सन्त-साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
(UPSC 2014, 15 Marks, )
Theme:
सन्त-साहित्य का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व
Where in Syllabus:
(Indian Literature)
सन्त-साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
सन्त-साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
(UPSC 2014, 15 Marks, )
Theme:
सन्त-साहित्य का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व
Where in Syllabus:
(Indian Literature)
सन्त-साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
Introduction
सन्त-साहित्य भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो भक्ति आंदोलन के दौरान उभरा। कबीर, तुलसीदास, और मीराबाई जैसे संतों ने इसे समृद्ध किया। यह साहित्य सामाजिक समरसता, आध्यात्मिकता, और मानवता के मूल्यों को बढ़ावा देता है। डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे भारतीय समाज के नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार माना। सन्त-साहित्य ने भाषा और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सन्त-साहित्य का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व
● संत काव्यधारा: यह निर्गुण काव्यधारा की ज्ञानाश्रयी शाखा है, जिसमें कबीरदास, गुरूनानक, दादूदयाल, सुन्दरदास, रज्जब आदि प्रमुख कवि हैं। ये कवि निर्गुण ब्रह्म के प्रति आस्था रखते थे और भक्ति मार्ग को अपनाते थे।
● जाति-पाति का विरोध: संत कवियों ने समाज में व्याप्त जाति-पाति जैसी कुरूतियों का विरोध किया। उदाहरण के लिए, कबीरदास ने कहा:
○ "जाति-पाति पूछे नहीं कोई। हरि का भजे सो हरि का होई।"
● धार्मिक आडम्बरों का विरोध: संत कवियों ने धर्म के नाम पर फैले आडम्बरों का विरोध किया। उदाहरण:
○ "कोकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लेई बनाए। तौ चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।"
● अनुभव की प्रमाणिकता: संत कवि शास्त्र की अपेक्षा अनुभव को प्रमाणिक मानते थे। उन्होंने सामाजिक कुरितियों का विरोध किया और आडम्बरों पर तार्किक प्रश्न उठाए।
● भाषा और शिल्प: संत कवियों की भाषा सरल, मर्मस्पर्शी और उत्कृष्ट थी। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संतकाव्य को आधुनिक साहित्यिक प्रतिमान पर तौलने पर बल दिया और कबीर को "भाषा का डिटेक्टर" कहा।
● सामाजिक प्रभाव: संत कवियों ने उपेक्षित दलित समाज के अंदर आत्मविश्वास भरा और समाज में करूणा, दया, प्रेम जैसे सात्विक मूल्यों को बढ़ावा दिया।
● काव्य का विकास: संतकाव्य धारा ने प्रचलित शास्त्रीय प्रतिमानों की अपेक्षा करते हुए नई धारा में काव्य रचा, जिसने आगे चलकर मुक्तक छंद और स्वच्छद काव्य जैसी काव्यधारा का विकास किया।
● जाति-पाति का विरोध: संत कवियों ने समाज में व्याप्त जाति-पाति जैसी कुरूतियों का विरोध किया। उदाहरण के लिए, कबीरदास ने कहा:
○ "जाति-पाति पूछे नहीं कोई। हरि का भजे सो हरि का होई।"
● धार्मिक आडम्बरों का विरोध: संत कवियों ने धर्म के नाम पर फैले आडम्बरों का विरोध किया। उदाहरण:
○ "कोकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लेई बनाए। तौ चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।"
● अनुभव की प्रमाणिकता: संत कवि शास्त्र की अपेक्षा अनुभव को प्रमाणिक मानते थे। उन्होंने सामाजिक कुरितियों का विरोध किया और आडम्बरों पर तार्किक प्रश्न उठाए।
● भाषा और शिल्प: संत कवियों की भाषा सरल, मर्मस्पर्शी और उत्कृष्ट थी। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संतकाव्य को आधुनिक साहित्यिक प्रतिमान पर तौलने पर बल दिया और कबीर को "भाषा का डिटेक्टर" कहा।
● सामाजिक प्रभाव: संत कवियों ने उपेक्षित दलित समाज के अंदर आत्मविश्वास भरा और समाज में करूणा, दया, प्रेम जैसे सात्विक मूल्यों को बढ़ावा दिया।
● काव्य का विकास: संतकाव्य धारा ने प्रचलित शास्त्रीय प्रतिमानों की अपेक्षा करते हुए नई धारा में काव्य रचा, जिसने आगे चलकर मुक्तक छंद और स्वच्छद काव्य जैसी काव्यधारा का विकास किया।
Conclusion
सन्त-साहित्य भारतीय संस्कृति का अमूल्य धरोहर है, जो समाज में समानता, प्रेम और भक्ति का संदेश देता है। कबीर, तुलसीदास, और सूरदास जैसे संतों ने अपने काव्य के माध्यम से सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा दिया। महात्मा गांधी ने भी संत साहित्य को प्रेरणा का स्रोत माना। आज के संदर्भ में, यह साहित्य सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना में सहायक हो सकता है। "संत वाणी अमृत वाणी" का अनुसरण कर हम समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।