Synopsis IAS
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  • P2B 4. निबंध निलय : संपादक : डॉ. सत्येन्द्र। बाल कृष्ण भट्ट, प्रेमचन्द, गुलाब राय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, अज्ञेय, कुबेरनाथ राय।

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    • Hindi Sahitya 2009 Solved PYQs Paper 2
    • Hindi Literature PYQs Topic Wise
    • P1A 1. अपभ्रंश, अवहट्ट और प्रारंभिक हिन्दी का व्याकरणिक तथा अनुप्रयुक्त स्वरूप।
    • P1A 2. मध्यकाल में ब्रज और अवधी का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास।
    • P1A 3. सिद्ध एवं नाथ साहित्य, खुसरो, संत साहित्य, रहीम आदि कवियों और दक्खिनी हिन्दी में खड़ी बोली का प्रारंभिक स्वरूप।
    • P1A 4. उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली और नागरी लिपि का विकास।
    • P1A 5. हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का मानकीकरण।
    • P1A 6. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी का विकास।
    • P1A 7. भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी का विकास।
    • P1A 8. हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक और तकनीकी विकास।
    • P1A 9. हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ और उनका परस्पर संबंध।
    • P1A 10. नागरी लिपि की प्रमुख विशेषताएँ और उसके सुधार के प्रयास तथा मानक हिन्दी का स्वरूप।
    • P1A 11. मानक हिन्दी की व्याकरणिक संरचना।
    • P1B 1. हिन्दी साहित्य की प्रासंगिकता और महत्त्व तथा हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की परम्परा।
    • P1B 2 हिन्दी साहित्य के इतिहास के चार कालों की साहित्यिक प्रवृत्तियाँ
    • P1B 3 कथा साहित्य
    • P1B 4 नाटक और रंगमंच
    • P1B 5 आलोचना
    • P1B 6. हिन्दी गद्य की अन्य विधाएँ: ललित निबंध, रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रा वृत्तान्त।
    • P2A 1. कबीर : कबीर ग्रंथावली (आरंभिक 100 पद) सं. श्याम सुन्दर दास
    • P2A 2. सूरदास: भ्रमरगीत सार (आरंभिक 100 पद) सं. रामचंद्र शुक्ल
    • P2A 3. तुलसीदास: रामचरित मानस (सुंदर काण्ड), कवितावली (उत्तर काण्ड)
    • P2A 4. जायसी: पदमावत (सिंहलद्वीप खंड और नागमती वियोग खंड) सं. श्याम सुन्दर दास
    • P2A 5. बिहारी: बिहारी रत्नाकर (आरंभिक 100 दोहे) सं. जगन्नाथ दास रत्नाकर
    • P2A 6. मैथिलीशरण गुप्त: भारत भारती
    • P2A 7. जयशंकर प्रसाद: कामायनी (चिंता और श्रद्धा सर्ग)
    • P2A 8. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला’: राग-विराग (राम की शक्ति पूजा और कुकुरमुत्ता) सं. रामविलास शर्मा
    • P2A 9. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : कुरुक्षेत्र
    • P2A 10. अज्ञेय : आंगन के पार द्वार (असाध्यवीणा)
    • P2A 11. मुक्ति बोध : ब्रह्मराक्षस
    • P2A 12. नागार्जुन : बादल को घिरते देखा है, अकाल और उसके बाद, हरिजन गाथा।
    • P2B 1. भारतेन्दु: भारत दुर्दशा
    • P2B 2. मोहन राकेश: आषाढ़ का एक दिन
    • P2B 3. रामचंद्र शुक्ल: चिंतामणि (भाग-1), (कविता क्या है, श्रद्धा-भक्ति)
    • P2B 4. निबंध निलय : संपादक : डॉ. सत्येन्द्र। बाल कृष्ण भट्ट, प्रेमचन्द, गुलाब राय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, अज्ञेय, कुबेरनाथ राय।
    • P2B 5. प्रेमचंद : गोदान, ‘प्रेमचंद’ की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ (संपादक : अमृत राय)
    • P2B 6. प्रसाद: स्कंदगुप्त
    • P2B 7. यशपाल: दिव्या
    • P2B 8. फणीश्वरनाथ रेणु: मैला आंचल
    • P2B 9. मन्नू भण्डारी : महाभोज
    • P2B 10. राजेन्द्र यादव (सं.): एक दुनिया समानान्तर (सभी कहानियाँ)
    • अपभ्रंश का व्याकरणिक तथा अनुप्रयुक्त स्वरूप।
      • अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ बताइए।
      • अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ बताइए।
      • अपभ्रंश की विशेषताएं बताते हुए उसके प्रमुख रूपों का परिचय दीजिए।
      • अपभ्रंश की सामान्य विशेषताओं का परिचय देते हुए, उसके कुछ प्रमुख रूपों का विवेचन कीजिए।
    • अवहट्ट का व्याकरणिक तथा अनुप्रयुक्त स्वरूप।
      • अवहट्ठ का सामान्य परिचय दीजिए।
      • अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का स्वरूप।
      • अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • अवहट्ट की विशेषताएँ।
      • अवहट्ट भाषा की विशेषताएँ।
    • प्रारंभिक हिन्दी का व्याकरणिक तथा अनुप्रयुक्त स्वरूप।
      • आरंभिक हिंदी की प्रमुख विशेषताएँ।
      • आरम्भिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • आरंभिक हिन्दी की प्रमुख विशेषताओं का परिचय दीजिए।
      • आरम्भिक हिन्दी के विकास को स्पष्ट करते हुए उसको प्रवृत्तियों की सोदाहरण विवेचना कीजिए।
      • आरम्भिक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • आदिकालीन हिंन्दी भाषा का स्वरूप।
      • हिन्दी भाषा की आविर्भावकालीन प्रकृति और परम्परा पर प्रकाश डालिए।
      • पुरानी हिन्दी से आप क्या समझते हैं? उससे देश भाषाओं का विकास कैसे हुआ? किन्हीं दो भाषाओ को उदाहरण देकर समझाइए।
    • ब्रजभाषा और अवधी की विशेषताएँ
      • ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
      • ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताओं का आकलन कीजिए।
      • मध्यकाल में काव्य-भाषा के रूप में प्रयुक्त ब्रज की विशेषताएँ।
      • ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • अवध की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
      • मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में प्रयुक्त अवध की विशेषताएँ।
      • अवधी की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • अवधी की व्याकरणिक विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
      • मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में प्रयुक्त अवध की विशेषताएँ।
      • अवधी की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • ब्रज और अवधी का व्याकरण।
      • व्याकरण की दृष्टि से अवधी अथवा ब्रजभाषा के स्वरूप का विवेचन कीजिए।
      • साहित्यिक अवधी एवं ब्रज-भाषा के व्याकरणिक स्वरूपों का तुलनात्मक परिचय दीजिए।
      • ब्रज भाषा और अवधी का व्याकरण सम्बन्धी अन्तर सोदाहरण समझाए।
      • सूफ़ी कवियों द्वारा प्रयुक्त अवधी के स्वरूप पर विचार कीजिए।
    • मध्यकाल में अवधी का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास
    • ब्रजभाषा और अवधी में अंतर
      • ब्रजभाषा और अवधी में अंतर।
      • अवधी और ब्रजभाषा का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
    • ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली
      • मध्यकाल में ब्रजी अथवा अवधी के स्वतन्त्र व्यक्तित्व का निरूपण करते हुए खड़ी बोली के संवर्धन में उक्त भाषा के योग का सम्यक विवेचन कीजिए।
      • साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज अथवा अवधी का विकास क्रम निरूपित करते हुए बताइए कि खड़ी बोली हिन्दी की समृद्धि में उक्त भाषा की भूमिका क्या है ?
      • ब्रज अथवा अवधी में से किसी एक का भाषिक परिचय देते हुए खड़ी बोली के साथ उसके अंतर्संबंध पर प्रकाश डालिए।
      • व्याकरण की दृष्टि से ब्रजभाषा और खड़ी बोली में समान तथा असमान तत्वों पर प्रकाश डालिए।
    • उत्तर भारत में भक्ति और सूफ़ी आंदोलन में सहायक हिन्दी भाषा रूप
    • सिद्ध एवं नाथ साहित्य, खुसरो, संत साहित्य, रहीम और दक्खिनी हिन्दी में खड़ी बोली का स्वरूप
      • सिद्ध-नाथ साहित्य की शब्दावली संपदा का विवेचन कीजिए।
      • सिद्ध-नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का स्वरूप।
      • सिद्धनाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप।
      • सिद्ध-नाथ-साहित्य में खड़ीबोली का स्वरूप।
      • सिद्धनाथ-साहित्य में प्रारंभिक खड़ी बोली।
      • खुसरो द्वारा प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप का विवेचन कीजिए।
      • खुसरो की काव्य-भाषा।
      • अमीर खुसरो की हिन्दी।
      • प्रारम्भिक खड़ीबोली और खुसरो की कविता।
      • खड़ी बोली का आरंभिक स्वरूप: खुसरो और रहीम का सन्दर्भ।
      • प्रारंभिक खड़ी बोली और अमीर खुसरो।
      • संत-साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप की चर्चा कीजिए।
      • रहीम की काव्यभाषा का स्वरूप और वैशिष्ट्य बताइए।
      • खड़ी बोली का आरंभिक स्वरूप: खुसरो और रहीम का सन्दर्भ।
      • दक्खिनी हिन्दी का परिचय दीजिए।
      • दक्खिनी हिन्दी।
      • दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
      • दक्खिनी हिन्दी का स्वरूप।
      • दक्खिनी हिन्दी के स्वरूप का परिचय दीजिए।
      • दक्खिनी हिन्दी: क्षेत्र और भाषा स्वरूप।
    • सिद्ध एवं नाथ साहित्य, खुसरो, संत साहित्य, रहीम और दक्खिनी हिन्दी में खड़ी बोली की विशेषताएँ
      • ख़ुसरो की काव्य-भाषा की मुख्य विशेषताएँ।
      • बहुभाषाविदू खुसरो एवं उनकी कविता।
      • खुसरो की कविता की विशेषताएँ।
      • संत-साहित्य की विशेषताएँ।
      • रहीम की काव्य भाषा और उसकी विशेषताएँ।
      • दक्खिनी हिन्दी की प्रमुख विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
      • दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
      • दक्खिनी हिन्दी की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
      • दक्ख़िनी हिन्दी की विशेषताएँ।
    • सिद्ध एवं नाथ साहित्य, खुसरो, संत साहित्य, रहीम और दक्खिनी हिन्दी का महत्त्व
      • सिद्ध और नाथ साहित्य का परवर्ती हिन्दी साहित्य पर प्रभाव।
      • खड़ी बोली के विकास में सिद्ध-नाथ साहित्य का योगदान।
      • अमीर खुसरो की काव्य-भाषा का महत्त्व।
      • खुसरो की कविता के आधार पर उनकी लोक-चेतना पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
      • सन्त-साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
      • खड़ी बोली के विकास में संत साहित्य की भूमिका।
      • संत-साहित्य में विद्यमान खड़ी बोली के प्रमाण।
      • रहीम की कविता की प्रासंगिकता।
      • रहीम की काव्य-भाषा का महत्त्व।
    • रहीम की कविता की मार्मिकता
      • रहीम की कविता की मार्मिकता पर प्रकाश डालिए।
      • रहीम की कविता की मार्मिकता के प्रमुख कारण।
      • रहीम की कविता के मर्म का उद्घाटन कीजिये एवं उसकी लोकप्रियता के कारणों का निर्देश कीजिये।
    • दक्खिनी हिन्दी का विकास
      • दक्खिनी हिन्दी के प्रमुख हस्ताक्षर।
      • दक्खिनी हिन्दी के साहित्यिक विकास के ऐतिहासिक और सामाजिक कारण।
      • दक्खिनी हिन्दी के विकास में आदिल शाही शासकों का योगदान।
    • भक्तिकालीन हिन्दी
    • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास।
      • 19वीं सदी के खड़ी बोली आंदोलन के ऐतिहासिक कारकों और उपलब्धियों की विवेचना कीजिए।
      • 19वीं सदी में खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के दौरान प्रमुख चुनौतियों पर प्रकाश डालिए।
      • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ीबोली के विकास पर प्रकाश डालिए।
      • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली का विकास।
      • आधुनिक काल में खड़ी बोली के विकास को एक रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
      • खड़ीबोली के विकास के इतिहास में भारतीयता के आधुनिकीकरण की प्रवृत्तियों का समावेश है - विचार कीजिए।
      • उन्नीसवीं सदी के खड़ी बोली-आन्दोलन का इतिहास संक्षेप में प्रस्तुत कीजिए।
      • हिन्दी खड़ी बोली के विकास के प्रमुख सोपानों का उल्लेख कीजिए।
      • साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी के उद्भव और विकास की रूपरेखा स्पष्ट कीजिए।
      • खड़ी बोली के उदय और विकास में कौन-से तत्व सक्रिय रहे हैं? विवेचन कीजिए।
      • उन्नीसवीं शती में साहित्यिक भाषा के रूप में खड़ी बोली का उदय आकस्मिक नहीं, सापेक्ष घटना है। ब्रजी और अवधी के पक्ष को तोलते हुए युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली हिन्दी, साहित्यिक भाषा के रूप में किस प्रकार क्रमशः विकसित और समृद्ध हुई? लेखकों और रचनाओं का भी यथावश्यक उल्लेख कीजिए।
      • खड़ी बोली की भाषा सम्बन्धी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए आधुनिक काल में प्रमुख साहित्यिक भाषा के रूप में उसे विकसित करने में योग देने वाले तत्वों पर विचार कीजिए।
      • खड़ी बोली की भाषा सम्बन्धी विशेषताएँ बताइए और आधुनिक काल में प्रमुख साहित्यिक भाषा के रूप में उसके विकास में योग देने वाली परिस्थितियों का विवरण दीजिए।
      • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित एवं विकसित करने में जिन तत्वों ने योग दिया, उन पर विचार कीजिए।
    • उन्नीसवीं शताब्दी में नागरी लिपि का विकास।
      • ब्राह्मी लिपि से नागरी लिपि के विकासात्मक रूप का विवेचन कीजिए।
      • नागरी लिपि का ब्राह्मी लिपि से संबंध।
      • देवनागरी लिपि का विकास।
      • देवनागरी लिपि के विकास की संक्षिप्त रूपरेखा।
      • देवनागरी लिपि का क्रमिक विकास।
      • उन्नीसवीं शताब्दी में नागरी लिपि के विकास पर प्रकाश डालिए।
    • हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का मानकीकरण
      • हिन्दी का तत्सम संदर्भित मानकीकरण।
      • हिन्दी भाषा के मानकीकरण के संदर्भ में लिपि प्रयोग से संबंधित वाद-विवादों को रेखांकित कीजिए।
      • हिन्दी का मानकीकरण।
      • खड़ी बोली हिन्दी के विकास की रूप रेखा प्रस्तुत करते हुए उसके मानकीकरण पर प्रकाश डालिए।
      • देवनागरी लिपि के मानकीकरण के लिए किए गए प्रयत्नों को स्पष्ट करते हुए संगणक यंत्र (कम्प्यूटर) एवं आधुनिक दूरसंचार सुविधाओं को दृष्टि में रखते हुए उसमें आवश्यक सुधारों पर प्रकाश डालिए।
      • हिन्दी भाषा के मानकीकरण के प्रयत्नों का परिचय दीजिए।
      • लिपि और भाषा का क्या कोई स्वाभाविक संबंध है? हिन्दी के मानकीकरण में देवनागरी लिपि के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
      • देवनागरी लिपि के स्वरूप का विवेचन करते हुए, उक्त लिपि में लिखित हिन्दी के मानकीकरण की वर्तमान अवस्था पर विचार कीजिए।
      • देवनागरी लिपि के स्वरुप का विवेचन करते हुए, उक्त लिपि में लिखित हिन्दी के मानकीकरण की वर्तमान अवस्था पर विचार कीजिए
    • देवनागरी लिपि का स्वरुप
    • हिन्दी भाषा के मानकीकरण में नागरी लिपि का योगदान
      • हिन्दी भाषा के मानकीकरण में नागरी लिपि के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
      • नागरी लिपि का उद्भव और विकास विवेचित करते हुए हिन्दी भाषा के मानकीकरण में उसके योगदान पर प्रकाश डालिए।
      • देवनागरी लिपि का संक्षिप्त परिचय देते हुए हिन्दी भाषा के मानकीकरण में उसके योग पर प्रकाश डालिए।
    • हिन्दी भाषा के स्वरूप-निर्धारण में साहित्यकारों का योगदान
      • हिन्दी व्याकरण के सन्दर्भ में किशोरीदास वाजपेयी के योगदान का आकलन कीजिए।
      • हिन्दी व्याकरण के सन्दर्भ में किशोरीदास वाजपेयी का योगदान।
      • हिन्दी व्याकरण-लेखन की परम्परा में कामता प्रसाद गुरु के कार्य की समीक्षा कीजिए।
      • कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरण के रूप में की गयी स्थापनाओं का मूल्यांकन कीजिए।
      • कामता प्रसाद गुरु का हिन्दी व्याकरण।
      • हिन्दी के स्वरूप-निर्धारण में भारतेन्दु युग का योगदान।
      • हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी युग का योगदान।
      • हिन्दी भाषा के स्वरूप-निर्धारण में निम्नलिखित साहित्यकारों के योगदान पर प्रकाश डालिए : (क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्, (ख) महाबीर प्रसाद द्विवेदी।
      • फोर्ट विलियम कॉलेज का हिन्दी उर्दू के विकास पर क्या प्रभाव पड़ा?
    • राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी
      • राष्ट्रभाषा की अवधारणा और हिन्दी।
      • राष्ट्रभाषा हिन्दी।
      • राष्ट्रभाषा हिन्दी।
      • ‘राष्ट्रभाषा’ को परिभाषित करते हुए भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के विकास पर विचार कीजिए।
      • राष्ट्रलिपि के रूप में देवनागरी लिपि के ऐतिहासिक उत्तरदायित्व की समीक्षा कीजिए।
      • राष्ट्रभाषा हिन्दी की संवैधानिक स्थिति और उसका महत्व स्पष्ट कीजिए।
    • हिन्दी के प्रयोग की प्रमुख चुनौतियां और समाधान
      • राष्ट्रभाषा हिन्दी की प्रयोग संबंधी चुनौतियाँ।
      • हिन्दी, अंग्रेजी और भारतीय भाषाएँ : नये राष्ट्रीय संदर्भों में इनका पारस्परिक सम्बन्ध।
      • राष्ट्रीय एकता व संगठन की दृष्टि से हिन्दी की सर्वागीण उन्नति के स्वर्ण-सूत्र।
      • भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
      • राजभाषा के रूप में हिन्दी को सर्वस्वीकार्य बनाने के लिए क्या क़दम उठाए जाने चाहिए? सविस्तार उल्लेख कीजिए।
      • राजभाषा हिन्दी के मार्ग की कठिनाइयाँ बताइए और समाधान भी सुझाइए।
      • “राजभाषा के रूप में हिन्दी का विरोध राजनीतिक कारणों से है” - इस कथन का विवेचन कीजिए।
      • राजभाषा हिन्दी के विकास और उन्नति में आने वाली बाधाओं का वर्णन कीजिए।
      • राष्ट्रीय एकता व संगठन की दृष्टी से हिन्दी की सर्वागीण उन्नति के स्वर्ण-सूत्र।
    • स्वतंत्रता आन्दोलन और हिन्दी
      • भक्ति-आन्दोलन एवं स्वतंत्रता-आन्दोलन-दोनों ही ने हिन्दी को भारत की प्रतिनिधि भाषा के रूप में विकसित होने की क्षमताएं प्रदान की हैं। इस कथन की तर्कयुक्त मीमांसा कीजिए।
      • स्वाधीनता आंदोलन ने जनभाषा के रूप में हिन्दी के विकास को किस तरह प्रभावित किया?
      • स्वतन्त्रता-संग्राम की अवधि में हुए हिन्दी के विकास का परिचय दीजिए।
      • स्वतंत्रता आन्दोलन और हिन्दी।
      • स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान प्रयुक्त होने वाली हिन्दी अपनी किन विशेषताओं के साथ राष्ट्रभाषा बनी? स्पष्ट कीजिए।
      • स्वतंत्रता आन्दोलन काल में हिन्दी राष्ट्रभाषा पद पर आसीन कराने वाली परिस्थितियों का सम्यक्‌ मूल्यांकन कीजिए।
      • भक्ति-आन्दोलन एवं स्वतंत्रता-आन्दोलन-दोनों ही ने हिन्दी को भारत की प्रतिनिधि भाषा के रूप में विकसित होने की क्षमताएं प्रदान की हैं। इस कथन की तर्कयुक्त मीमांसा कीजिए।
    • व्यक्तित्वों के योगदान
      • 18-19वीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों की भाषा नीति का मूल्यांकन कीजिए।
      • स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अहिन्दी भाषी व्यक्तित्वों के योगदान की चर्चा कीजिए।
      • राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में महात्मा गाँधी और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
      • राष्ट्रभाषा हिन्दी के आन्दोलन में सेठ गोविन्ददास के योगदान पर विचार कीजिए।
      • दक्षिण भारत और बंगाल के जिन नेताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का सुझाव दिया था, उनके विचारों का विवेचन कीजिए।
      • राष्ट्रभाषा हिन्दी के विकास में हिन्दीतर भाषियों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में अहिन्दी भाषी लेखकों का योगदान।
    • संस्थाओं के योगदान
      • हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में नागरी प्रचारिणी सभा, काशी और दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, चेन्नई (मद्रास) की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
      • हिन्दी के प्रचार-प्रसार के आन्दोलन में किन्हीं दो प्रमुख संस्थाओं के योगदान पर प्रकाश डालिए।
      • राष्ट्रभाषा हिन्दी के आन्दोलन में निम्नलिखित प्रान्तों के योगदान पर प्रकाश डालिए: (अ) महाराष्ट्र, (ब) पंजाब।
      • राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के प्रचार प्रसार और प्रतिष्ठा के प्रति स्वतन्त्रता आन्दोलन के मध्य, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों के योगदान पर विचार कीजिए।
    • राजभाषा के रूप में हिन्दी: वर्तमान स्थिति
      • भारतेन्दु मंडल की भाषा-दृष्टि के संदर्भ में राष्ट्रभाषा हिन्दी की विकास यात्रा के चरणों को रेखांकित कीजिए।
      • राजभाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालिए।
      • राजभाषा हिन्दी के विभिन्न प्रकार्य।
      • राजभाषा के रूप में हिन्दी की अद्यतन स्थिति की समीक्षा कीजिए।
      • राजभाषा के रूप में हिन्दी का स्वरूप।
      • स्वातंत्र्योत्तर भारत में राजभाषा के रूप में हिन्दी का विकास कहाँ तक सफल हुआ है? चर्चा कीजिए।
      • संघ की भाषा के रूप में हिन्दी के विकास के सूत्र।
      • भारत संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी के विकास की वर्तमान स्थिति का सिंहावलोकन कीजिए।
    • राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी
      • राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिन्दी के सामने उपस्थित वर्तमानकालीन चुनौतियों पर प्रकाश डालिए।
      • राजभाषा और राष्ट्रभाषा का तात्त्विक भेद।
      • राज भाषा, राष्ट्र भाषा व सम्पर्क भाषा।
      • राष्ट्रभाषा और राजभाषा का अन्तर बताते हुए भारतीय सन्दर्भ में दोनों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
      • भारतीय संदर्भ में राष्ट्रभाषा और राजभाषा की स्थिति पर विचार कीजिए।
      • राष्ट्रभाषा और राजभाषा का स्वरूप स्पष्ट करते हुए बताइए कि राजभाषा के रूप में हिन्दी के विकास के लिए क्या-क्या आयाम रहे हैं।
      • राष्ट्रभाषा और राजभाषा शब्दों की प्रयोग सीमा निर्धारित करते हुए हिन्दी की संवेधानिक स्थिति पर गम्भीरतापूर्वक विचार कीजिए।
      • राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की समुचित पृष्ठभूमि देते हुए, राज-भाषा के रूप में हिन्दी के विकास की वर्तमान स्थिति का सिंहावलोकन कीजिए।
      • राजभाषा और राष्ट्रभाषा का अन्तर स्पष्ट करते हुए बताइए कि एक समर्थ और सशक्त राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की वर्तमान विकास-स्थिति कैसी है? तथ्य और तर्क के साथ विवेचन कीजिए।
      • हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान करने की दिशा में जो विभिन्न क्षेत्रों में प्रयत्न चलते रहे हैं, उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
      • राष्ट्र भाषा और राज भाषा का अन्तर समझा कर यह बताइए कि हिंदी इन दोनों रूपों में कैसे समक्ष सिद्ध हो सकती है।
      • हिन्दी केन्द्रीय सरकार के काम काज की भाषा के रूप में किस सीमा तक प्रतिष्ठित हो सकती है? इस दिशा में किये गए प्रयत्नों की समीक्षा कीजिए।
      • राष्ट्रभाषा और राजभाषा का अन्तर स्पष्ट करते हुए हिन्दी प्रचार आन्दोलन का परिचय दीजिए।
      • राज भाषा, राष्ट्र भाषा व सम्पर्क भाषा।
    • हिन्दी की वर्तमान स्थिति
      • स्वाधीन भारत में हिंदी-प्रयोग के नवीन आयाम पर प्रकाश डालिए।
      • स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिंदी के विकास में आने वाली चुनौतियाँ।
      • स्वातंत्रयोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति।
      • स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं ? स्पष्ट कीजिए।
      • स्वाधीन भारत में हिंदी-प्रयोग के नवीन आयाम पर प्रकाश डालिए।
      • स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिंदी के विकास में आने वाली चुनौतियाँ।
      • स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति।
      • स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं? स्पष्ट कीजिए।
    • हिन्दी के प्रयोग की प्रमुख चुनौतियां और समाधान
      • राष्ट्रभाषा हिन्दी की प्रयोग संबंधी चुनौतियाँ।
      • हिन्दी, अंग्रेजी और भारतीय भाषाएँ : नये राष्ट्रीय संदर्भों में इनका पारस्परिक सम्बन्ध।
      • राष्ट्रीय एकता व संगठन की दृष्टि से हिन्दी की सर्वागीण उन्नति के स्वर्ण-सूत्र।
      • भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
      • राजभाषा के रूप में हिन्दी को सर्वस्वीकार्य बनाने के लिए क्या क़दम उठाए जाने चाहिए? सविस्तार उल्लेख कीजिए।
      • राजभाषा हिन्दी के मार्ग की कठिनाइयाँ बताइए और समाधान भी सुझाइए।
      • “राजभाषा के रूप में हिन्दी का विरोध राजनीतिक कारणों से है” - इस कथन का विवेचन कीजिए।
      • राजभाषा हिन्दी के विकास और उन्नति में आने वाली बाधाओं का वर्णन कीजिए।
      • राष्ट्रीय एकता व संगठन की दृष्टी से हिन्दी की सर्वागीण उन्नति के स्वर्ण-सूत्र।
    • हिन्दी के प्रयोग के लिए प्रयास
      • विश्व हिन्दी-सम्मेलनों की सार्थकता पर अपना मत व्यक्त कीजिए।
      • विश्वमंच पर हिन्दी के सफल प्रयोग की संभावनाएँ बढ़ गई हैं। इस कथन की पुष्टि कीजिए।
      • “हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) मात्र एक कर्मकाण्ड बनकर रह गया है।” इस कथन का तार्किक उत्तर दीजिए।
      • हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) की उपयोगिता पर अपना मत व्यक्त कीजिए।
    • पारिभाषिक शब्दावली
      • हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण की वर्तमान दशा पर प्रकाश डालिए।
      • हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण में आने वाली कठिनाइयों का परिचय दीजिए।
      • ज्ञान-विज्ञान की हिन्दी के विकास में पारिभाषिक शब्दावली क्यों आवश्यक है ? समझाइए।
      • पारिभाषिक शब्दावली से आप क्या समझते हैं? हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली निर्माण के इतिहास का उदाहरण सहित मूल्यांकन कीजिए।
    • हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक विकास
      • “हिन्दी में वैज्ञानिक लेखन की स्थिति अभी भी संतोषप्रद नहीं है” - इस कथन का सोदाहरण उत्तर दीजिए।
      • हिन्दी में विज्ञान-लेखन की दशा एवं दिशा पर प्रकाश डालिए।
      • “हिन्दी में वैज्ञानिक लेखन की स्थिति असन्तोषजनक है।” इस कथन का परीक्षण कीजिए।
      • हिन्दी में वैज्ञानिक लेखन की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालिए।
    • हिन्दी भाषा का तकनीकी विकास
      • हिन्दी के मशीनी अनुवाद की प्रविधि और प्रक्रिया का विवेचन कीजिए।
      • विज्ञान और तकनीक की भाषा के रूप में हिंदी का विकास।
      • तकनीक की भाषा के रूप में हिन्दी के सामने आने वाली चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
      • तकनीक की भाषा के रूप में हिन्दी का विकास।
      • हिन्दी की तकनीकी शब्दावली के निर्माण में आने वाली बाधाओं का वर्णन कीजिए।
      • हिन्दी की तकनीकी शब्दावली की उपलब्धियाँ और सीमाएँ बताइए।
      • हिन्दी की तकनीकी शब्दावली के उपयोग में आने वाली कठिनाइयों पर प्रकाश डालिए।
      • तकनीकी विकास और हिन्दी।
      • आधुनिक हिन्दी : तकनीकी विकास।
    • हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक और तकनीकी विकास
      • आज हिन्दी को वैज्ञानिक और तकनीकी लेखन के क्षेत्र में विशेष महत्त्व मिला है। इसके कारणों पर प्रकाश डालिए।
      • विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में हिन्दी भाषा के प्रयोग की स्थिति का आकलन कीजिए।
      • वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में हिन्दीभाषा के विकास का सर्वेक्षण कीजिए और उस पर उपयुक्त एवं तर्कपूर्ण टिप्पणी कीजिए।
      • हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक और तकनीकी पक्ष।
      • हिन्दी की वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के अद्यतन विकास को निम्नलिखित सन्दर्भों में विवेचित कीजिए: (क) व्यावसायिक शिक्षा, (ख) मौलिक वैज्ञानिक लेखन।
      • निम्नलिखित दृष्टि से हिन्दी भाषा की वैज्ञानिक एवम्‌ प्रौद्योगिक प्रगति का विवेचन कीजिए। (क) पारिभाषिक शब्दावली, (ख) अनूदित लेखन।
      • वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्र में हिंदी के विकास की समीक्षा कीजिए।
      • वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास में हिन्दी भाषा के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
      • वैज्ञानिक एवं तकनीकी भाषा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण को सुलझाने की दिशाएँ रेखांकित कीजिए।
      • आकाशवाणी, दूरदर्शन ओर हिन्दी।
      • एक सुसमृद्ध हिन्दी शब्द-कोष तैयार करने के उपाय व साधन।
    • हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ
      • भाषा और बोली में अंतर
      • भाषा और बोली के कृत्रिम विभाजन के संदर्भ में हिन्दी के भाषाई सातत्य के चिह्नों का निरूपण कीजिए।
      • विभाषा, बोली और भाषा के सम्बन्धों को सोदाहरण स्पष्ट करते हुए हिन्दी की प्रमुख बोलियों का परिचय दीजिए।
      • हिन्दी की उपभाषाओं का वर्गीकरण करते हुए किन्हीं दो प्रमुख उपभाषाओं का परिचय दीजिए।
      • हिन्दी की प्रमुख बोलियों का संक्षिप्त परिचय।
      • हिन्दी की बहुविध बोलियों के साहित्यिक महत्त्व के बावजूद क्या यह उचित है कि उन्हें भी स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिया जाए? समीक्षा कीजिए।
      • हिन्दी की विशिष्ट विभाषाओं का स्थान निर्धारण प्राचीनता, बहुभाषिकता और साहित्य-संपदा की दृष्टि से कीजिए।
      • हिन्दी की किन्हीं तीन बोलियों का परिचय देते हुए उनके अन्तः सम्बन्धों पर प्रकाश डालिए।
      • भाषा और बोली का भेद स्पष्ट करते हुए किन्हीं दो प्रमुख बोलियों के अन्तःसम्बन्ध बताइए।
      • हिन्दी की बोलियों के अन्तः सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए खड़ी बोली के व्यापक प्रसार के कारणों को समझाइए।
      • बोली और भाषा का अन्तर बताते हुए हिन्दी की प्रमुख बोलियों के पारस्परिक सम्बन्धों का विवेचन कीजिए।
      • हिन्दी की किन्हीं तीन प्रमुख बोलियों का परिचय देते हुए उनके अन्तःसंबंध पर प्रकाश डालिए।
      • हिन्दी की प्रमुख बोलियों के पारस्परिक अन्तः संबंधों की अवतंनीव स्थिति का विश्लेषण कीजिए।
      • हिन्दी की प्रमुख बोलियों का परिचय दीजिए; वे किस प्रकार परस्पर जुड़ी रहकर हिन्दी को समृद्धि प्रदान करती हैं।
      • हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ कौन-कौन सी हैं? क्यों उन्हें स्वतन्त्र भाषाएं नहीं मान सकते? विभिन्न मतों को ध्यान में रखकर उत्तर दीजिए।
      • हिन्दी की किन्हीं दो प्रमुख बोलियों का परिचय दीजिए।
    • पश्चिमी हिंदी (खड़ी बोली/ राजस्थानी, हरियाणवी, ब्रजभाषा, कन्नौजी और बुंदेली)
      • आल्हा गायन की भाषा। (Hint: Bundeli)
      • राजस्थानी वर्ग की प्रमुख बोलियों की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
      • पश्चिमी हिंदी की प्रमुख बोलियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
      • पश्चिमी हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ।
      • पश्चिमी हिन्दी की किन्हीं दो बोलियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
      • पश्चिमी हिन्दी की किन्हीं दो बोलियों का विवेचन कीजिए।
      • ब्रज और खड़ी बोली का अन्त:संबंध बताइए।
      • राजस्थानी — एक स्वतंत्र भाषा के रूप में।
    • पूर्वी हिन्दी (अवधि, बघेली और छत्तीसगढ़ी)
      • पूर्वी हिन्दी की प्रमुख बोलियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
      • पूर्वी हिन्दी की किन्हीं दो बोलियों की प्रमुख व्याकरणिक विशेषताओं की समीक्षा कीजिए।
      • पूर्वी हिन्दी की किन्हीं दो बोलियों की शब्दशास्त्रीय विशेषताएँ बताइए।
      • पूर्वी हिन्दी की किन्हीं दो बोलियों का विवेचन कीजिए।
      • पूर्वी हिन्दी की बोलियों का अन्तस्संबंध।
      • भोजपुरी, मैथिली और मगही का विवेचन निम्नलिखित आधारों पर कीजिए: (क) क्षेत्र, (ख) व्याकरण, (ग) साहित्य।
      • पूर्वी हिंदी की बोलियों का परिचय एवं उनके अंतर्सबंध।
      • पूर्वी हिन्दी और पश्चिमी हिन्दी की भेदक रेखाएँ निर्धारित कीजिए।
      • भोजपुरी और अवधी में अंतर।
    • पूर्वी vs पश्चिमी हिन्दी
      • पूर्वी हिंदी व पश्चिमी हिंदी के प्रमुख अंतर।
      • पूर्वी और पश्चिमी हिन्दी।
      • पूर्वी हिन्दी और पश्चिमी हिन्दी के पारस्परिक अन्तःसम्बन्धों का विवेचनात्मक परिचय दीजिए।
      • पश्चिम हिन्दी और पूर्वी हिन्दी से आप क्या समझते हैं? उनके अन्तर्गत आने वाली बोलियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
      • ब्रज, अवधी और खड़ी बोली में साम्य और वैषम्य पर प्रकाश डालिए।
      • व्याकरणिक तत्वों के परिप्रेक्ष्य में खड़ी बोली और अवधी के स्वरूप अंतर स्पष्ट कीजिए।
    • पहाड़ी हिन्दी की प्रमुख बोलियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
    • हिन्दी और उसकी बोलियों का अंतर्सबंध
      • हिन्दी और उसकी बोलियों के अंतर्सबंध का विवेचन कीजिए।
      • “हिन्दी और उसकी क्षेत्रीय बोलियों के अन्तर्सबंध से जो राष्ट्रीय एकता स्थापित हुई है, वह अद्वितीय है।” इस कथन की मीमांसा कीजिए।
      • खड़ी बोली हिन्दी के साथ उसकी प्रमुख बोलियों के अन्त:संबंध पर प्रकाश डालिए।
    • हिन्दी के विकास में बोलियों का योगदान
      • हिन्दी की समृद्धि में उसकी बोलियों के योगदान का आकलन कीजिए।
      • हिन्दी के विकास में उसकी प्रमुख बोलियों का योगदान निरूपित कीजिए।
      • संचार-माध्यम और हिन्दी।
      • बहुभाषिक स्थिति में संपर्क-भाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
      • हिन्दी भाषा के विकास में प्रमुख बोलियों की भूमिका पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी भाषा के विकास-प्रसार में क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के मिश्रण की सार्थक एवं प्रभावी भूमिका रही है? सतर्क पना मत दीजिए।
    • नागरी लिपि की प्रमुख विशेषताएँ
      • देवनागरी लिपि के प्रमुख गुण।
      • देवनागरी लिपि की विशेषताएँ।
      • देवनागरी लिपि की विशेषताएँ।
      • देवनागरी लिपि के 'गुण-दोष' की विवेचना कीजिए।
      • नागरी लिपि की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उसमें अपेक्षित सुधारों पर प्रकाश डालिए।
    • नागरी लिपि के सुधार के प्रयास
      • देवनागरी लिपि के सुधार हेतु स्वतंत्र भारत में किए गए प्रयत्नों की चर्चा कीजिए।
      • नागरी लिपि के सुधार हेतु किए गए प्रयासों का विवेचन कीजिए।
      • देवनागरी लिपि : सुधार की दिशाएँ।
      • देवनागरी लिपि में हुए सुधारों का इतिहास।
      • नागरी लिपि में सुधार के प्रयत्न की दिशा।
      • नागरी लिपि में सुधार के प्रयास।
      • नागरी लिपि में सुधार के विभिन्‍न प्रस्ताव।
    • मानक हिन्दी का स्वरूप
      • देवनागरी लिपि का मानक स्वरूप।
      • हिन्दी भाषा का मानक स्वरूप।
      • मानक हिन्दी के स्वरूप पर प्रकाश डालिये।
      • हिन्दी भाषा का मानक रूप क्या हो सकता है ? अपने सुझाव दीजिए।
      • देवनागरी लिपि किस रूप में अधिक मान्य लिपि हो सकती है? सुझाव दीजिए।
      • देवनागरी लिपि के मानक स्वरूप की मीमांसा कीजिए।
      • आपके विचार से हिन्दी का मानक रूप क्या हो सकता है? तर्क-सहित उत्तर दीजिए।
      • देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता के प्रमुख आधार बिन्दुओं का उल्लेख करते हुए बताइएं कि हिन्दी के मानक रूप की प्रतिष्ठा में उसका (लिपिकां) क्या योग रहा है?
