पर्चा पढ़ते हुए उड़ता हूँ हवा में, चक्रवात-गतियों में घूमता हूँ नभ पर, ज़मीन पर एक साथ सर्वत्र सचेत उपस्थित। प्रत्येक स्थान पर लगा हूँ मैं काम में, प्रत्येक चौराहे, दुराहे व राहों के मोड़ पर सड़क पर खड़ा हूँ, मानता हूँ, मानता हूँ, मनवाता अड़ा हूँ!
(UPSC 1985, 20 Marks, )