आज तक वे भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच टुकड़े-टुकड़े हो कर हमेशा घुटने ही टेकते आए हैं। हर बार दिनेश को लड़ाई के मैदान में ले तो ज़रूर गए हैं, पर जैसे ही गोलियाँ चली हैं, उसे वहीं छोड़कर भाग आए हैं अकेला, निहत्था। वह गोलियों की बौछार से लहूलुहान होता रहा है और ये ख़ुद एक असह्य अपराध-बोध से।
(UPSC 2024, 10 Marks, )
आज तक वे भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच टुकड़े-टुकड़े हो कर हमेशा घुटने ही टेकते आए हैं। हर बार दिनेश को लड़ाई के मैदान में ले तो ज़रूर गए हैं, पर जैसे ही गोलियाँ चली हैं, उसे वहीं छोड़कर भाग आए हैं अकेला, निहत्था। वह गोलियों की बौछार से लहूलुहान होता रहा है और ये ख़ुद एक असह्य अपराध-बोध से।
आज तक वे भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच टुकड़े-टुकड़े हो कर हमेशा घुटने ही टेकते आए हैं। हर बार दिनेश को लड़ाई के मैदान में ले तो ज़रूर गए हैं, पर जैसे ही गोलियाँ चली हैं, उसे वहीं छोड़कर भाग आए हैं अकेला, निहत्था। वह गोलियों की बौछार से लहूलुहान होता रहा है और ये ख़ुद एक असह्य अपराध-बोध से।
(UPSC 2024, 10 Marks, )