"नील कमल की तरह कोमल और आर्द्र, वायु की तरह हल्का और स्वप्न की तरह चित्रमय मैं चाहती थी उसे अपने में भर लूँ और आँखें मूँद लूँ। मेरा तों शरीर भी निचुड़ रहा है माँ ! कितना पानी इन वस्त्रों ने पिया है! ओह ! शीत की चुभन के बाद उष्णता का यह स्पर्श !" (‘आषाढ़ का एक दिन’ मोहन राकेश, पृष्ठ 8) (UPSC 2000, 20 Marks, )

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