जोग ठगौरी व्रज न बिकेहै। यह व्योपार तिहारो ऊधो एसोई फिरि जैहै।। जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै। दाख छाँडिके कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै? मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै? सूरदास प्रभु गुनहिं छाँडिकै को निर्गुन निरबैहै?
(UPSC 2005, 20 Marks, )