दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (UPSC 2018, 15 Marks, )

Theme: दक्खिनी हिन्दी की विशेषताएँ और पहचान Where in Syllabus: (The subject of the above question is "Linguistics.")
दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Introduction

दक्खिनी हिन्दी एक महत्वपूर्ण भाषा रूप है, जो मुख्यतः दक्षिण भारत में विकसित हुई। यह भाषा 14वीं शताब्दी में बहमनी सल्तनत के दौरान उभरी। अमीर खुसरो और विलियम ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने इसके विकास में योगदान दिया। दक्खिनी हिन्दी में उर्दू और फारसी के प्रभाव स्पष्ट हैं, और यह भाषा सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रतीक है। इसकी विशेषताएँ इसे अन्य हिन्दी रूपों से अलग बनाती हैं।

दक्खिनी हिन्दी की विशेषताएँ और पहचान

 ● भाषाई मिश्रण: दक्खिनी हिन्दी में दिल्ली के इर्द-गिर्द बोली जा रही बोलियों के शब्द और शैलियों का दक्षिण के स्थानीय शब्दों और शैलियों के साथ अद्भुत मिश्रण मिलता है। यह भाषा में खाई पैदा करता है।  
  ● सैनिक और प्रशासनिक प्रभाव: दक्खिनी हिन्दी का विकास सैनिक कार्यवाहियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के चलते हुआ। मो. तुगलक द्वारा दौलताबाद को राजधानी बनाने के बाद एक बड़ा जन स्थानांतरण हुआ, जिससे भाषा का फ्यूजन शुरू हुआ।  
  ● सूफी-संतों का योगदान: दक्खिनी हिन्दी के निर्माण में सूफी-संतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जो दक्षिण में धर्म प्रचार के लिए गए और वहां बसे।  
  ● भाषाई क्षेत्र: इसका बोली क्षेत्र नर्मदा के दक्षिण में, सतपुड़ा की श्रृंखलाओं और उनसे संबंधित पहाड़ियों से घिरे क्षेत्र के साथ-साथ मद्रास, केरल, आन्ध्र, महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों को लेकर निर्मित होता है।  
  ● ध्वनि विशेषताएँ: महाप्राण ध्वनियों का अल्पप्राणत्व जैसे "मुझ" को "मुज", "पारखी" को "पारकी"।  
  ● बहुवचन रूप: सभी कारकों में बहुवचन प्रायः अकारान्त शब्दों के विकारी रूप अकारान्त होते हैं, जैसे "बातां के बन्दां", "दोस्तां ने बोले हैं"।  
  ● सर्वनाम रूप: दक्खिनी हिन्दी में सर्वनाम रूप जैसे "जो", "तो", "जाकी", "हम", "हमन", "तुमन" का प्रयोग होता है।  
  ● कर्तवाचक परसर्ग: "ने" का प्रचलन हो गया था, पर खड़ी बोली हिन्दी की तरह प्रयोगकर्ता मात्र के साथ निश्चित नहीं था, जैसे "दोस्तां ने बोले हैं"।  
  ● कर्मवाचक परसर्ग: "को" मिलता है, लेकिन अधिकांशतः उसका सानुनासिक रूप "को" ही प्रचलित था, जैसे "किसी को मैं मिले"।  
  ● व्याकरणिक मिश्रण: दक्खिनी भाषा का व्याकरण पंजाबी, अवधी, हरियाणवी, ब्रज, मराठी का मिश्रण लगता है और इस बोली के आधार में खड़ी बोली निःसंदेह सिद्ध होती है।  
  ● प्रारम्भिक साहित्य: दक्खिनी हिन्दी में काव्य से पूर्व गद्य रचा गया। इसके प्रथम ग्रंथाकार ख्वाजा बंदानबाज गेसूरदाज हैं और प्रथम ग्रंथ "मिराजुल आशिकीनी" है।  

Conclusion

दक्खिनी हिन्दी की विशेषताएँ इसे अन्य भाषाओं से अलग बनाती हैं। यह उर्दू और मराठी के प्रभाव से समृद्ध है। इसकी शब्दावली में फारसी और अरबी के शब्द शामिल हैं। ग्राम्य और लोकगीत शैली में इसकी अभिव्यक्ति होती है। डॉ. गणेश देवी के अनुसार, "दक्खिनी हिन्दी भारतीय भाषाई विविधता का अनूठा उदाहरण है।" इसके संरक्षण और अध्ययन से भाषाई धरोहर को सहेजने का मार्ग प्रशस्त होता है। भविष्य में इसके व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता है।