    • हिन्दी भाषा का परिचय/ विकास
      • हिन्दी-उर्दू भाषाई संबंध के समावेशी बिन्दुओं का विश्लेषण कीजिए।
      • “हिन्दुस्तानी एक कृत्रिम भाषा थी” - इस कथन की तर्कपूर्ण व्याख्या कीजिए।
      • हिन्दुस्तानी की पृष्ठभूमि का परिचय दीजिए।
      • हिन्दुस्तानी का परिचय दीजिए।
      • हिन्दी भाषा की विकास-यात्रा पर एक नातिदीर्घ लेख लिखिए।
      • हिन्दी भाषा के ऐतिहासिक विकास विषय पर निबन्ध लिखिए।
    • देवनागरी लिपि का महत्त्व
      • फॉन्ट एवं लिपि के व्यामोह में देवनागरी लिपि के वैशिष्ट्य को निर्धारित कीजिए।
      • देवनागरी लिपि के महत्त्व का आकलन कीजिए।
      • भाषा और समाज के सम्बन्धों का विश्लेषण कीजिए।
    • मानक हिन्दी की व्याकरणिक संरचना
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ क्या है? किस सीमा तक इसे संस्कृत की व्याकरणिक संरचना पर आधारित कहा जा सकता है?
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक संरचना को स्पष्ट कीजिए।
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ बताइए।
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक संरचना के स्वरूप पर चर्चा कीजिए।
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताओं का परिचय दीजिए।
      • परिनिष्ठित हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप की विवेचना कीजिए।
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक संरचना पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ एवं तत्संबंधी समस्याएं निरुपित कीजिए।
      • प्रमुख व्याकरणिक रूपों के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी के मानक स्वरूप का विश्लेषण कीजिए।
    • मानक हिन्दी के विभिन्न दृष्टिकोण
      • मानक हिन्दी के सर्वनामों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • मानक हिन्दी की कारक-व्यवस्था का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • मानक हिन्दी का विवेचन निम्नलिखित दृष्टियों से कीजिए: (क) ध्वनि-संरचना, (ख) रूप-संरचना, (ग) वाक्य-संरचना
      • हिन्दी की विभिन्न व्याकरणिक कोटियों का उल्लेख करते हुए पद-रचना में उनकी भूमिका स्पष्ट कीजिए।
      • वाक्य रचना के विभिन्न तत्त्व।
      • आधुनिक हिन्दी को वाक्य संरचना को सोदाहरण निरूपित कीजिए।
      • हिन्दी कारक-व्यवस्था पर सोदाहरण निबन्ध प्रस्तुत कीजिए।
      • खड़ी बोली में एकवचन से बहुवचन बनाने में नियमों को सोदाहरण समझाइए।
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ एवं तत्संबंधी समस्याएं निरुपित कीजिए।
    • हिन्दी में लिंग व्यवस्था
      • हिन्दी की लिंग-व्यवस्था।
      • हिन्दी भाषा में लिंग समस्या।
      • आधुनिक हिन्दी में लिंग और वचन व्यवस्था।
      • आधुनिक हिन्दी में लिंग व्यवस्था।
    • मानक हिन्दी में समस्याएं
      • मानक हिन्दी को व्यावहारिक बनाने के लिए जिन व्याकरणिक नियमों को संशोधित किया गया है, उससे पढ़ने और लिखने में विसंगतियाँ आ रही हैं। उदाहरण देकर समझाइए।
      • हिन्दी की रूपात्मक त्रुटियाँ।
    • हिन्दी साहित्य की प्रासंगिकता और महत्त्व तथा हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की परम्परा।
      • हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में दलित विमर्श के हस्तक्षेप की समीक्षा कीजिए।
      • रामचन्द्र शुक्ल द्वारा किया गया हिन्दी साहित्य का काल-विभाजन।
      • रामचन्द्र शुक्ल के साहित्येतिहास लेखन की प्रमुख विशेषताएँ।
      • हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य के इतिहास-लेखन की दृष्टि।
      • हिन्दी में साहित्येतिहास लेखन की परंपरा और महत्त्व।
      • आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा किया गया हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल-विभाजन कितना प्रासंगिक है ? सप्रमाण उत्तर लिखिए।
      • साहित्य के इतिहासों का इतिहास।
      • मिश्र बंधु-विनोदः का महत्व।
      • हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा का उल्लेख कीजिए।
      • हिन्दी-साहित्य के इतिहासों का संक्षिप्त परिचय देते हुए बताइए कि आप किस इतिहास-ग्रंथ को पूर्णतर समझते हैं और क्यों ?
      • हिन्दी साहित्य के प्रारंभिक काल को 'वीरगाथा काल' नाम देना एकांगी, भ्रामक और अनुपयुक्त है ? तथ्य और तर्क देते हुए विवेचन कीजिए तथा उस काल के साहित्य के सांस्कृतिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
    • 2(क) आदिकालः सिद्ध, नाथ और रासो साहित्य। प्रमुख कविः चंदबरदाई, खुसरो, हेमचन्द्र, विद्यापति।
      • आदिकाल की प्रवृत्तियाँ।
      • हिन्दी के आदिकालीन साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षरों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
      • ‘आदिकालीन' साहित्य के लिए सर्वाधिक सार्थक अभिधान क्या हो सकता है ? युग-प्रवृत्तियों के परिप्रेक्ष्य में विचार कीजिए।
      • आदिकालीन वीर-काव्यों के साहित्यिक मूल्य को स्पष्ट कीजिए।
      • आदिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियां।
      • आदिकालीन हिन्दी साहित्य में प्रतिफलित' सामाजिक एवं सांस्कृतिक बोध का मूल्यांकन कीजिए।
      • आदिकालीन साहित्य के प्रमुख रूप।
      • वीरगाथाकाल और सामन्ती परिवेश।
      • आदिकाल का हिन्दी काव्य वीरभावना प्रधान होते हुए भी राष्ट्रीय भावना रहित है। तद्युगीन लोकमानस के परिप्रेक्ष्य में इस मान्यता की परीक्षा कीजिए।
      • हिन्दी-साहित्य के आदिकाल की कविता की विशेषताओं का विवेचन करते हुए इसके साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
      • हिंदी साहित्य के आदिकाल के नामकरण के ओचित्य पर विचार करते हुए इस काल की काव्य-प्रवृतियों का विश्लेषण कीजिए।
      • नाथ-साहित्य।
      • “पृथ्वीराज रासो में श्रृंगार और वीर रस का स्वरूप, युगीन जीवन-गौरव का प्रतिबिम्ब है।” समीक्षा कीजिए।
      • आदिकालीन रासो-साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर एक निबन्ध लिखिए।
      • हिन्दी रासक-काव्य।
      • प्रमुख रासो-काव्य।
      • रासो-काव्य की प्रमुख विशेषताएँ।
      • अमीर खुसरो।
      • हेमचंद्र की कविता
      • विद्यापति की आध्यात्मिकता पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की टिप्पणी की समीक्षा कीजिए।
      • विद्यापति के कृष्ण।
      • विद्यापति भक्त-कवि या श्रृंगारी कवि हैं ? विवेचन कीजिए।
      • विद्यापति।
    • 2(ख) भक्ति कालः संत काव्य धारा, सूफी काव्यधारा, कृष्ण भक्तिधारा और राम भक्तिधारा। प्रमुख कवि : कबीर, जायसी, सूर और तुलसी।
      • उत्तर भारत में भक्ति आन्दोलन में सहायक हिन्दी भाषा रूपों पर आलोचनात्मक निबन्ध लिखिए।
      • भक्तिकाल को लोक-जागरण की अभिव्यक्ति क्यों कहते हैं? सतर्क उत्तर दीजिए।
      • 'भक्ति साहित्य सचमुच सामाजिक-सांस्कृतिक नव जागरण की उपज है' - इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “भक्ति के आन्दोलन की जो लहर दक्षिण से आई उसी ने उत्तर भारत की परिस्थिति के अनुरूप हिन्दू-मुसलमान दोनों के लिए एक सामान्य भक्ति मार्ग की भावना जगाई।” - कथन की समीक्षा कीजिए।
      • रहस्यवाद।
      • प्रमुख हिन्दी भक्त कवियों में लोक-जीवन की अभिव्यक्ति किस प्रकार हुई है ? सप्रमाण उत्तर दीजिए।
      • हिन्दी भक्तिकाव्य मध्यकालीन सांस्कृतिक संवाद की उपज है। इस कथन पर विचार कीजिए।
      • "हिन्दी भक्तिकाव्य मध्यकालीन सामन्ती समय को रचना के स्तर पर चुनौती देता है।" स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी भक्ति आन्दोलन के प्रेरणा स्रोतों पर प्रकाश डालिए।
      • “मध्यकालीन सीमाओं के बावजूद भक्तिकाव्य का स्वर मानवतावादी है।” इस कथन पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी भक्तिकाव्य भारतीय मध्यकालीन जागरण की सशक्त अभिव्यक्ति है। इस कथन पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी भक्तिकाव्य में लोक-भावना की उपस्थिति का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी भक्तिकाव्य सांस्कृतिक मेल-जोल की उपज है। इस कथन पर विचार कीजिए।
      • भक्ति साधना के मूल में लोक धर्म की भूमिका स्पष्ट करते हुए हिन्दी के भक्तिकालीन आन्दोलन के सांस्कृतिक महत्व का निरूपण कीजिए।
      • अनुभूति, अभिव्यक्ति और लोक-प्रभाव की दृष्टि से हिन्दी भक्ति-काव्य की महत्ता प्रतिपादित कीजिए।
      • हिंदी में भक्ति साहित्य निर्माण में प्रेरणा के प्रमुख स्त्रोतों का समीक्षात्मक परिचय दीजिए।
      • हिन्दी-काव्य की निर्गुण भक्ति-धारा अथवा रीति-काव्य धारा की साहित्यिक-सांस्कृतिक देन को स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी की निर्गुण और सगुण भक्ति-काव्य-धाराओं की सामान्य विशेषताओ का परिचय देते हुए हिन्दी के भक्ति-साहित्य के महत्व पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
      • हिन्दी-काव्य की निर्गुण भक्ति-धारा अथवा रीति-काव्य धारा की साहित्यिक-सांस्कृतिक देन को स्पष्ट कीजिए।
      • कबीर की लोकोन्मुखता
      • कबीर का दर्शन।
      • कबीर के राम।
      • कबीर के पद।
      • सूफ़ी काव्यधारा।
      • भारत की भावात्मक एकता के सन्दर्भ में हिंदी सुफी काव्य की सांस्कृतिक एवं सामाजिक चेतना का मूल्यांकन कीजिए।
      • हिन्दी सूफी कवियों का प्रदेय।
      • हिन्दी सूफी काव्य में सांस्कृतिक समन्वय की चेतना।
      • विजयदेव नारायण साही द्वारा किये गये जायसी के मूल्यांकन की समीक्षा कीजिए।
      • जायसी के काव्य में अभिव्यक्त लोक-संस्कृति के तत्त्वों का सोदाहरण निरूपण कीजिए।
      • जायसी कृत कन्हावत : सांस्कृतिक संगम।
      • मलिक मुहम्मद जायसी।
      • जायसी का रहस्यवाद।
      • प्रेमाश्रयी काव्य का रहस्यतत्व।
      • प्रेमाख्यानक काव्य
      • आधुनिक अपेक्षाओं के सन्दर्भ में मध्ययुगीन हिन्दी वैष्णव काव्य की उपादेयता पर विचार कीजिए।
      • सूर की राधा।
      • केशवदास की रामचन्द्रिका में सम्वाद-योजना।
      • कबीर के राम।
      • आधुनिक अपेक्षाओं के सन्दर्भ में मध्ययुगीन हिन्दी वैष्णव काव्य को उपादेयता पर विचार कीजिए।
      • “तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ हिन्दी काव्य-परंपरा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है।” - विचार कीजिए।
    • 2(ग) रीतिकालः रीतिकाव्य, रीतिबद्ध काव्य, रीतिमुक्त काव्य। प्रमुख कवि : केशव, बिहारी, पदमाकर और घनानंद।
      • क्या रीतिकालीन-काव्य दरबारी-काव्य होते हुए भी लोकजीवन से जुड़ा हुआ है? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
      • रीतिकालीन साहित्य के समुचित एवं प्रासंगिक आस्वादन के प्रतिमान क्या हो सकते हैं? आलोचना कीजिए।
      • रीतिकाल और आलंकारिकता।
      • रीतिकवियों का आचार्यत्व।
      • रीतिकाल और दरबारी प्रवृत्तियाँ।
      • रीतिकाल का श्रृंगार पक्ष।
      • रीतिकालीन हिंदी कविता की शक्तियों एवं सीमाओं का सोदाहरण निरुपण कीजिए।
      • रीतिकाल के उत्कर्ष और अपकर्ष के कारण।
      • हिन्दी-काव्य की निर्गुण भक्ति-धारा अथवा रीति-काव्य धारा की साहित्यिक-सांस्कृतिक देन को स्पष्ट कीजिए।
      • रीतिकाल के रीति मुक्त कवि।
      • हिन्दी की रीतिकालीन कविता की प्रमुख प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हुए, इस काल के नामकरण की समस्या पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी साहित्य के रीति काल की प्रमुख प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हुए इस नाम के औचित्य पर विचार कीजिए।
      • दरबारी वातावरण में विकसित रीतिकाव्य की उपलब्धियाँ क्या हैं? मूल्यांकन कीजिए।
      • रीतिकाव्य का वैक्षिष्ट्य।
      • दरबारी संस्कृति और रीतिकाव्य।
      • लक्षणग्रंथ-परम्परा।
      • रीतिमुक्त कवियों का वैशिष्ट्य।
      • “सूर सूर तुलसी शशि उडगन केशवदास”।
      • बिहारी का अर्थगर्भत्व।
      • “बिहारी सतसई” की काव्यगत विशेषताएँ।
      • घनानंद की काव्यगत विशेषताएँ।
    • 2(घ) आधुनिक कालः (क) नवजागरण, गद्य का विकास, भारतेन्दु मंडल। (ख) प्रमुख लेखक : भारतेन्दु, बाल कृष्ण भट्ट और प्रताप नारायण मिश्र।
      • 'हिन्दी नवजागरण' की उपलब्धियों और सीमाओं पर विचार कीजिए।
      • महावीर प्रसाद द्विवेदी।
      • द्विवेदी युग के हिन्दी-नवजागरण की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
      • द्विवेदी-युग की सामाजिक चेतना का परीक्षण कीजिए।
      • महावीर प्रसाद द्विवेदी की संपादन-कला।
      • आधुनिक हिंन्दी काव्य में भारतीय नवजागरण की अभिव्यक्ति किस रूप में हुई? उत्तर दीजिए।
      • द्विवेदी युग की मूल-भावना का स्वर सुधारवादी है। इस कथन की परीक्षा कीजिए।
      • द्विवेदी कालीन काव्य के प्ररणा स्रोत।
      • भारतेन्दु युग की सामाजिक चेतना का स्वरूप क्या है ? स्पष्ट कीजिए।
      • भारतेन्दु-पूर्व ही गद्य।
      • भारतेन्दु कालीन साहित्य में प्राचीन तथा नवीन के विचित्र मिश्रण की झाँकी प्रस्तुत करते हुए उसका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मूल्यांकन कीजिए।
      • भारतेन्दु युग।
      • बालकृष्ण भट्ट एवं प्रताप नारायण मिश्र के वैशिष्ट्य को निर्धारित कीजिए।
      • हिन्दी की विकास-यात्रा और समसामयिक हिन्दी पत्रकारिता।
    • 2(ड.) आधुनिक हिन्दी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ: छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, नवगीत, समकालीन कविता और जनवादी कविता। प्रमुख कवि: मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, गजानन माधव मुक्तिबोध, नागार्जुन।
      • भक्ति और श्रृंगार का समन्वय।
      • प्रतीक और बिम्ब का अन्तर।
      • प्रतीक-योजन।
      • बिम्ब-विधान।
      • प्रतीक और बिम्ब।
      • बिम्ब और प्रतीक।
      • 'नवजागरण और छायावाद' विषय पर एक निबन्ध लिखिए।
      • ''छायावाद के बाद कविता बहुमुखी रूप धारण करने लगती है।'' - इस कथन के आधार पर छायावादोत्तर हिन्दी कविता की प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए।
      • छायावाद की सौन्दर्य-दृष्टि।
      • छायावाद के विकास में आधुनिक भारतीय नवजागरण की प्रेरणा किस रूप में है? स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी छायावादी काव्य के सांस्कृतिक पक्ष पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी छायावादी काव्य के प्रमुख काव्य-रूपों का विवेचन कीजिए।
      • छायावाद की सोंदर्य-चेतना।
      • छायावाद की दार्शनिक पृष्ठभूमि।
      • छायावादी काव्य की स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्तियों पर समीक्षात्मक दृष्टि डालिए।
