आज तक वे भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच टुकड़े-टुकड़े हो कर हमेशा घुटने ही टेकते आए हैं। हर बार दिनेश को लड़ाई के मैदान में ले तो ज़रूर गए हैं, पर जैसे ही गोलियाँ चली हैं, उसे वहीं छोड़कर भाग आए हैं अकेला, निहत्था। वह गोलियों की बौछार से लहूलुहान होता रहा है और ये ख़ुद एक असह्य अपराध-बोध से। (UPSC 2024, 10 Marks, )

आज तक वे भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच टुकड़े-टुकड़े हो कर हमेशा घुटने ही टेकते आए हैं। हर बार दिनेश को लड़ाई के मैदान में ले तो ज़रूर गए हैं, पर जैसे ही गोलियाँ चली हैं, उसे वहीं छोड़कर भाग आए हैं अकेला, निहत्था। वह गोलियों की बौछार से लहूलुहान होता रहा है और ये ख़ुद एक असह्य अपराध-बोध से।
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मैं फिर काम शुरू करूंगा यहीं इसी गाँव में, मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी धरती पर प्यार के पौधे लहलहायेंगे। मैं साधना करूँगा, ग्रामवासिनी भारतमाता के मैले आँचल तले। कम से कम एक ही गाँव के कुछ प्राणियों के मुरझाये ओठों पर मुस्कराहट लौटा सकूँ। उनके हृदय में आशा और विश्वास को प्रतिष्ठित कर सकूँ। (UPSC 2017, 10 Marks, )

मैं फिर काम शुरू करूंगा यहीं इसी गाँव में, मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी धरती पर प्यार के पौधे लहलहायेंगे। मैं साधना करूँगा, ग्रामवासिनी भारतमाता के मैले आँचल तले। कम से कम एक ही गाँव के कुछ प्राणियों के मुरझाये ओठों पर मुस्कराहट लौटा सकूँ। उनके हृदय में आशा और विश्वास को प्रतिष्ठित कर सकूँ।
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“विद्यापति कवि के गान कहाँ?" बहुत दिनों बाद मन में उलझे हुए उस प्रश्न का जवाब दिया — ज़िंदगी-भर बेगारी खटने वाले, अपढ़ गँवार और अर्धनग्नों में, कवि! तुम्हारे विद्यापति के गान हमारी टूटी झोपड़ियों में ज़िंदगी के मधुरस बरसा रहे हैं। — ओ कवि! तुम्हारी कविता ने मचल कर एक दिन कहा था — चलो कवि, बनफूलों की ओर! (UPSC 2014, 10 Marks, )

“विद्यापति कवि के गान कहाँ?" बहुत दिनों बाद मन में उलझे हुए उस प्रश्न का जवाब दिया — ज़िंदगी-भर बेगारी खटने वाले, अपढ़ गँवार और अर्धनग्नों में, कवि! तुम्हारे विद्यापति के गान हमारी टूटी झोपड़ियों में ज़िंदगी के मधुरस बरसा रहे हैं। — ओ कवि! तुम्हारी कविता ने मचल कर एक दिन कहा था — चलो कवि, बनफूलों की ओर!
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यह अंधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है—पवित्र वाणी। उन्हें प्रकाश मिल गया है। तेजोमय! क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चन्दन लेप रहा है। प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय! विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बढ़कर शक्तिशाली है। उसको पराजित करना असम्भव है। प्रचण्ड शक्तिशाली बमों से भी नहीं ...... पगला आदमी आदमी है, गिनीपिग नहीं। ..... सबरि ऊपर मानुस सत्य! (UPSC 2005, 20 Marks, )

यह अंधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है—पवित्र वाणी। उन्हें प्रकाश मिल गया है। तेजोमय! क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चन्दन लेप रहा है। प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय! विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बढ़कर शक्तिशाली है। उसको पराजित करना असम्भव है। प्रचण्ड शक्तिशाली बमों से भी नहीं ...... पगला आदमी आदमी है, गिनीपिग नहीं। ..... सबरि ऊपर मानुस सत्य!
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आज तक वे भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच टुकड़े-टुकड़े हो कर हमेशा घुटने ही टेकते आए हैं। हर बार दिनेश को लड़ाई के मैदान में ले तो ज़रूर गए हैं, पर जैसे ही गोलियाँ चली हैं, उसे वहीं छोड़कर भाग आए हैं अकेला, निहत्था। वह गोलियों की बौछार से लहूलुहान होता रहा है और ये ख़ुद एक असह्य अपराध-बोध से।
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मैं फिर काम शुरू करूंगा यहीं इसी गाँव में, मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी धरती पर प्यार के पौधे लहलहायेंगे। मैं साधना करूँगा, ग्रामवासिनी भारतमाता के मैले आँचल तले। कम से कम एक ही गाँव के कुछ प्राणियों के मुरझाये ओठों पर मुस्कराहट लौटा सकूँ। उनके हृदय में आशा और विश्वास को प्रतिष्ठित कर सकूँ।
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यह अंधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है—पवित्र वाणी। उन्हें प्रकाश मिल गया है। तेजोमय! क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चन्दन लेप रहा है। प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय! विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बढ़कर शक्तिशाली है। उसको पराजित करना असम्भव है। प्रचण्ड शक्तिशाली बमों से भी नहीं ...... पगला आदमी आदमी है, गिनीपिग नहीं। ..... सबरि ऊपर मानुस सत्य!
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