंपरा मिलती है। गोरखबानी की भाषा-शैली की मूल संरचना खड़ी बोली की है।
● भक्ति आंदोलन: भक्ति आंदोलन के सगुणवादी पक्ष ने ब्रज भाषा को अपनाया, जबकि निर्गुणवादी पक्ष ने सधुक्कड़ी को अपने प्रचार का माध्यम बनाया।
● सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव: संत साहित्य ने सामाजिक खंडन-मंडन और निर्गुण चर्चा जैसे विषयों को प्रस्तुत करने के लिए खड़ी बोली को माध्यम बनाया।
● पुनरुत्थान: मध्यकाल के नाथ-संतों और मुस्लिम कवियों ने खड़ी बोली की शैली का पुनरुत्थान किया, जिससे यह भाषा साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हुई।
इन बिंदुओं के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संत साहित्य ने खड़ी बोली के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे यह भाषा आज की राष्ट्रभाषा हिंदी के रूप में विकसित हुई।
Conclusion
खड़ी बोली के विकास में संत साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संत कवियों जैसे कबीर, तुलसीदास और सूरदास ने इसे जनमानस की भाषा बनाया। इनकी रचनाओं ने खड़ी बोली को साहित्यिक मान्यता दिलाई। रामचरितमानस और सूरसागर जैसे ग्रंथों ने इसे लोकप्रियता दी। महात्मा गांधी ने कहा था, "भाषा का विकास समाज के विकास का दर्पण है।" आगे बढ़ने के लिए, हमें संत साहित्य की समृद्ध परंपरा को संरक्षित और प्रचारित करना चाहिए।