      • 'छायावाद भारतीय नव जागरण की अभिव्यक्ति है।' प्रमाणित कीजिए।
      • छायावाद का दृष्टिकोण व्यक्तिनिष्ठ, उसका कथ्य आत्मकथन और ‘मैं’ उसकी शैली है। विचार कीजिए।
      • हिन्दी-काव्य के विकास में छायावादी कविता अथवा नयी कविता के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
      • छायावाद और रहस्यवाद।
      • छायावादी काव्य-धारा की विशेषताएँ बताइए। उदाहरण अपेक्षित है।
      • प्रगतिवादी चेतना।
      • प्रगतिवादी काव्य की प्राणवान धारा कभी सूख नहीं गयी; परवर्ती विकास में किन-किन आयामों में वह कालप्रवाहिनी धारा में परिणत होती गई-विश्लेषण कीजिए।
      • हिन्दी प्रगतिवादी समीक्षा का धरातल।
      • हिन्दी प्रगतिवादी काव्य।
      • प्रगतिवाद।
      • प्रगतिवादी काव्य, नव गीत, अ-कविता, गीति-नाट्य, रिपोतजि- इनमें से किसी एक की प्रौढ़ विवेचना कीजिए।
      • साहित्य में प्रगतिवादी दृष्टि को स्पष्ट करते हुए हिन्दी की प्रगतिवादी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियों का विवेचन प्रस्तुत कीजिए।
      • प्रयोगवाद।
      • 'प्रयोगवाद तथा नयी कविता परस्पर पूरक हैं और प्रतिस्पर्धी भी।' सिद्ध कीजिए।
      • 'हिन्दी में प्रतिवाद और प्रयोगवाद दो विचारधाराओं की टकराहट है।' इस कथन पर विचार कीजिए।
      • नयी कविता में फंतासी का प्रयोग।
      • नयी कविता : प्रगति और प्रयोग।
      • “प्रयोगवादी कविता आज के काव्य जीवन का सत्य है।” कथ्य और शिल्प की दृष्टि से इस मान्यता की परीक्षा कीजिए।
      • हिंदी प्रयोगवादी काव्यधारा की प्रमुख प्रवृत्तियों का सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत कीजिए।
      • नयी कविता।
      • विसंगतिबोध।
      • नई कविता में आधुनिकताबोध।
      • “नयी कविता” के नामकरण और काल-सीमा पर टिप्पणी करते हुए, अपनी निकटवर्ती काव्य-धाराओं के संदर्भ में उसकी मौलिक प्रवृत्तियों का विचार कीजिए।
      • हिन्दी-काव्य के विकास में छायावादी कविता अथवा नयी कविता के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
      • नई कविता।
      • समसामयिक हिन्दी कविता में गति-रोध।
      • समसामयिक हिन्दी कविता की प्रमुख प्रवृतियों का समीक्षात्मक परिचय दीजिए।
      • विविध साहित्यिकवादों तथा प्रवृत्तियों से आधुनिक हिन्दी साहित्य की प्राण शक्ति का जो परिचय मिलता है, उसे सोदाहरण विश्लेषण कीजिए।
      • जनवादी कविता की प्रवृत्तियाँ।
      • मैथिलीशरण गुप्त के काव्य पर गाँधी-दर्शन के प्रभाव की दिशा।
      • दिनकर की सामाजिक चेतना
      • “अज्ञेय की कविताओं का केन्द्रीय भाव मानव व्यक्तित्व की समस्या है।” सतर्क उत्तर दीजिए।
      • 'नागार्जुन जनता, धरती और मानव प्रेम के पुजारी हैं' — अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • नागार्जुन अथवा मुक्तिबोध की काव्यगत विशेषताएं रेखांकित कीजिए।
    • (क) उपन्यास और यथार्थवाद।
      • हिन्दी उपन्यास और यथार्थवाद
      • नया हिन्दी उपन्यास यथार्थ की विभिन्न भूमियों का प्रकाशन है। - किस रूप में ? स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी उपन्यास की नयी यथार्थवादी प्रवृत्तियां क्या हैं ? स्पष्ट कीजिए।
      • नया हिन्दी उपन्यास अथवा नयी हिन्दी कहानी की यथार्थवादी प्रवृत्तियों पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी में उपन्यास के विकास पर सम्यक, विचार करते हुए यथार्थ वादी उपन्यास की शिल्पविधि का विश्लेषण कीजिए।
      • हिन्दी उपन्यास साहित्य के क्रमिक विकास की रूपरेखा देते हुए उसमें सामाजिक यथार्थ के अंकन की समीक्षा प्रस्तुत कीजिए।
    • (ख) हिन्दी उपन्यासों का उद्भव और विकास।
      • 20वीं शताब्दी पूर्वार्द्ध के हिन्दी उपन्यासों के कथ्य के आधार पर स्वतंत्रता के दर्शन की व्याख्या कीजिए।
      • आंचलिक हिन्दी उपन्यास की विशेषताओं पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
      • हिन्दी के आंचलिक उपन्यासकार।
      • हिन्दी के मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार।
      • नया हिन्दी उपन्यास किस प्रकार पूर्व परम्परा से भिन्न हैं ? स्पष्ट कीजिए।
      • “उपन्यास आधुनिक समय में प्राचीन महाकाव्य का स्थानापन्न है।” इस कथन पर विचार करते हुए हिन्दी उपन्यास की अद्यतन प्रवृत्तियों का विवेचन कीजिए।
      • हिंदी उपन्यास अथवा हिन्दी कहानी की नवीनतम प्रवृत्तियों पर आलोचनात्मक दृष्टि डालिए।
      • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली गद्य का विकास।
      • हिन्दी उपन्यास साहित्य के विकास-क्रम का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
    • (ग) प्रमुख उपन्यासकार: प्रेमचन्द, जैनेन्द्र, यशपाल, रेणु और भीष्म साहनी।
      • हिन्दी-आलोचना अथवा हिन्दी-उपन्यास का विकास-क्रम निरूपित कीजिए।
      • हिंदी उपन्यास के विकास में प्रेमचंद के योगदान का आकलन कीजिए।
      • प्रेमचन्द की कहानियों में चित्रित “आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’।
      • “प्रेमचन्द के उपन्यास भारतीय कृषक जीवन के सच्चे दस्तावेज़ हैं।” इस कथन की सार्थकता पर विचार कीजिए।
      • प्रेमचन्द की कहानियों का मूल स्तर।
      • “गोदान' तक आते-आते प्रेमचन्द का आदर्शवाद से पूरी तरह मोहभंग हो जाता है।'” इस कथन का परीक्षण कीजिए।
      • प्रेमचन्द की प्रासंगिकता।
      • जैनेन्द्र कुमार का गद्य-लेखन व्यक्ति की गुम होती पहचान को उभारकर सामने रखता है - विवेचन कीजिए।
      • उपन्यासकार जैनेन्द्र की नारी-दृष्टि।
      • “जैनेन्द्र के नारी चरित्र” विषय पर एक निबंध लिखें।
      • जैनेन्द्र की कहानी-कला की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
      • हिन्दी उपन्यास के विकास में यशपाल के योगदान पर विचार कीजिए।
      • यशपाल की विचारधारा पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
      • “‘झूठा सच’ महाकाव्योचित औदात्य से सम्पन्न उपन्यास है।” इस कथन का विवेचन कीजिए।
      • “‘झूठा सच’ के आधार पर यशपाल की जीवन-दृष्टि।”
      • ‘रेणु’ की कथा-भाषा।
      • ‘मैला आँचल’ के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
      • रेणु के उपन्यासों के आधार पर उनकी विचारधारा पर प्रकाश डालिए।
      • आंचलिक उपन्यास : शक्ति और सीमा।
      • आंचलिक उपन्यास : शक्ति और सीमा।
      • 'चीफ की दावत' कहानी नौकरशाही में मानव-मूल्यों का अधःपतन तथा दो पीढ़ी के अंत का सूक्ष्म निरूपण पाया जाता है। सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
      • भीष्म साहनी के उपन्यासों में निहित सामाजिक चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • ‘चीफ की दावत’ में नौकरशाही में व्याप्त स्वार्थ-लिप्सा के मनोविज्ञान का उद्घाटन कीजिए।
      • भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ का महत्व।
    • (घ) हिन्दी कहानी का उद्भव और विकास।
      • साठोत्तरी हिन्दी-कहानी।
      • अकहानी आन्दोलन के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
      • स्वातंत्र्योतर हिन्दी कहानी की गति और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
      • उत्तर शती की हिन्दी कहानी पर एक समीक्षात्मक अनुशीलन प्रस्तुत कीजिए।
      • समान्तर कहानी की प्रवृत्तियों का परिभ्रय दीजिए।
      • हिंदी उपन्यास अथवा हिन्दी कहानी की नवीनतम प्रवृत्तियों पर आलोचनात्मक दृष्टि डालिए।
      • हिन्दी नई कहानी की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
      • नई कहानी आंदोलन की प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।
      • प्रवृत्तिगत दृष्टि से क्या नई कहानी पूर्ववर्ती कहानी की मात्र निरंतरता है या विच्छेद? तर्क सम्मत उत्तर दीजिए।
      • इस बात पर सम्यक्‌ रूप से विचार कीजिए कि नई कहानी की बाला अनुभव से स्वयं गुजरने की यात्रा है।
      • नयी कहानी
      • नयी कहानी की नवीनता में स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज की बदलती स्थितियों का ही आकलन हुआ है - श्रेष्ठतम कहानियों के आधार पर इस तथ्य की पुष्टि कीजिए।
      • नयी हिन्दी कहानी पूर्ववर्ती कहानी से किस रूप में भिन्न है? स्पष्ट कीजिए।
      • हिंदी कहानी में नए प्रयोग
      • 'नयी कहानी’ आन्दोलन।
      • हिन्दी कहानी के क्रमिक विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए “नई कहानी” में युगसन्दर्भों के उद्घाटन की समीक्षा कीजिए।
      • हिन्दी-समीक्षा अथवा नयी हिन्दी कहानी की वर्तमान गतिविधि पर आलोचनात्मक दृष्टिपात कीजिए।
    • (ड़) प्रमुख कहानीकार: प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, मोहन राकेश और कृष्णा सोबती।
      • प्रेमचंद के उपन्यास लेखन में उनकी यथार्थ दृष्टि का विकास किस रूप में हुआ है? स्पष्ट कीजिए।
      • प्रेमचंद के उपन्यासों में अभिव्यक्त यथार्थवाद के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
      • “प्रेमचंद की कहानियाँ व्यापक सामाजिक आधार पर विकसित हुई हैं” — कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “वास्तव में हिन्दी उपन्यास का प्रारम्भ प्रेमचंद से होता है।” — इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • यथार्थ को संवेदन के धरातल पर प्रस्तुत करने में प्रेमचन्द की कहानियाँ विशिष्ट हैं — इस कथन पर विचार कीजिए।
      • “जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ शिल्प का ताजमहल हैं।” इस कथन की सत्यता पर प्रकाश डालिए।
      • अज्ञेय' की कहानियों की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
      • ‘आधे अधूरे’ के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
      • कृष्णा सोबती के उपन्यासों की स्त्री-दृष्टि पर वर्तमान स्त्री-विमर्श के संदर्भ में विचार कीजिए।
      • कृष्णा सोबती के उपन्यासों में चित्रित नारी-चेतना पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
      • कृष्णा सोबती के कथा-संसार पर प्रकाश डालिए।
      • कृष्णा सोबती के कहानी-लेखन में स्त्री-विमर्श का संदर्भ बताइए।
      • कृष्णा सोबती की कहानियाँ : कथ्य का वैविध्य।
      • कृष्णा सोबती की कहानियों के आधार पर उनकी कथा-भाषा पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
      • महिला कथा-साहित्यकार कृष्णासोबती।
      • निर्मल वर्मा की कहानियों में व्यक्त स्मृति-पक्ष का विवेचन कीजिए।
      • 'परिन्दे' कहानी के आधार पर निर्मल वर्मा की कहानी-कला की समीक्षा कीजिए।
      • जैसे कहीं बहुत दूर बरफ़ की चोटियों से परिन्दों के झुंड नीचे अनजान देशों की ओर उड़े जा रहे हैं। इन दिनों अक्सर उसने अपने कमरे की खिड़की से उन्हें देखा है धागे से - बँधे चमकीले लटुओं की तरह वे एक लम्बी टेढ़ी-मेढ़ी क़तार में उड़े जाते हैं।
      • “नयी कहानी” की अवधारणा के संदर्भ में निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ की समीक्षा कीजिए।
      • “उनकी बात कुछ समझ में नहीं आती। हमेशा दो बातें एक-दूसरे से उल्टी कहते हैं। कहते थे कि इस बार मुझे छः-सात महीनों की छुट्टी लेकर आराम करना चाहिए, लेकिन अगर मैं ठीक हूँ तो भला इसकी क्या जरूरत है।”
      • 'चीफ की दावत' कहानी नौकरशाही में मानव-मूल्यों का अधःपतन तथा दो पीढ़ी के अंत का सूक्ष्म निरूपण पाया जाता है। सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
      • “चीफ़ की दावत' मध्यवर्गीय अवसरवादिता और मानवीय मूल्यों के विघटन का जीवंत दस्तावेज़ है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
      • ‘चीफ की दावत' में नौकरशाही में व्याप्त स्वार्थ-लिप्सा के मनोविज्ञान का उद्घाटन कीजिए।
      • गाँधीवादी विचारधारा के आलोक में बावनदास के चरित्र का विश्लेषण कीजिए।
    • (क) हिन्दी नाटक का उद्भव और विकास।
      • स्वातंत्र्योत्तर हिंदी रंगमंच के विकास में लोक-नाट्य की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी रंगमंच के विकास की संक्षिप्त रूपरेखा दीजिए।
      • हिन्दी नाटक के उद्गम और विकास पर प्रकाश डालिए।
      • स्वतंत्रता-संग्राम के सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आदर्शों का अनुसरण स्वतंत्रता-पूर्व के हिन्दी नाटकों का लक्ष्य रहा है - सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
      • नाटक : एक गतिशील विधा।
      • नाटक और रंगमंच का सम्बन्ध।
      • समसामयिक हिन्दी नाटक : कितना नया, कितना पुराना
      • हिन्दी नाटक और रंगमंच के विकास में पूर्वी और पश्चिम का आकलन कीजिए।
      • हिन्दी निबन्ध अथवा हिन्दी नाटक के बहुमुखी विकास की परख कीजिए। लेखकों और रचनाओं का भी यथावश्यक उल्लेख कीजिए।
      • हिन्दी नाटक और रंगमंच के नवीन विकास-चरण।
      • हिंदी नाटक साहित्य के क्रमिक विकास पर प्रकाश डालिए।
    • (ख) प्रमुख नाटककार: भारतेन्दु, जयशंकर प्रसाद, जगदीश चंद्र माथुर, रामकुमार वर्मा, मोहन राकेश।
      • भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटकों में चित्रित राष्ट्रीय-चेतना को स्पष्ट कीजिए।
      • भारतेन्दु के नाट्य-कर्म की लोकोन्मुखता।
      • नाट्य-कला की दृष्टि से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के मौलिक नाटकों का विवेचन कीजिए।
      • भारतेन्दु ने अपने नाटकों में संस्कृत की चख्रिचित्रण पद्धति का अनुसरण किया है, सोदाहरण समझाइए।
      • भारतेन्दु के ‘अँधेर नगरी’ नाटक की समकालीनता।
      • "जयशंकर प्रसाद के नाटक तत्कालीन राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति का समर्थ रूप हैं।" समीक्षा कीजिए।
      • मंचन की दृष्टि से जयशंकर ‘प्रसाद’ के नाटकों का मूल्यांकन कीजिए।
      • प्रसाद के नाटकों में व्यक्त राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना को स्पष्ट कीजिए।
      • जयशंकर प्रसाद के नाटकों की ऐतिहासिकता पर विचार कीजिए।
      • नाटककार जयशंकर प्रसाद के नाटकों में गीति-योजना।
      • जगदीशचन्द्र माथुर की नाट्य-कला का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
      • रंगमंचीयता की दृष्टि से जगदीश चन्द्र माथुर के नाटकों का विवेचन कीजिए।
      • जगदीश चन्द्र माथुर का नाट्य-शिल्प।
      • मोहन राकेश के नाटकों में व्यक्त आधुनिक मनुष्य के नैतिक द्वंदों की विवेचना कीजिए।
      • मोहन राकेश की नाट्य-कला और मंच-सज्जा पर प्रकाश डालिए।
      • हिन्दी रंगमंच के विकास में मोहन राकेश का योगदान बताइए।
      • मोहन राकेश के ऐतिहासिक नाटकों की मंच-सज्जा का विवेचन कीजिए।
