रहीम की कविता की प्रासंगिकता। (UPSC 2022, 10 Marks, )

Theme: रहीम की कविताओं की आधुनिक प्रासंगिकता Where in Syllabus: (Hindi Literature)
रहीम की कविता की प्रासंगिकता।

Introduction

रहीम की कविताएँ आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे मानवीय मूल्यों और नैतिकता पर जोर देती हैं। रहीम के दोहे जीवन के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, रहीम की रचनाएँ समाज में सद्भाव और सहिष्णुता को बढ़ावा देती हैं। उनकी कविताएँ आज के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी मार्गदर्शन प्रदान करती हैं, जिससे वे समयातीत बन जाती हैं।

रहीम की कविताओं की आधुनिक प्रासंगिकता

 ● भक्तिकाल के नीतिकाव्यधारा: रहीम के नीति विषयक दोहे इस धारा के आधार स्तम्भ हैं। उनकी दोहावली में नीति अनुभवों से पिरोये हुए कथन उपलब्ध हैं, जो सरलता और भावप्रवणता के कारण मनुष्य के हृदय में विशेष स्थान रखते हैं।  
  ● मित्रता का महत्व: रहीम के अनुसार, मित्रता एक विश्वास की डोर से बंधी होती है। विपत्ति के समय ही सच्चे मित्रों की पहचान होती है। उदाहरण के लिए, रहीम कहते हैं, "रहिमन विपदा हूं भली, जो थोड़े दिन होय। हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।"  
  ● सम्पत्ति और सगे-संबंधी: रहीम बताते हैं कि धान-सम्पत्ति के समय अनेक सगे-संबंधी बन जाते हैं, लेकिन विपत्ति में ही उनकी सच्चाई का पता चलता है। "कहि रहीम सम्पत्ति सगे, बनत बहुत बहुत रीति। बिपत्ति कसौटी जे कसे, ते ही सांचे मीत।"  
  ● कटु वचन का त्याग: रहीम माघर वचनों के महत्त्व और कटु वचनों के त्याग पर बल देते हैं। वे कहते हैं, "खीरा सिर ते काटिए, मलियत नमक लगाय। रहिमन करुए मुखन को, चहिअत इहै सजाय।"  
  ● भाग्य की प्रबलता: रहीम के अनुसार, मनुष्य का भाग्य अदृश्य हाथों द्वारा संचालित होता है। "ज्यों नाचत कठपुतरी, करम नचावत गात। अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ।"  
  ● समकालीन प्रासंगिकता: रहीम के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे जीवन की समस्याओं का समाधान नैतिक मार्ग पर चलकर प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं। वर्तमान समय में, जब लोग समस्याओं के समाधान हेतु अनैतिक मार्ग अपनाने से नहीं हिचकते, रहीम के दोहे एक आदर्श सफलता का मार्ग दिखाते हैं।  

Conclusion

रहीम की कविताएँ आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे मानवीय मूल्यों, सद्भाव और नैतिकता की बात करती हैं। उनकी रचनाएँ जैसे "रहिमन धागा प्रेम का" आज के समाज में भी संबंधों की गहराई को समझने में मदद करती हैं। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। रहीम की कविताएँ हमें आत्मनिरीक्षण और सामाजिक सुधार की दिशा में प्रेरित करती हैं। उनके विचारों को अपनाकर हम एक बेहतर समाज की ओर बढ़ सकते हैं।