सिद्धनाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप।
(UPSC 2016, 10 Marks, )
Theme:
सिद्धनाथ साहित्य में खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
सिद्धनाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप।
सिद्धनाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप।
(UPSC 2016, 10 Marks, )
Theme:
सिद्धनाथ साहित्य में खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप
Where in Syllabus:
(Hindi Literature)
सिद्धनाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप।
Introduction
सिद्धनाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप 14वीं शताब्दी में विकसित हुआ। इस काल में अमीर खुसरो ने खड़ी बोली को साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। खुसरो के बाद, कबीर और रैदास जैसे संत कवियों ने इसे अपनाया। खड़ी बोली की विशेषता इसकी सरलता और स्पष्टता है, जिसने इसे जनमानस में लोकप्रिय बनाया। इसने हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सिद्धनाथ साहित्य में खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप
● सिद्ध साहित्य: सिद्ध साहित्य का विकास 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच हुआ। यह साहित्य बौद्ध धर्म के वज्रयान तत्व का प्रचार करने के लिए लिखा गया था। इसमें सहज-सुबोध दोहे और गेयात्मक चर्यापदों का उपयोग किया गया।
● भाषा का स्वरूप: सिद्ध साहित्य की भाषा समकालीन प्राकृत और अपभ्रंश की भाषिक प्रवृत्तियों का अनुकरण करती है। इसमें अवधी, ब्रज, राजस्थानी और कौरवी (जो परवर्ती खड़ी बोली है) जैसी लोक बोलियों के तत्व शामिल हैं।
● उदाहरण:
○ "नाद न बिन्दु न रवि न शशि मंडल"
○ "चिअराअ सहाबे मूकल"
● सरहपा की भाषा: सरहपा की भाषा सरल और गेय है। उनके काव्य में भावों का सहज प्रवाह मिलता है। यह भाषा हिन्दी है, लेकिन उस पर अपभ्रंश का प्रभाव है।
● नाथ-सिद्ध साहित्य: सिद्धों की वामभार्गी भोगप्रधान योगसाधना की प्रतिक्रिया के रूप में नाथ-सिद्ध साहित्य का विकास हुआ। गोरखनाथ को नाथ-साहित्य का आरंभकर्ता माना जाता है। उनकी रचनाओं में गुरु-महिमा, इन्द्रिय-निग्रह, प्राण-साधना, वैराग्य, और कुंडलिनी जागरण का वर्णन है।
● गोरखनाथ के उदाहरण:
○ "नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा"
○ "ऐसे मन लै जोगी खैले, तब अंतरि बसै भंडारा।"
● जलंधरनाथ: जलंधरनाथ ने अमीरों और गरीबों के बीच मध्यमार्ग को आर्थिक और सामाजिक मुक्ति का मार्ग बताया। उदाहरण:
○ "थोरो खाय सो कलपै इझलपै, घनौ खाय सो रोगी"
○ "दहू पंसा कि संधि विचारै ते कोई विरला जोगी।"
इन बिंदुओं से स्पष्ट होता है कि सिद्ध साहित्य में खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप विभिन्न लोक बोलियों के तत्वों को समाहित करते हुए विकसित हुआ।
● भाषा का स्वरूप: सिद्ध साहित्य की भाषा समकालीन प्राकृत और अपभ्रंश की भाषिक प्रवृत्तियों का अनुकरण करती है। इसमें अवधी, ब्रज, राजस्थानी और कौरवी (जो परवर्ती खड़ी बोली है) जैसी लोक बोलियों के तत्व शामिल हैं।
● उदाहरण:
○ "नाद न बिन्दु न रवि न शशि मंडल"
○ "चिअराअ सहाबे मूकल"
● सरहपा की भाषा: सरहपा की भाषा सरल और गेय है। उनके काव्य में भावों का सहज प्रवाह मिलता है। यह भाषा हिन्दी है, लेकिन उस पर अपभ्रंश का प्रभाव है।
● नाथ-सिद्ध साहित्य: सिद्धों की वामभार्गी भोगप्रधान योगसाधना की प्रतिक्रिया के रूप में नाथ-सिद्ध साहित्य का विकास हुआ। गोरखनाथ को नाथ-साहित्य का आरंभकर्ता माना जाता है। उनकी रचनाओं में गुरु-महिमा, इन्द्रिय-निग्रह, प्राण-साधना, वैराग्य, और कुंडलिनी जागरण का वर्णन है।
● गोरखनाथ के उदाहरण:
○ "नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा"
○ "ऐसे मन लै जोगी खैले, तब अंतरि बसै भंडारा।"
● जलंधरनाथ: जलंधरनाथ ने अमीरों और गरीबों के बीच मध्यमार्ग को आर्थिक और सामाजिक मुक्ति का मार्ग बताया। उदाहरण:
○ "थोरो खाय सो कलपै इझलपै, घनौ खाय सो रोगी"
○ "दहू पंसा कि संधि विचारै ते कोई विरला जोगी।"
इन बिंदुओं से स्पष्ट होता है कि सिद्ध साहित्य में खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप विभिन्न लोक बोलियों के तत्वों को समाहित करते हुए विकसित हुआ।
Conclusion
सिद्धनाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप हिंदी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इस साहित्य में खड़ी बोली के प्रारंभिक रूप का उपयोग देखा जाता है, जो बाद में आधुनिक हिंदी का आधार बना। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, "सिद्ध साहित्य ने हिंदी भाषा को एक नई दिशा दी।" इस साहित्य के अध्ययन से भाषा के विकास की प्रक्रिया को समझा जा सकता है और यह भविष्य में भाषा अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।