      • मोहन राकेश के नाट्य-शिल्प की “आधे अधूरे" नाटक के आधार पर समीक्षा कीजिए।
      • मोहन राकेश के नाट्यकर्म की समीक्षा कीजिए।
      • मोहन राकेश के नाट्य-शिल्प पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
      • नाटक और रंगमंच का सम्बन्ध स्पष्ट करते हुए मोहन राकेश के नाटकों की रंगमंच की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।
    • (ग) हिन्दी रंगमंच का विकास।
      • हिन्दी रंगमंच के विकास से संबंधित प्रमुख बहसों की विवेचना कीजिए।
      • हिन्दी रंगमंच का उद्भव और विकास।
      • हिन्दी क्षेत्र की लोकनाट्य पद्धतियों का परिचय देते हुए हिन्दी रंगमंच की विकास यात्रा का मूल्यांकन कीजिए।
      • हिन्दी रंगमंच : दशा, दिशा, सम्भावना।
      • हिन्दी-रंगमंच की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालिए।
      • हिन्दी रंगमंच का विकास।
      • हिंदी रंगमंच का विकास।
      • हिन्दी-रंगमंच की कठिनाइयाँ।
      • नाटक और रंगमंच का सम्बन्ध।
      • रंगमंचीय आन्दोलनों का समकालीन हिन्दी नाट्य-लेखन पर जो प्रभाव पड़ा, उसको स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी रंगमंच की उपलब्धियों और सीमाओं पर विचार कीजिए।
      • समसामयिक हिन्दी रंग-मंच की उपलब्धियों और सीमाओं का विवेचन कीजिए।
      • हिन्दी रंगमच : कुछ सुझाव।
      • हिन्दी रंगमंच की स्थिति।
      • हिन्दी नाटक और रंगमंच के विकास में पूर्वी और पश्चिम का आकलन कीजिए।
      • हिन्दी रंगमंच का स्वरूप और संभावनाएं।
      • हिन्दी नाटक और रंगमंच के नवीन विकास-चरण।
      • हिन्दी रंगमंच का विकास।
    • (क) हिन्दी आलोचना का उद्भव और विकास- सैद्धांतिक, व्यावहारिक, प्रगतिवादी, मनोविश्लेषणवादी आलोचना और नई समीक्षा।
      • हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना का उदय और आरंभिक आलोचक।
      • “पाश्चात्य प्रभावों के कारण हिन्दी की स्वतंत्र समीक्षा-पद्धतियों का विकास नहीं हो पा रहा है।” इस कथन के सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त कीजिए।
      • हिन्दी समीक्षा का धरातल।
      • हिन्दी के रसवादी एवं मार्क्सवादी समीक्षादर्शो का तुलनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
      • हिन्दी-समीक्षा के विकासशील स्वरूप की विशद समीक्षा कीजिए।
      • शुक्लोत्तर समीक्षा।
      • हिन्दी-आलोचना अथवा हिन्दी-उपन्यास का विकास-कम निरूपित कीजिए।
      • हिन्दी-समीक्षा अथवा नयी हिन्दी कहानी की वर्तमान गतिविधि पर आलोचनात्मक दृष्टिपात कीजिए।
      • सैद्धान्तिक आलोचना।
      • हिन्दी की व्यावहारिक आलोचना का विवेचन कीजिए।
      • प्रगतिवादी आलोचना को वर्तमान समय में किस प्रकार की चुनौतियाँ मिल रही है? सोदाहरण विवेचना कीजिए।
      • हिन्दी की प्रगतिवादी समीक्षा।
      • प्रगतिवादी आलोचना का स्वरूप।
      • प्रगतिवादी आलोचना एवं पूर्वाग्रह।
      • हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना।
      • मनोविश्लेषणवादी आलोचना।
      • समकालीन चिंतकों की दृष्टि में कबीर का साहित्य।
      • हिन्दी समीक्षा की नवीनतम प्रवृत्तियों पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी समीक्षा का नया मुहावरा।
      • पुरानी और नयी समीक्षा के दृष्टिकोणों का तात्विक अन्तर निरूपित कीजिए।
      • हिन्दी की नयी समीक्षा।
    • (ख) प्रमुख आलोचक - रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नगेन्द्र।
      • आचार्य रामचंद्र शुक्ल की साहित्येतिहास-दृष्टि के प्रमुख बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिए।
      • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-पूर्व हिंदी साहित्य इतिहास का लेखन
      • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की सैद्धांतिक आलोचना
      • रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना-दृष्टि पर स्वाधीनता आंदोलन के प्रभाव की चर्चा कीजिए।
      • हिन्दी साहित्य की आलोचना परंपरा मूलत: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की मान्यताओं का ही खंडन-मंडन है - युक्तियुक्त विवेचन कीजिए।
      • हिन्दी में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की समीक्षा के ऐतिहासिक महत्त्व पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी साहित्य में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का वही महत्व है, जो उपन्यासकार प्रेमचन्द और कवि निराला का, आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
      • आचार्य शुक्ल के काव्य-विवेक पर प्रकाश डालिये।
      • डॉ. राम विलास शर्मा की आलोचना-दृष्टि से आचार्य शुक्ल के काव्य-विवेक का क्या संबंध है?
      • हिंदी आलोचना के विकास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान पर प्रकाश डालिए।
      • आलोचक रामचन्द्र शुक्ल।
      • क्या आचार्य रामचन्द्र शुक्ल रसवादी दृष्टि और लोकमंगल की अवधारणा में समन्वय करने में सफल हुए हैं? युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • समीक्षक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के प्रदेय का मूल्यांकन कीजिए।
      • आचार्य शुक्ल-सम्मत संतमत या निर्गुणमत के घटकों का उल्लेख करते हुए परवर्ती चिन्तकों की प्रतिक्रिया व्यक्त कीजिए।
      • हिन्दी आलोचना के विकास-क्रम में पं० रामचन्द्र शुक्ल का योगदान निर्धारित कीजिए।
      • हजारी प्रसाद द्विवेदी का हिंदी आलोचना में योगदान।
      • हजारीप्रसाद द्विवेदी के आलोचनात्मक प्रतिमानों पर प्रकाश डालिए।
      • हिन्दी आलोचना और हजारी प्रसाद द्विवेदी।
      • रामविलास शर्मा की आलोचना-दृष्टि का सांस्कृतिक पक्ष।
      • रामविलास शर्मा के आलोचना-कर्म के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
      • रामविलास शर्मा के आलोचना-कर्म की सीमाओं का वर्णन कीजिए।
      • “वामपंथी लेखकों की रामविलास शर्मा ने निष्पक्ष समीक्षा नहीं की है।” इस कथन का परीक्षण कीजिए।
      • डॉ. रामविलास शर्मा के आलोचनात्मक विवेक पर एक निबंध लिख़िये।
      • हिन्दी-आलोचना और डॉ. रामविलास शर्मा।
      • आलोचना के क्षेत्र में डॉ० रामविलास शर्मा के योगदान पर एक विवेचनात्मक निबन्ध लिखिए।
      • डॉ. नगेन्द्र का हिन्दी आलोचना को योगदान।
      • नगेन्द्र के आलोचना-कर्म की प्रमुख विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
      • निम्नलिखित आधारों पर डॉ. नगेन्द्र की आलोचकीय शक्ति-क्षमता का मूल्यांकन कीजिए : (अ) पाश्चात्य सैद्धात्तिक आलोचना। (आ) भारतीय काव्यशास्त्रीय विवेचना। (इ) व्यावहारिक आलोचना।
      • आलोचक नगेंद्र।
    • ललित निबंध
      • हिन्दी में ललित निबंध साहित्य की विकास यात्रा को समझाते हुए विवेकी राय का योगदान स्पष्ट कीजिए।
      • कुबेरनाथ राय के ललित निबंधों के सांस्कृतिक पक्ष पर विचार कीजिए।
      • “विद्यानिवास मिश्र के ललित निबंध भारतीय संस्कृति के आख्यान हैं।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “ललित निबन्धकार' के रूप में हजारी प्रसाद द्विवेदी की निबन्ध-कला का विवेचन कीजिए।
      • हिन्दी के ललित निबंधकार और कुबेरनाथ राय' विषय पर एक समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुत कीजिए।
      • हिन्दी ललित निबन्ध के विकास में हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रदेय को रेखांकित कीजिए।
      • हिन्दी के ललित निबंधकार।
      • हिन्दी में ललित निबन्ध साहित्य का विकास स्पष्ट करते हुए उसमें हजारी प्रसाद द्विवेदी का योगदान स्पष्ट कीजिए।
      • ललित निबंध।
    • रेखाचित्र
      • रेखाचित्र और संस्मरण का अंतर स्पष्ट करते हुए बनारसीदास चतुर्वेदी के संस्मरण साहित्य का परिचय दीजिए।
      • महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों के महत्व का आकलन कीजिए।
      • हिन्दी साहित्य में रेखाचित्र के इतिहास का परिचय देते हुए महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
      • महादेवी के रेखाचित्रों की विशेषताएँ लिखिए।
      • हिन्दी में रेखाचित्र और संस्मरण।
      • रेखाचित्र : स्वरूप।
      • हिन्दी में रेखाचित्र और संस्मरण-साहित्य।
    • संस्मरण
      • महादेवी वर्मा के संस्मरणों के महत्त्व का आकलन कीजिए।
      • संस्मरण साहित्य के विकास पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
      • कांतिकुमार जैन के संस्मरणों के वैशिष्ट्य का निरूपण कीजिए।
      • महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों और संस्मरणों की जीवंतता पर प्रकाश डालिए।
      • महादेवी वर्मा के संस्मरणों के वैशिष्ट्य का संक्षेप में निरूपण कीजिए।
      • कांतिकुमार जैन के संस्मरणों के वैशिष्ट्य का निरूपण कीजिए।
    • यात्रा वृत्तान्त
      • हिंदी के प्रमुख यात्रा-वृत्तांतों का वैशिष्ट्य।
      • हिन्दी के यात्रा-वृत्तान्त की विकास-यात्रा पर प्रकाश डालिए।
      • “अज्ञेय' के यात्रा-वर्णन उनके व्यक्तित्व का दर्पण हैं” -- इस कथन का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • हिन्दी के किसी एक यात्रावृतांत लेखक की लेखनगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
      • हिन्दी के प्रमुख यात्रा-वृत्तान्तों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
      • राहुल सांकृत्यायन के यात्रा-साहित्य को ‘महापंडित की महायात्रा' कहने का औचित्य क्या है? युक्तिसंगत उत्तर दीजिए।
    • कबीर
      • 'कबीर ग्रन्थावली' के आधार पर कबीर के आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डालिए।
      • 'कबीर वाणी के डिक्टेटर हैं' इस अभिमत के परिप्रेक्ष्य में कबीर की भाषा पर विचार कीजिए।
      • कबीर-वाणी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कितनी प्रासंगिक है ? उदाहरण सहित लिखिए।
      • “कबीर वाणी के डिक्टेटर हैं।” इस कथन के आलोक में कबीर की अभिव्यंजना शैली पर विचार कीजिए।
      • कबीरदास के रचना-संसार में निहित समाज-चिंता पर प्रकाश डालिए।
      • “कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है।” इस कथन पर विचार कीजिए।
      • नीरस निर्गुण मत में कबीर ने 'ढाई आखर' जोड़ने की पहल किससे प्रेरित होकर की और क्यों ? अपने कथन की पुष्टि कीजिए।
      • 'कबीर की कविता “अस्वीकार'' के साथ-साथ स्वीकार की भी कविता है।'— इस कथन के संदर्भ में कबीर काव्य का विश्लेषण कीजिए।
      • “भक्ति-आंदोलन का जन-साधारण पर जितना व्यापक प्रभाव हुआ, उतना किसी अन्य आंदोलन का नहीं” — इस कथन की सार्थकता पर विचार करते हुए कबीर की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
      • क्या कबीर ने अनीश्वरत्व के निकट पहुँच चुके भारतीय जनमानस को निर्गुण ब्रह्म की भक्ति की ओर प्रवृत्त होने की उत्तेजना प्रदान की? तर्क सम्मत उत्तर दीजिए।
      • “कबीर जनता के कवि थे और जनता के प्रति उनके हृदय में असीम करुणा और अनुराग का भाव था।” इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
      • “कबीर की कविता में प्रेम केवल संवेदना ही नहीं, अवधारणा के रूप में भी है...” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
      • “कबीर की भाषा सधुक्कड़ी थी” --- इस कथन के औचित्य पर सोदाहरण विचार कीजिए।
      • “सामंती समाज की जड़ता को तोड़ने का जैसा प्रयास कबीर ने किया वैसा प्रयास कोई दूसरा नहीं कर सका” — इस कथन के आधार पर कबीर के कृतित्व का सोदाहरण मूल्यांकन कीजिए।
      • वर्तमान सामाजिक संदर्भों में कबीर के काव्य की प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।
      • “कबीर शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा अनुभव-ज्ञान को अधिक महत्त्व देते थे।” इस मत की समीक्षा कीजिए।
      • “कबीर एक ओर तो अद्वैतवाद के समर्थक हैं और दूसरी ओर भगवद्भक्ति के दृढ़ स्तम्भ।” समीक्षा कीजिए।
      • निर्गुण-भक्ति धारा में कबीर का स्थान निर्धारित करते हुए कबीर की साधना-पद्धति पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
      • “कबीरदास का मूलरूप उनका भक्त रूप है, कविरूप घलुआ मात्र है।” -डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी के इस कथन के संबंध में सोपपत्ति अपना मन्तव्य पुष्ट कीजिए।
      • आचार्य शुक्ल को तुलसी की भक्ति-पद्धति में रहस्यवादिता के राहित्य और कबीर की भक्ति में रहस्यवादिता के साहित्य की स्थिति क्यों माननी पड़ी? उनकी उपपत्तियों को प्रस्तुत कीजिए।
      • कबीर की भक्ति स्वदेशी है या विदेशी--तर्क और प्रमाण के साथ अपना पक्ष प्रस्तुत कीजिए।
      • कबीर भाषा के डिक्टेटर थे। इस कथन के आधार पर कबीर की भाषा का विवेचन कीजिए।
      • “कबीर स्वभाव से संत, प्रकृति से उपदेशक और ठोकपीट कर कवि हो गए हैं।” इस कथन के औचित्य की परीक्षा कीजिए।
      • कबीरदास के दार्शनिक सिद्धान्तों के स्रोतों का सप्रमाण निरूपण कीजिए।
      • 'युगावतार की शक्ति और विश्वास लेकर वे पैदा हुए थे और युगप्रवर्तक की दृढ़ता उनमें विद्यमान थी, इसलिये वे युगप्रवर्तक न कर सके। कबीर के साहित्य के सन्दर्भ में इस कथन की युक्तियुक्त मीमांसा कीजिए।
      • “कबीर के काव्य में जितनी प्रखरता और तीखापन है, उतनी ही भाव-प्रवणता एवं सहजता भी है।” इस कथन की युक्तियुक्त एवं उदाहरण सहित विवेचना कीजिए।
      • कबीर ने एक ऐसे भक्ति का प्रतिपादन किया जिसमें परमात्मा की एकता के आधार पर मनुष्यों की एकता की प्रतिष्ठा की गयी थी – इस कथन पर विचार कीजिए।
      • “कबीर के भाव सीधे हृदय से निकलते हैं और श्रोता पर सीधे चोट करते हैं” - इस कथन के प्रकाश में कबीर के काव्य की शक्ति का विवेचन कीजिए।
      • 'कबीर की आंधी से अधिक रचना दार्शनिक पद्य मात्र है जिसको कविता नहीं कहना चाहिए।’ निर्धारित भ्रंश से उदाहरण देकर इस कथन की युक्तियुक्त परीक्षा कीजिए।
      • “गुरुदेव की अंग', 'सुमिरण को अंग' और “बिरह को अंग" के आधार पर कबीर की भक्ति-भावना का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • “रसिको की सम्मति में कबीर का रहस्यवाद रूखा है, उनका पाथुर्य भाव भी उन्हें फीका लगता है। उनके चित्रों में उन्हें अनेकरूपता नहीं दिखाई देती”। इस कथन की युक्तियुक्त परीक्षा कीजिए।
      • “कबीर को वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने से अंकुरित हुई थी।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
      • “कबीर दास बहुत कुछ को अस्वीकार करने के अपार साहस लेकर अवतीर्ण हुए थे।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
      • “कबीर की रचना उपदेश तो देती है, पर भावोंभेष नहीं लाती।” इस उक्ति से आप कहां तक सहमत हैं?
      • तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन करते हुए कबीर के काव्य के उन तत्वों का विवेचन कीजिए जिनके कारण उन्हें एक क्रान्तिकारी लोक कवि कहा जाता है।
      • कबीर के काव्य के सामाजिक व दार्शनिक पक्षों का विवेचन कीजिए।
      • कबीर की भाषा।
    • कबीर की रचनाएँ
      • जग हठवाड़ा स्वाद ठग, माया बेसाँ लाई। रामचरन नीका गही, जिनि जाइ जनम ठगाइ॥ कबीर माया मोहनी, जैसी मीठी खाँड़। सतगुरु कृपा भई, नहीं तो करती भाँड़॥
      • पीछै लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥ दीपक दीया तेल भरि, बाती दई साँच। पूरा किया बिसाहुणां, बहुरि न आँवौं हाट॥
      • कबीर प्रेम न चषिया, चषि न लीया साव। सूनें घर का पाहुणां, ज्यूं आया त्यूं जाव॥ कबीर चित चमंकिया, चहूं दिसि लागी लाइ। हरि सुमिरण हाथूं घड़ा, बेगे लेहु बुझाइ॥
      • जाका गुर भी अंधला, चेला है जा चंध। अंधे अंधा ठेलिया, दृन्यूं कूप पडंत॥ ना गुर मिल्या न सिष भया, लालचि खेल्या दाव। दून्यूं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥
      • जौ रोऊँ तौ बल घटे, हँसौं तौ राम रिसाइ। मन ही मांहिं बिसूरणां, ज्यूं घुंण काठहि खाइ॥ हँसि हँसि कन्त न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ। जो हाँसे ही हरि मिले, तौ नहीं दुहागनि होइ॥
      • लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु भार॥ कहौ संतो क्यूँ पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार॥ सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सके, कै साईं कै चित्त॥
      • जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस, पुनि रसना नहीं राम। ते नर इस संसार में, उपजि षये बेकाम॥ कबीर प्रेम न चषिया, चषि न लीया साव। सूने घर का पाहुणा, ज्यूं आया त्यूं जाव॥
      • माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवै पड़ंत। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत।। कबीर सूता क्या करे, उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख।।
      • अंबर कुंजां कुरलियाँ, गरजि भरे सब ताल। जिनि षैं गोबिंद बीछुटे, तिनके कौण हवाल।। चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति। जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति।।
      • पीछे लागा जाइ था, लोक बेद के साथि। आगैं थें सतगुरं मिल्या, दीपक दीया हाथि। दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहुणाँ, बहुरि न आवों हट्ट।।
      • बिरहा बुरहा जिति कहौ, बिरहा है सुलितान। जिस घर बिरहा न संचरै, सो घर सदा मसान।। इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव। लोही सींचौ तेल ज्यूँ, कब मुख देखौ पीव।।
      • अगनि जो लागी नीर मैं, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि विचारि।। दौ लागी साझर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह. न पालवै, सतगुर गया लगाइ॥ संमदर लागी आगि, नदिया जल कोइला भई। द देखि कबीरा जागि, मंछी रूषां चढ़ि गई।।
      • ना गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव। दुन्यू बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव।। चौंसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविंद नांहिं ॥ निस अँधियारी कारणैं, चौरासी लख चंद। अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहिं मंद।।
      • बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागे कोइ। राम बियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ।। बिरह भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव। साधू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव।। सब रग तंत रबाब तन, बिरह बचावै नित्त। और न कोई सुणि सकै, कै साईं कै चित्त।।
      • पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर। सतगुरु दाव बताइया, खेलै दास कबीर।। अंबर कुंजां कुरलियाँ, 'गरजि भरे सब ताल। जिनषैं गोविंदु बीछुरै, तिनके कौण हवाल।। सुरति समांणी निरति मैं, अजपा माहैं जाप। लेख समाणा अलेख मैं, यूँ आपा माहैं आप।।
      • सिव सकती दिसि कौंण जु जोवै, पछिम दिस उठै धूरि। जल मैं स्यंघ जु घर करै, मछली चढ़ै खजूरि॥ सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणाँ अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥ सायर नाहीं सीप बिन, स्वाति बूँद भी नाहिं। कबीर मोती नीपजै, सुन्नि सिषर गढ़ माँहिं॥
      • सतगुर मार्‌या बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि। अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूंटि। चोपडि मांडी चौहटे, अरध उरव बाजार। कहै कबीरा राम जन, खेलौ संत विचार ॥ रात्यूँ रूंनी विरहनीं, ज्यू बंचौ कूं कुज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या विरहा पुज ॥ नैनी नीझरि लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूं पिव पिव करों, कवरू मिलहुगे राम ॥
      • सतगुरु की महिमा अनंत अनंत किया उपगार। लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावण हार।। कबीर सुमिरण सार है, और सकल जंजाल। आदि अंति सब सोधिया दूजा देखौं काल॥ आषड़ियाँ झांई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि। जीभड़ियाँ छाला पड्या, राम पुकारि-पुकारि।।
      • पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथ। आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथ।। समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गई।। अंबर कुँजां कुरलियाँ गरजि भरे सब तल। जिनि पैं गोविद बीछुटे, तिनके कौण हवाल।।
      • पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान। कहिबे कूं सोभा नहीं, देख्याही परवान॥ अगम अगोचर गमि नहीं, तहां जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी, तहां पाप पुन्य नहीं छोति॥ हदे छाड़ि बेहदि गया, हुवा निरंतर बास। कवल ज फूल्या फूल बिन, को निरषै निज दास॥ कबीर मन मधुकर भया, रह्या निरंतर बास। कवल ज्यू फूल्या जलह बिन, को देखै निज दास॥
      • सतगुरु बपुरा क्या करे, जे शिषही माँहि चूक। भावै त्यूँ प्रमोद लै, ज्यूं बंसि बजाई फूक ॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ बिरह भुवंगम तन बसै मन्त्र न लागै कोई। राम बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होई।।
      • कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूँण। जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण॥ मेरा मन सुमिरै राम कूँ, मेरा मन रामहिं आहि। अब मन रामहिं ह्नै रह्या, सीस नवावौं काहि। चकवी बिछुरी रेन की, आइ मिली परभाति। जों जन बिछुरे राम से, ते दिन मिले न 'राति॥
      • बिरहा बुरहा जिनी , बिरहा.है सुलतान। जिह घडि विरह न संचरे, सो घट सदा मसान ! चहु तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाऊं। लेखणि करू करंक की, लिखि लिखि राम पठाऊं ॥ हेरत हेरत हे सखी, रह्मा कबीर हिराइ। बूंद समानी समद मैं, सो कत हेरी जाइ ॥
      • कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई। अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥ कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाति। तेल घट्या बाती बुझी, (तब) सोवैगा दिन राति ॥ राम रसाइन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल। कबीर पीवण दुलभ है, मागै सीस कलाल।।
      • कबीर राम ध्याइ लै, जिभ्या सौं करि मंत। हरि साग जिनि बीसरै, छीलर देखि अनंत। नैंना नीझर लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं, कबरू मिलहुगे राम॥ सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणा अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥
      • चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुरु दीन्ही धीर। निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर। यहु तन जालौ मसि करौं, लिखौं राम का नाउँ। लेखणि करूँ करंक की, लिखि लिख राम पठाऊँ॥ कया कमंडल भरि लिया, उज्जल निर्मल नीर। तन मन जोबन भरि पिया, प्यास न मिटी सरीर॥
      • सुरति समाँणो निरति मैं, निरति रही निरधार। सुरति निरति परचा भया, तब खूले स्यंभ दुवार॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति॥
      • सुरति ढीकुली लेज ल्यो, मन नित ढोलन हार। कँवल कुवाँ मैं प्रेम रस, पीवै बारंबार॥ गंग जमुन उर अंतरै, सहज सुंनि ल्यौ घाट। तहाँ कबीरै मठ रच्या, मुनि जन जोवैं बाट॥
      • चौंसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविंद नांहिं॥ सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥ समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गई॥
      • दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥ कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥ फाड़ि फुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहिं भेषा हरि मिलैं, सोइ सोइ भेष कराउँ॥ झल उठा झोली जली, खपरा फूटिम फूटि। जोगी था सो रमि गया, आसणि रही विभूत॥
      • रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि। देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥ अगनि जू लागि नीर में, कंदू जलिया झारि। उतर दषिण के पंडिता, रहे विचारि बिचारि॥ दौ लागी साइर जल्या, पंषी बैठे आइ। दाधी देह न पालवै सतगुर गया लगाइ॥ देवल माहैं देहुरी, तिल जे है बिस्तार। माहैं पाती माहि जल, माहैं पूजणहार॥
      • सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजाये नित्त। और न कोई सुणि सके, के साईं क चित्त॥ समंदरं लागी भ्रागि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि: कबीरा जागि, मंछी रुखा चढ़ि गई॥ मन लागा उन मन्न सौ, गगन पहुंचा जाइ। देख्या चंद बिहुंणां चांदिणां तहां. अलख निरंजनराई॥ गगन गरजि अमृत चवे, कदली कवल प्रकास। तहां कबीरा बंदिगी, कै कोई निज दास॥
    • सूरदास
      • "विश्व की विभूति में मन को रमाने का जैसा अवसर भक्ति भावना में है; वैसा अन्तःसाध्या में नहीं" — सूरदास कृत 'भ्रमरगीत' के आधार पर इस कथन की युक्तिसंगत समीक्षा कीजिए।
      • सूरदास के वाग्वैदग्ध्य की 'भ्रमरगीत सार' के आधार पर समीक्षा कीजिए।
      • 'भ्रमरगीत सार' के आधार पर सूरदास की काव्य-चेतना एवं कवित्व की सोदाहरण विवेचना कीजिए।
      • “सूरदास द्वारा भ्रमरगीत प्रसंग की योजना का मुख्य उद्देश्य निर्गुण पर सगुण की विजय दिखाना है।” इस कथन की युक्तिसंगत समीक्षा कीजिए।
      • “सूरदास में जितनी सहृदयता और भावुकता है, प्राय: उतनी चतुरता और वाग्विदग्धता भी है।” “अमरगीत-सार” के परिप्रेक्ष्य में विवेचना कीजिए।
      • “भ्रमरगीत” की अवधारणा पर विचार करते हुए गोपियों की वाचालता का परिचय दीजिए।
      • हिन्दी भ्रमरगीत-परंपरा में सूरदास कृत भ्रमरगीत का वैशिष्ट्य निरूपित कीजिए।
      • “काव्य, जीवन को अर्थवत्ता प्रदान करता है और काव्य की अर्थवत्ता बिम्ब से निर्मित होती है।” इस कथन के आलोक में सूरदास के काव्य का मूल्यांकन कीजिए।
      • भ्रमर गीत के माध्यम से सूरदास ने किस प्रकार अपनी गहन भक्ति-भावना और अप्रतिम काव्य-कला का परिचय दिया है? विवेचन कीजिए।
      • सूर के काव्य में जितनी सहृदयता है उतनी ही वाग्विदग्धता भी। स्पष्ट कीजिए।
      • सोदाहरण स्पष्ट कीजिए कि सूर ने योगमार्ग को संकीर्ण, कठिन और नीरस तथा भक्तिमार्ग को विशाल, सरल और सरस कहा है?
      • बताइए कि किस प्रकार सूर की काव्यकला पौराणिकता में नवीनता का संचार करके प्रसंगों को विशिष्ट और लोकग्राह्य बना देती है।
      • सूरदास की भक्तिभावना और काव्य-कौशल का परिपाक भ्रमरगीत प्रसंग में किस तरह हुआ है ? विश्लेषण कीजिए।
      • “सूर का काव्य अप्रस्तुत विधान की खान है” – इसको सप्रमाण सिद्ध कीजिए।
      • जायसी कृत ‘पद्मावत’ और तुलसीकृत ‘रामचरितमानस’ की काव्य-भाषा का तुलनात्मक आकलन कीजिए।
      • “मैं यद्यपि तुम्हारे जीवन में नहीं रही...” (भावात्मक गद्यांश) — विवेचना कीजिए।
      • 'भ्रमरगीत सार' के दार्शनिक पक्ष की विवेचना करते हुए उसके काव्यगत महत्त्व की समीक्षा कीजिए।
      • भ्रमर-गीत में अभिव्यक्त सूर की भक्ति-भावना का सांगोपांग विवेचन कीजिए।
      • 'भ्रमरगीत' व्रजांगनाओं की वचनवक्रता, तन्मयता, संवाद-शैली आदि की दृष्टि से हिन्दी-साहित्य में विशेष स्थान रखता है — तर्क और प्रमाण सहित विवेचना कीजिए।
      • 'भ्रमरगीत' में व्यक्त विरह-व्यंजना की पद्धति को उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।
      • “भ्रमरगीत में ज्ञानमार्ग और मुक्ति पर रागमार्ग और भक्ति की विजय निरूपित है।” तर्क सहित पुष्ट कीजिए।
      • “भ्रमरगीत-सार” में निहित गोपियों का पक्ष तर्क और उदाहरणों के आधार पर प्रस्तुत कीजिए।
      • 'भ्रमरगीत' में वर्णित गोपियों के विरह की विशदता, व्यापकता और मार्मिकता का विवेचन कीजिए।
      • बिंब-विधान की दृष्टि से सूर के भ्रमरगीत का मूल्यांकन कीजिए।
      • “चरम भक्ति भाव को उत्कृष्ट काव्य रूप देने में सूरदास को अनन्य सफलता मिली है।” 'भ्रमरगीत' के आधार पर विवेचना कीजिए।
      • 'भ्रमरगीत' की गोपियों द्वारा सूर ने निर्गुण भक्ति की अपेक्षा सगुण रागानुराग भक्ति की महत्ता प्रतिपादित की है — व्याख्या कीजिए।
      • सूरदास के 'भ्रमरगीत' में वचन की भावप्रेरित वक्ता द्वारा प्रेम-प्रसूत अंतर्वृत्तियों का उद्घाटन – 'भ्रमरगीतसार' के आधार पर मीमांसा कीजिए।
      • “सूरदास में जितनी सहृदयता और भावुकता है, उतनी ही चतुरता और वाग्विदग्धता भी है” — 'भ्रमरगीतसार' के आलोक में विवेचना कीजिए।
      • “प्रेम नाम की मनोवृत्ति का जैसा विस्तृत और पूर्ण परिज्ञान सूर को था, वैसा और किसी कवि को नहीं” – 'भ्रमरगीतसार' के आधार पर विचार कीजिए।
      • ‘भ्रमरगीत’ की अलंकार योजना — उपमा और उत्प्रेक्षा की विशेषता के साथ विवेचना कीजिए।
      • "जिस क्षेत्र का सूर ने चुनाव किया, उस पर उनका अधिकार अपरिमित है..." — 'भ्रमरगीतसार' के आधार पर पुष्टि कीजिए।
      • “सूरसागर वास्तव में एक महासागर है जिसमें हर प्रकार का जल मिला है।” – इस कथन का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए।
      • “सूर का भ्रमरगीत उनकी काव्यप्रतिभा का पूर्ण प्रतिनिधित्व करता है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
      • “सूरदास में जितनी सहृदयता और भावुकता है, उतनी ही चतुरता और वाग्विदग्धता भी है।” “भ्रमरगीत” के आधार पर प्रमाणित कीजिए।
      • सिद्ध कीजिए कि “भ्रमरगीत” में विरह का व्यापक क्षेत्र प्रस्तुत करते हुए प्रेम मार्ग की उत्कृष्टता प्रदर्शित की गई है।
      • 'अमरगीत' के काव्य पक्ष पर विचार करते हुए सूर की भक्ति-पद्धति का विवेचन कीजिए।
      • ‘अमर-गीत’ में सूर का मुख्य अभिप्राय क्या है? उनकी मौलिक उद्भावनाओं पर प्रकाश डालिए।
      • सूर की राधा और तुलसी की सीता में कौन अधिक प्रभावशाली है और क्यों?
    • सूरदास की रचनाएँ
      • नटनंदन मोहन सों मधुकर! है काहे की प्रीत? जौ कीजै तो है जल, रवि औ जलधर की सी रीति॥ जैसे मीन, कमल, चातक को ऐसे ही गई बीति। तलफत, जरत, पुकारत सुनु, सठ। नाहिं न है यह रीति॥
      • कहे को रोकत मारग सूधो? सुनहु मधुप! निर्गुन-कंटक तें राजपंथ क्यों रूँधौ? कै तुम सिखै पठाए कुब्जा, कै कही स्यामघन जू धौं? बेद पुरान सुमृति सब ढूँढ़ौ जुवतिन जोग कहूँ धौ? ताको कहा परेखौ कीजै जानत छाछ न दूधौ। सूर मूर अक्रूर गए लै ब्याज निबेरत ऊधौ॥
      • प्रकृति जोई जाके अंग परी। स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सूधि न काहु करी। जैसे काग भच्छ नहिं छाड़ि जनमत जौन घरी। धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी। ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि घरी। सूर होउ सो होउ सोच नहिं, तैसे हैं एउ री ॥
      • जीवन मुँहचाही को नीको, दरस परस दिन रात करति है कान्ह पियारे पी को। नयनन मूँदि-मूँदि किन देखौ बँध्यो ज्ञान पोथी को। आछे सुन्दर स्याम मनोहर और जगत सब फीको। “सुनौ जोग को का लै कीजै जहाँ ज्यान ही जी को ?” खाटी मही नही रुचि मानै सूर खवैया घी को॥
      • स्याम मुख देखे ही परतीति। जो तुम कोटि जतन करि सिखवत जोग ध्यान की रीति।। नाहिंन कछू सयान ज्ञान में यह हम कैसे मानैं। कही कहा कहिए या नभ को कैसे उर में आनैं ॥ यह मन एक, एक वह मूरति भृंगकीट सम माने। सूर सपथ दै बूझत ऊधौ यह ब्रज लोग सयाने ॥
      • निर्गुन कौन देस को वासी? मधुकर! हंसि समुझाय, सौंह दै बूझति साँच, न हांसी। को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी? कैसो वरन, भेस है कैसो, केहि रस के अभिलासी। पावैगो पुनि कियो आपनो जो रे कहैगो गांसी। सुनत मौन है रही ठग्यौ सो सूर सबे मति नासी॥
      • संदेसनि मधुबन-कूप भरे। जो कोउ पथिक गए हैं हयाँ तें फिरि नहिं अवन करे ॥ कै वै स्याम सिखाय समोधे कै वै बीच मरे ? अपने नहिं पठवत नंदनंदन हमरेउ फेरि धरे ॥ मसि खूँटी कागद जल भींजे, सर दव लागि जरे। पाती लिखैं कहो क्यों करि जो पलक-कपाट अरे ?
