“चन्द्रगुप्त” नाटक में जहाँ एक ओर पात्रों को स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान किया गया है, वहीं उनके अंतर्द्वंद्व एवं बहिर्द्वंद्व के मर्म को भी उद्घाटित किया गया है।” इस उक्ति के सन्दर्भ में नाटक के प्रमुख पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का विवेचन कीजिए। (UPSC 1981, 55 Marks, )

Enroll Now