यद्यपि हताहत गात में कुछ सांस अब भी आ रही, पर सोच पूर्वापर दशा मुंह से निकलता है यही— जिसकी अलौकिक कीर्ति से उज्ज्वल हुई सारी मही, था जो जगत का मुकुट, है क्या हाय ! यह भारत वही? अब कमल क्या, जल तक नहीं, सर मध्य केवल पङ्क है वह राज राज कुबेर अब हा रङ्क का भी रङ्क है।
(UPSC 2003, 20 Marks, )
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यद्यपि हताहत गात में कुछ सांस अब भी आ रही, पर सोच पूर्वापर दशा मुंह से निकलता है यही— जिसकी अलौकिक कीर्ति से उज्ज्वल हुई सारी मही, था जो जगत का मुकुट, है क्या हाय ! यह भारत वही? अब कमल क्या, जल तक नहीं, सर मध्य केवल पङ्क है वह राज राज कुबेर अब हा रङ्क का भी रङ्क है।
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