      • हरि काहे के अंतर्यामी? जी हरि मिलत नहीं यहि औसर, अवधि बतावत लामी।। अपनी चोप जाय उठि बैठे और निरस बेकामी? सो कह पीर पराई जानै जो हरि गरुड़ागामी। आई उघरि प्रीति कलई सी जैसे खाटी आमी।। सूर इते पर अनख मरति हैं, ऊधो, पीवत मामी।
      • हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। समुझी बात कहत मधुकर जो? समाचार कछु पायो? इक अति चतुर हुते पहिले ही, अरु करि नेह दिखाए। जानी बुद्धि बड़ी जुबतिन को जोग संदेस पठाए। भले लोग आगे के सखि री! परहित डोलत धाए। वे अपने मन फेरि पाइए जे हैं चलत चुराए।। ते क्यों नीति करत आपनु जे औरनि रीति छुड़ाए? राजधर्म सब भए सूर जहँ प्रजा न जायँ सताए।।
      • गोपाल बैरनि भइँ कुंजैं। तब ये लतां लगति अति सीतल, अब भइँ विषम ज्वाल की पुजैं।। वृथा बहति जमुना, खग बोलत, वृथा कमल फूलै, अलि गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भर भुंजै। ए, ऊधो, कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यों गुंजैं।।
      • जोग ठगौरी व्रज न बिकेहै। यह व्योपार तिहारो ऊधो एसोई फिरि जैहै।। जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै। दाख छाँडिके कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै? मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै? सूरदास प्रभु गुनहिं छाँडिकै को निर्गुन निरबैहै?
      • निर्गुन कौन देस को बासी? मधुकर! हँसि समुझाय, सौंह दै बूझत साँच, न हाँसी।। को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी? कैसो बरन भेस है कैसो केहि रस में अभिलासी॥ पावैगो पुनि कियो आनो जो रे! कहैगो गाँसी।। सुनत मौन ह्वै रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी॥
      • ऊधो ! प्रीति न मरन विचारै। प्रीति पतंग जरै पावक परि, जरत अंग नहि टारै।। प्रीति परेवा उड़ता गगन चढि, गिरत न आप सम्हारै। प्रीति मधुप केतकी-कुसुम बसि, कंटक आपु प्रहरै॥ प्रीति जानु जैसे पय पानी, जानि अपनपो जारै। प्रीति कुरंग नाद रस लुब्धक, तानि-तानि सर मारै॥ "प्रीति जान जननी सुत कारन, को न अपनपो हारै। सूर स्याम सो प्रीति गोपिन की, कहु कैसे निरुवारै।
      • अँखियाँ हरि दरसन की भूखी। कैसे रहैं रूपरंसराची ये बतियाँ सुनि रूखी।। अवधि गनत इकटक मग जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी।। बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। ‘सूर’ सिकत हठि नाव चलाओ ये सरिता हैं सूखी।।
      • बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैँ। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजै।। बृथा बहति जमुना, खग बोलत बृथा कमल फुलैं अलि ‘गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनी दधिसुत किरन भानु भई भुँजैं।। ए, ऊधो, कहियो माधव सों विरह कदन करि मारत लुँजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यौँ गुँजैं।
      • मोहन माँग्यो अपनो रूप। या ब्रज बसत अँचै तुम बैठीं, ता बिनु तहाँ निरूप। मेरो मन, मेरो अलि ! लोचन लै जो गए धुपधूप। हमसो बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप।। अपनो काज सँवारि सूर, सुनु, हमहि बतावत कूप। लेवा-देइ बराबर में है, कौन रंक को भूप।।
      • ऊधौ विरहौ प्रेम करै। ज्यौ बिनु पुट पट गहत न रँग कौं, रंग न रसै परै।। जौ आंवौं घट दहत अनल तनु तौ पुनि अमिय भरै। जौ धरि बीज देह अंकुर चिरि तौ सत फरनि फरै। जौ सर सहत सुभट संमुख रन तौ रविरथहि सरै। सूर गोपाल प्रेमपथ-जल में कोउ न दुखहि डरै।।
      • अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी। कैसे रहैं, रूपरस राची ये बतियाँ सुनि रूखी॥ अवधि गनत इकटक मन जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग-सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी॥ बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। सूर सिकत हटि नाव चलायो ये सरिता हैं सूखी॥
      • नँदनंदन मोहन सों मधुकर! है काहे की प्रीति? जौ कीजै तौ है जल, रवि औ जलधर की सी रीति॥ जैसे मीन, कमल, चातक की ऐसे ही गइ बीति। तलफत, जरत, पुकारत सुनु, सठ! नाहिंन है यह रीति॥ मन हठि परे, कबंध-जुद्ध ज्यों, हारेहू भइ जीति। बँधत न प्रेम-समुद्र सूर बल कहुँ बारुहि की भीति॥
      • निरगुन कौन देश कौ बासी। मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥ को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी। कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस में अभिलाषी॥ पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांसी। सुनत मौन ह्वै रह्यौ ठगो-सौ सूर सबै मति नासी॥
      • ऊधौ हम आजु भई बड़-भागी। जैसे समन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी ॥ अति आनंद बढ्यो अंग अंग मैं, परै न यह सुख त्यागी। बिसरे सब दुख देखत तुमको स्यामसुन्दर हम लागी ॥ ज्यों दर्पन मधि दृग निरखत जहें हाथ तहां नहि जाई। त्यों ही सूर हम मिली सांवरे बिरह बिथा बिसराई ॥
      • मधुकर ल्याए जोग सँदेसौ। भली स्याम कुसलात सुनाई, सुनतहिं भयौ अँदेसौ।। आस रही जिय कबहुँ मिलन की, तुम आवत ही नासी। जुवतिनि कहत जटा सिर बाँधौ, तौ मिलिहै अबिनासी।। तुमकौ निज गोकुलहिं पठाए, ते वसुदेव कुमार। ‘सूर’ स्याम मनमोहन बिहरत ब्रज में नंददुलार।।
      • लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत? कहा कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अंतरगति यों लूटत॥ चंचल चाल मनोहर चितवनि, वह मुसुकानि मंद धुन गावत। नटवर भेस नंदनंदन को वह विनोद गृह वन तें आवत॥ चरनकमल की सपथ करति हौं यह संदेस मोहि विष सम लागत। सूरदास मोहि निमिष न बिसरत मोहन मूरति सोवत जागत॥
      • संदेसनि मधुवन-कूप भरे। जो कोउ पथिक गए हैं ह्यां'तें फिरि नहि अवन करे ॥ कैव स्याम सिखाय समोधे कैवै बीच मरे ? अपने नहिं पठवत नन्दनन्दन उमरेउ फेरि धरे ॥ मसि खूँटी कागद जल भीजें, सर दव लागि जरे। पाती लिखें कहो क्यों करि जो पलक कपाट अरे ?॥
      • हमारे हरि हारिल की लकरी। मन बच क्रम नंदनंद सों उर यह दृढ़ करि पकरी॥ जागत, सोबत, सपने सौंतुख कान्ह-कान्ह जक री। सुनतहि जोग लगत ऐसो अति! ज्यों करुई ककरी॥ सोई व्याधि हमें लै आए देखी सुनी न करी। यह तौ सूर तिन्हैं लै दीजै जिनके मन चकरी॥
      • तौ हम मानै बात तुम्हारी। अपनौ ब्रह्म दिखावहु ऊधौ, मुकुट पितांबर धारी।। मनिहै तब ताकौ सब गोपी, सहि रहिहैं बरु गारी। भूत समान बतावत हमकौ, डारहु स्याम बिसारी।। जे मुख सदा सुधा अँचवत है, ते विष क्यौ अधिकारी। ‘सूरदास’ प्रभु एक अंग पर, रीझि रही ब्रजनारी॥
      • ऊधौ मन नहिं हाथ हमारै। रथ चढ़ाइ हरि संग गए लै, मथुरा जबहिं सिधारे।। नातरु कहा जोग हम छाँड़हि अति रुचि कै तुम ल्याए। हम तौ झँखति स्याम की करनी, मन लै जोग पठाए।। अजहूँ मन अपनौ हम पावै, तुमते होय तो होय। ‘सूर’ सपथ हमैं कोटि तिहारी, कही करैगी सोइ।।
      • ऊधौ ! ना हम विरहिनि ना तुम दास। कहत सुनत घट प्रान रहत है, हरि तजि भजहु अकास।। विरही मीन मरै जल बिछुरै, छाँड़ि जियन की आस। दास भाव नहिं तजत पपीहा, बरषत मरत पियास।। प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली, प्रीतम कै वनवास। ‘सूर’ स्याम सौ दृढ़ व्रत राख्यौ, मेटि जगत उपहास।
      • बिन गोपाल बैरिनि भई कुंजैं। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजैं। पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भईं भुंजैं॥ ए, ऊधो कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं। सूरदास प्रभु को मन जोवत अँखियाँ भईं बरन ज्यों गुंजैं॥
      • ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी। अपरस रहत सनेहतगा तें, नाहिंन मन अनुरागी॥ पुरइनि-पात रहत जल-भीतर ता रस देह न दाग़ी। ज्यों जल मांह तेल की गागरि बूँद न ताके लागी॥ प्रीति-नदी में पाँव न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी। सूरदास अबला हम भोरी गुर चींटी ज्यों पागी॥
      • ऊधौ विरहौ प्रेम करै। ज्यौ बिनु पुट पट गहत न रँग कौं, रंग न रसै परै।। जौ आँवो घट दहत अनल तनु तो पुनि अमिय, भरै। जो धरि बीज देह अंकुर गिरि, तौ सत फरनि फरै।। ज्यौ सर सहत सुभट रन तौ रबि रथहि सरै। ‘सूर’ गुपाल प्रेमपथ चलि करि, क्यौ दुख सुखनि डरै।।
      • प्राति करि दीन्ही गरें छुरी। जैसै बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी।। मुरली मधुर चेप काँपा करि, मोरचंद ठदवारि। बंक बिलोकनि लूक लागि, बस, सकीं न तनहि।। तलफत छाँड़ि गए मधुबन कौं, फिरि कै लई सार। सूरदास-प्रभु संग कल्पतरु, उलटि न बैठी डार।।
      • बिन गोपाल बरनि भई कुंजे।। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजे ॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूले, अलि गुंजे। पवन पानि घनसार संजीवनि दघिसुत किरन भानु भई भुंजे ॥ ए, ऊधो, कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजे। सूरदास प्रभु को मग जोवत अखियाँ भई बरन ज्यों गुंजे ॥
    • तुलसीदास
      • "कवितावली के उत्तरकाण्ड में मध्यकाल के भयावह यथार्थ की समीक्षा की गई है" — इस कथन की सत्यता को स्पष्ट कीजिए।
      • गोस्वामी तुलसीदास रचित 'कवितावली' के उत्तरकांड के आधार पर उनकी भक्ति-भावना का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • गोस्वामी तुलसीदास रचित 'कवितावली' के उत्तरकाण्ड की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
      • ‘कवितावली' में निहित युगीन संदर्भों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • ‘कवितावली' के भाव सौंदर्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
      • “सुन्दर” शब्द पर विचार करते हुए 'सुन्दरकांड' के वस्तु-शिल्प-सौन्दर्य की विवेचना कीजिए।
      • 'रामचरितमानस' के बाद “कामायनी” एक ऐसा प्रबंध काव्य है जो मनुष्य के सम्पूर्ण प्रश्नों का अपने ढंग से कोई न कोई सम्पूर्ण उत्तर देता है। विचार कीजिए।
      • क्या समकालीन आलोचना तुलसीदास के काव्य की प्रगतिशीलता को अनदेखा कर रही है? उदाहरणों से पुष्ट युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • तुलसी और जायसी की काव्य-भाषा और संवेदनात्मक गहनता का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।
      • तुलसीदास के प्रबंध-कौशल के वैशिष्ट्य का मूल्यांकन कीजिए।
      • क्या कवितावली के उत्तरकाण्ड में तत्कालीन समाज के यथार्थ का भरा-पूरा चित्र मिलता है? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
      • 'रामचरितमानस’ के सुंदरकांड तथा 'कवितावली' के उत्तरकांड के आधार पर तुलसीदास को भक्तिभावना का स्वरूप विशद कीजिए।
      • जो केवल अपने विलास या शरीर सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूंढ़ा करते हैं उनमें उस रागात्मक “सत्त्व” की कमी है जो व्यक्त सत्ता मात्र के साथ एकता की अनुभूति में लीन करके हृदय के व्यापकत्व का आभास देता है। संपूर्ण सत्ताएँ एक ही परम सत्ता और संपूर्ण भाव एक ही परम भाव के अंतर्भूत हैं। अतः बुद्धि की क्रिया से हमारा ज्ञान जिस अद्वैत भूमि पर पहुंचता है उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय भी इस सत्त्व-रस के प्रभाव से पहुँचता है। इस प्रकार अंत में जाकर दोनों पक्षों की वृत्तियों का समन्वय हो जाता है।
      • सुन्दरकाण्ड के आधार पर गोस्वामी तुलसीदास के काव्य-सौष्ठव का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • ‘कवितावली’ को आप मुक्तक रचना मानते हैं या प्रबंध रचना? सप्रमाण अपने मत का समर्थन कीजिए।
      • “भ्रमरगीत के बहाने निर्गुणोपासना की धज्जियाँ उड़ाने में सूर ने कोई कसर नहीं छोड़ी है।” - इस कथन के संबंध में अपना मत प्रस्तुत कीजिए।
      • “भगति हेतु बिधि भवन बिहाई, सुमिरत सारद आवति धाई” शास्त्रीय एवं व्यावहारिक दृष्टि से तुलसीदास की भक्ति का विवेचन कीजिए।
      • “सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं-जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं। भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।” – को दृष्टिगत कर गोस्वामी जी के पक्ष को समर्थ ढंग से उद्घाटित कीजिए।।
      • आचार्य शुक्ल को तुलसी की भक्ति-पद्धति में रहस्यवादिता के राहित्य और कबीर की भक्ति में रहस्यवादिता के साहित्य की स्थिति क्यों माननी पड़ी? उनकी उपपत्तियों को प्रस्तुत कीजिए।
      • “चित्रकूट की सभा का निष्कर्ष लोकमत, साधुमत तथा नृपनय का मंजुल समन्वय है।”–अयोध्याकाण्ड को दृष्टिगत कर अपना मंतव्य स्पष्ट कीजिए।
      • 'कवितावली' का काव्य-सौंदर्य गोस्वामी जी के प्रातिभ-संस्पर्श से निखर उठा है – उदाहरणों की पीठिका पर मंतव्य दीजिए।
      • 'कवितावली' में काव्य-सौन्दर्य, भक्ति तथा युग-बोध का अपूर्व समन्वय हुआ है। – विवेचना करें।
      • 'कवितावली (उत्तर कांड)' के आधार पर तुलसीदास के जीवन और युगीन परिस्थितियों पर प्रकाश डालिए।
      • ‘अयोध्याकाण्ड’ में विविध मानवीय व्यापारों, संवेदनाओं, मनोवृतियों एवं चरितों का अनुभव चित्रण हुआ है। – इस कथन की सर्वकता पर प्रकाश डालिए।
      • 'कवितावली' का उत्तरकांड रामकथा के निर्वाह में साधक नहीं है। तुलसीदास ने उसकी रचना जिस उद्देश्य की है, उसका निरूपण कीजिए।
      • 'अयोध्याकांड' में वर्णित राम-कथा के मार्मिक प्रसंगों के वैशिष्ट्य का विश्लेषण कीजिए।
      • 'कवितावली' (उत्तरकाण्ड) के आधार पर गोस्वामी तुलसीदास की भक्तिभावना का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • "तुलसीदास कवि थे, भक्त थे और पंडित सुधारक थे।" – ‘अयोध्याकांड’ के आधार पर इस कथन की परीक्षा कीजिए।
      • ‘अयोध्याकांड’ के आधार पर तुलसीदास के काव्य-सोष्ठव की विशेषताएँ।
      • ‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने कौन से जीवन-मूल्यों का प्रतिपादन किया है? ‘अयोध्याकांड’ के आधार पर उत्तर दीजिए।
      • ‘रामचरितमानस’ की चित्रकूट-सभा के वर्णन में ऐसा क्या है कि उसे आध्यात्मिक महत्व की घटना कहा गया है? सोदाहरण समझाइए।
      • ‘रामचरितमानस में तुलसी की लोकतात्विक दृष्टि’ पर संक्षिप्त निबंध लिखिए।
      • ‘रामचरितमानस’ को आधार बनाकर तुलसीदास के समाज-दर्शन का निरूपण कीजिए और बताइए कि यह किस प्रकार भारतीय संस्कृति का प्रामाणिक चित्रण है।
      • ‘रामचरितमानस’ को आधार बनाकर तुलसीदास की भक्ति पद्धति का विवेचन कीजिए।
    • तुलसीदास की रचनाएँ
      • तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेस्वर कालहु कर काला ।। ब्रह्म अनामय अज भगवंता । व्यापक अजित अनादि अनंता ।।
      • बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।। नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरें न पाव देह बिरहागी।।
      • बातन्ह मनहि रिझाई सठ जनि घालसि कुल सीख। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥
      • बेद पुरान बिहाइ सुपंथ कुमारग कोटि कुचाल चली है। काल कराल, नृपाल कृपालन राज समाज बड़ोई छली है।। बर्न-बिभाग न आस्रम धर्म, ott दुख-दोष-दरिद्र दली है। स्वारथ को परमारथ को कलि राम को नाम प्रताप बली है।
      • धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कही, जोलहा कहौ कोऊ। काहू की बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ। तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ। माँगि कै खैबो मसीत को सोईबो, लैबो को, एकु न दैबे को दोऊ॥
      • नामु लिये पूतको पुनीत कियो पातकीसु, आरति निवारी “प्रभु पाहि' कहें पीलकी। छलनिको छोंड़ी, सो निगोड़ी छोटी जाति-पांति कीन्‍ही लीन आपुमें सुनारी भोड़े भीलकी।।
      • सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया। जाके बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा। जा बल सीस धरत सहसासन। अंडकोस समेत गिरि कानन। धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन सिखावनु दाता। हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
      • ऋषिनारि उधारि कियो सठ केवट मीत पुनीत सुकीर्ति लही। 'निजलोक दियो सबरी खग को कपि थाप्यो सो मालुम है सबही। दससीस विरोध सभीत विभीषण भूप कियो जग लीक रही। करुणानिंधि को भजु रे तुलसी रघुनाथ अनाथ के नाथ सही।
      • कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥ दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी ॥
