रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि। देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥ अगनि जू लागि नीर में, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि बिचारि॥ दौ लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह न पालवै सतगुर गया लगाइ॥ देवल माहैं देहुरी, तिल जे है बिस्तार। माहैं पाती माहि जल, माहैं पूजणहार॥ (UPSC 1980, 20 Marks, )

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