मैं सोचता हूं कि यद्यपि हमारा सिद्धान्त इस बात को स्वतः मान लेता है कि मानव की प्रत्येक प्रेरणा किसी भौतिक जरूरत से उत्पन्न होती है, तथापि हम इस बात में भी अखण्ड विश्वास करते हैं कि मानव में कोई ऊर्ध्वगामी शक्ति है, कोई नसर्गिक सत्प्रेरणा! इन दो परस्पर विरोधी मूल तत्वों का हल करना ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसके हल हो जाने के बाद अन्य प्रश्नों का तो कोई विशेष महत्व रहता ही नहीं; पर यह एक प्रश्न ही इतना बड़ा, इतना गूढ़ और इतना व्यापक है कि हमें पद-पद पर इसके उदाहरण मिलते हैं, हम सारा जीवन ही इसके हल में बिता देते हैं, और फिर भी समस्या वैसी ही रह जानी है। (UPSC 1983, 20 Marks, )

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