      • तात राम नहि नर भूपाला। भुवनेश्वर कालहूँ कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। व्यापक अजित अनादि अनंता॥ गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपार्सिधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल व्राता। वेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ ताहि बयरु तजि नाइए माथा, प्रनतारति भंजन रघु नाथा॥ देहू नाथ प्रभु कहूँ वैदेही, भजहू राम विनु हेतु सनेही। सरन गये प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा। जासु नाम भय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रकट समुझु जियँ रावन॥
      • अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। 'निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥ नयन स्रविं जलु निज हित लागी। जरैँ न पाव देह बिरहागी ॥
      • अंतरजामिहुतें बड़े बाहरजामि हैं राम, जे नाम लियेतें। धावत धेनु पेन्हाइ लवाइ ज्यों बालक-बोलनि कान कियेतें। आपनि बूझि कहै तुलसी कहिबे की न बावरि बात बियेतें। पैज परें प्रहलादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें, न हियेतें।।
      • कृसगात ललात जो रोटिन को, घरवात घरें, खुरपा-खरिया। तिन्‍ह सोने के मेरु-से ढेर लहे, मनु तौ न भरो, घरु पै भरिया।। “तुलसी” दुख दूनो दसा दुहुँ देखि, कियो मुखु दारिद को करिया। ताजि आस भो दासु रघुप्पतिको, दसरत्थको दानि दया-दरिया।
      • कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।। तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।। सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।। प्रभु संदेसु सुनत वैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।
      • कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।। नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।। कुबलय बिपिन कुंत बनं सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।। जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।
      • मेरे जाति पाति, न चहौं काहू की जाति पाँति, - मेरे कोऊ काम को, न हौं काहू के काम को। लोक परलोक रघुनाथ ही के हाथ सब, भारी है भरोसो तुलसी के एक नाम को। अति ही अयाने उपखानो नहिं बूझैं लोग, 'साह ही को गोत, गोत होत है गुलाम को’।
      • रास नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।। बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषिक्र बर नारी।। राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पार्ई।। सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरखि गएँ पुत्ति तबहिं सुखाहीं।। सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।। संकर सहस बिष्नु अज लोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
      • स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किये रजाइ कोटि विधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारू। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥ देव एक विनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करन वहोंरी॥ तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जो मनु माना॥ - सानुग पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहि बंधु दोउ नाथ चलौ मैं साथ।।
      • आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहि रघुनाथु।। बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भँवर अबर्त अपारा।। केवट बुध विद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे।। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
      • सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।। काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।। - सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।। तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।
      • रामवास वन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाई सुराजा। सचिव विरागु विवेक नरेसू। विपिन सुहावन पावन देसू। भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।। सकल अंग संपन्न सुराऊ। रामचरन आश्रित चित चाऊ। जीति मोह महिपालु दल सहित विवेक भुआलु। करत अकटंक राज पुर सुख संपदा सुकालु।।
      • झूठो है, झूठो है, झूठो सदा जगु, संत कहंत जे अंतु लहा है। ताको सहै सठ! संकट कोटिक, काढ़त दंत, करंत हहा है। जानपनी को गुमान बड़ो, तुलसी के बिचार गँवार महा है। जानकी जीवनु जान न जान्यौ तो जान कहावत जान्यो कहा है॥
      • आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ विषम विषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भंवर अवतं अपारा॥ केवट बुध विद्या बड़ नावा। सकर्हिं न खेड एेक नहिं आवा॥ बनचर कोल किरात विचारे। धके विलोकि पथिक हिय हारे॥ आश्रम उदधि मिली जव जाई। मनहुं उठेड अंबुधि अकुलाई॥ सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥ भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥
      • प्रेम अमिय मंदरु विरहु भरत पयोधि गँभीर। मथि काढेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुवीर॥ को दृष्टिगत कर गोस्वामी जो के पक्ष को समर्थ ढंग से उद्घाटित कीजिए।।
      • अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भंवर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूप रूप तरु मूला। चली विपति बारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥ मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥
      • मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।। सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।। जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।। तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।। भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।। प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।। जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।
      • बचन बिकार, करतबऊ खुआर, मन बिगत-बिचार, कलिमल को निधानु है। राम को कहाइ, नाम बेचि बेचि खाइ, सेवा संगति न जाइ पाछिलें को उपखानु है। ते हू ‘तुलसी’ को लोग भलो भलो कहैं, ताको दूसरो न हेतु, एक नीके कै निदान है। लोकरीति बिदित बिलोकियत जहाँ तहाँ, स्वामी के सनेह स्वानहू को सनमानु है॥
      • काव्य-कला की दृष्टि से 'कवितावली' का मूल्यांकन कीजिए।
      • बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।। मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।
      • 'कवितावली' की काव्य-शैली पर प्रकाश डालिए।
      • अतरजामिहु तें बढ़ बाहरजामि हैं राम; जे नाम लिये हैं। धावत धेनु पन्हाई लवाई ज्यों बालक बोलनि कान किये तें। आपनि बुझि कहैं 'तुलसो’, कहिये की न बावरी बात दिये तें। बैज परे प्रह्लादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें न हियें तें ॥
      • जग जांचिए कोऊ न, जांचिए जो जिय जाँचिए जानकी- जानाहि रे। जेहि जाँचत जाचकता जरि जाइ जो जारति जोर जहानहि रे ॥ गति देखु बिचारि बिभीषन की, अर आनु हिए हनुमानहि रे। तुलसी भजु दारिद-दोष-दन्रानल, संकट-कोटि-कृपानहि रे॥
      • अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रकट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हट धारा। भँवर कूबरी - बचन - प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली विपतिबारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात सव साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाँची॥ गहि पद विनय कीन्हि बेठारी। जनि दिन-कर-कुल होसि कुठारी॥
      • जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥ सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥
      • सिला-साप-पाप, गुह गीध को मिलाप, सबरी के पास आप चलि गये हौ सो सुनी मैं। सेवक सराहे कपिनायक बिभीषन, भरत सभा सादर सनेह सुर-धुनी मैं॥ आलसी-अभागी-अधी-भारत-अनाथपाल, साहेब समर्थ एक नीके मन गुनी मैं। दोष दुख दारिद दलैया दीनबंधु राम, तुलसी न दूसरो दयानिधान दुनी मैं॥
      • भूमिपाल, ब्यालंपाल, नाकपाल, लोकपाल कारन कृपालु, में सब के जो का थाह ला। कादर को आदर नाहि काहू के देखियत, सबनि सोहात है सेवा-सुजानि टाहली॥ तुलसी सुभाय कहैं, नाहीं कछु पच्छपात, कौनै ईस छिये कीस भालु खास माहली। राम ही के द्वारे पे बोलाइ सनमानियत, मोसे दीन दूबरे कुपूत कूर काहली॥
      • आपु हों आपको नीकेके जानत, रावरो राम ! भरायो गढ़ायो। कीर ज्यों नाम रटे तुलसी सो कहै जग जानकीनाथ पढायो॥ सोई है खेद जो बेट कहै, न घट जन -जो रघुबीर बढ़ायो। हों तो सदा रबर को असवार, तिहारोई नाम गयंद चढ़ायो।
      • खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी। जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’ बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, साँकरे सबै पै, राम! रावरें कृपा करी। दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु! दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी॥
      • तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥ मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥ सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥ गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीहि उजियारी॥ कहत भरत गन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि गगन रघुराऊ॥
      • बादि बसन बिनु भूषन भारूं। बादि बिरति बिनु ब्रह्म विचारू॥ सरूज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरि भगति जाय जप जोगा॥ जाँय जीव बिनु देह सुहाई।। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥ जाउं राम पहि आयेसु देहू।। एकहि आंक मोर हित एहू॥ मोहि नृपु करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता' बस कहहूँ॥
      • सिय-राम-सरूप अगाध अन्प बिलोचन मीनन को जलु है। श्रुति रामकथा, मुख राम को नाम, हिये पुनि रामहिं को थलु है॥ मति रामहि सो; गति रामहिं सों, रति राम सों, रामहिं को बलु है। सबकी न कहैं तुलसी के मते इतना जग जीवन को फलु है॥
      • बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
    • जायसी
      • जायसी के 'पद्मावत' के सिंहलद्वीप खण्ड की भावभूमि स्पष्ट कीजिए।
      • “जायसी ने नागमती के वियोग-वर्णन द्वारा नारी की व्यथा-कथा को प्रस्तुत किया है।” इस कथन से आप कितने सहमत हैं, उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
      • “जायसी ने इतिहास और कल्पना के सुंदर समन्वय से यह अत्यंत उत्कर्ष का महाकाव्य दिया है।” इस कथन के आधार पर “पद्मावत' की समीक्षा कीजिए।
      • “पद्मावत” में आध्यात्मिक प्रेम की झाँकियाँ विद्यमान हैं।” इस कथन से आप कहां तक सहमत हैं? सोदाहरण समझाइए।
      • जायसी की सौन्दर्य-संचेतना में उनकी ऊहा शक्ति साधक रही है या वाधक? सोदाहरण समझाइए।
      • “जायसी कृत पद्मावत' में वर्णित 'प्रेम', सौंदर्य, भाव-गांभीर्य और माधुर्य की त्रिवेणी से उद्भासित है।” — इस कथन के संदर्भ में जायसी की प्रेम-व्यञ्जना का विवेचन कीजिए।
      • “पदमावत' काव्य में वर्णित विरह-भावना विप्रलंभ श्रृंगार की सैद्धांतिक सीमाओं का किन-किन संदर्भों में उल्लंघन करती दिखाई देती है? विश्लेषण कीजिए।
      • अवधी भाषा में रचित 'पद्यावत' प्रेम और दर्शन का अद्भुत महाकाव्य है। संवेदनशील उत्तर दीजिए।
      • ठेठ अवधी भाषा के माधुर्य और भावों की गंभीरता की दृष्टि से 'पद्मावत' महाकाव्य निराला है। विवेचन कीजिए।
      • ‘पद्मावत' में कल्पना में इतिहास का पैबंद लगाने वाली काव्य-चेतना के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
      • तुलसी और जायसी की काव्य-भाषा और संवेदनात्मक गहनता का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।
      • जायसी कृत ‘पद्मावत' और तुलसीकृत ‘रामचरितमानस' की काव्य-भाषा का तुलनात्मक आकलन कीजिए।
      • पद्मावत में लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति है – सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
      • “फूल मरै पै मरै न बासू” – इस कथन के आधार पर जायसी की प्रेम-व्यंजना के महत्त्व का आकलन कीजिए।
      • सूफी दर्शन के सन्दर्भ में 'पद्मावत' की प्रेमाभिव्यंजना का विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।
      • 'नागमती-वियोग खंड के आधार पर जायसी की काव्य-कला के विविध पक्षों का विवेचन कीजिए।
      • “पद्मावत एक उत्कृष्ट प्रेम-काव्य है।” – इस मत की सतर्क व्याख्या कीजिए।
    • जायसी की रचनाएँ
      • कुहुकि कुहुकि जसि कोइल रोई । रकत आँसु घुँघुची बन बोई ।। पै कर मुखी नैन तन राती । को सिराव बिरहा दुःख ताती ।।
      • सो गढ़ देखु गँगन तें ऊँचा। नैन देख कर नाहिं पहुँचा। बिजुरी चक्र फिरै चहुँ फेरी। औ जमकात फिर जय केरी। धाइ जो बाजा कै मन साधा। मारा चक्र भएउ दुइ आधा। चंद सुरुज औ नखत तराई। तेहि डर अँतरिख फिरैं सबाई। पवन जाइ तहँ पहुँचे चहा। मारा तैस टूटि भुईँ बहा। अगिनि उठी जरि बुझी निआना। धुआँ उठा उठि बीच बिलाना। पानि उठा उठि जाइ न छुवा। बहुरा रोइ आइ भुँइ चुवा। रावण चहा सौंह होइ हेरा उतरि गए दस माँथ। संकर धरा ललाट भुदें औरु को जोगी नाथ।।
      • नवौं पँवरि पर दसौं दुआरू। तेहि पर बाज राज घरिआरू। घरी सो बैठि गनै घरिआरी। पहर पहर सो आपनि बारी। जबहिं घरी पूजी वह मारा। घरी घरी घरिआर पुकारा। परा जो डाँड जगत सब डाँड़ा। का निचिंत माँटी कर भाँडा॥
      • चढ़ा अषाढ़ गगन घन गाजा। साजा बिरह दुंद दल बाजा। घूम स्याम घौरे घन धाए। सेत धुजा बगु पाँति देखाए। खरग बीज चमके चहुँ ओस बुंद बान बरिसे घनघोरा। अद्रा लाग बीज भुई लेई। मोहि प्रिय बिनु को आदर देई।
      • चढ़ा असाढ़ गँगन घन गाजा। साजा बिरह दुंद दल बाजा। धूम स्याम धौरे घन धाए। सेत धुजा बगु पाँति देखाए। खरग बीज चमकै चहुँ ओरा। बुंद बान बरिसै घन घोरा। अद्रा लाग बीज भुइँ लेई। मोहि पिय बिनु को आदर देई।
    • बिहारी
      • "बिहारी की कविता श्रृंगारी है किन्तु प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँच पाती" — इस कथन की सम्यक विवेचना कीजिए।
      • बिहारी के विरह-वर्णन की मार्मिकता पर प्रकाश डालिए।
      • "बिहारी की कविता श्रृंगारी है पर प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँच पाती।" इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
      • “बिहारी ने अन्योक्तियों व सूक्तियों के माध्यम से जीवन के सत्य का सजीव वर्णन किया है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
      • बिहारी की सूक्ष्म सौंदर्य दृष्टि का निरूपण कीजिए।
      • बिहारी की काव्यकला अपनी ध्वनिक्षम संभावनाओं के साथ-साथ रसाभिव्यक्ति में भी पूरी तरह से सक्षम है – तर्कसम्मत उत्तर प्रस्तुत कीजिए।
      • बिहारी के दोहों में नीति, भक्ति, श्रृंगार की त्रिवेणी प्रवाहित है। स्पष्ट कीजिए।
      • बिहारी की कविता के साक्ष्य से बताइए कि कवि की धर्म और दर्शन के क्षेत्रों में पैठ थी।
      • बिहारी के काव्य एवं उनकी कवि-दृष्टि की सौंदर्यशास्त्रीय मीमांसा के प्रतिमानों पर प्रकाश डालिए।
      • बिहारी के काव्य में चित्रित प्रेम और सौन्दर्य सांसारिकता से निबद्ध हैं।
      • रीतिकाल में कविवर बिहारी की अपनी अलग पहचान है – तर्क-युक्त उत्तर दीजिए।
      • बिहारी के काव्य में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समास-शक्ति का कितना सामंजस्य मिलता है? प्रमाण संहित उत्तर दीजिए।
      • सतसैया के दोहरे।
    • बिहारी की रचनाएँ
      • रससिंगार-मंजनु किए, कंजनु भंजनु दैन। अंजनु रंजनु हूँ बिना खंजनु गंजनु नैन।। तो रंत उरबसी, सुनि, राधिके सुजान। तू मोहन कै उर बसी हवै उरबसी-समान॥
      • खेलन सिखए, अलि, भलै चतुर अहेरी मार। कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार ॥ लग्यो सुमनु है है सफलु, आतप-रोसु निवारि। बारी, बारी आपनी सींचि सुहृदता-बारि॥
      • पावक सो नयननु लगै जावकु लाग्यो भाल। मुकुर होहुगे नैंक मैं, मुकुर बिलोको लाल।। तख़िन-कनकु कपोल-दुति बिच ही बीच बिकान। लाल लाल चमकतीं चुनीं चौका-चीन्ह-समान।
      • सायक सम मायक नयन रंगे त्रिविध रंग गात। झखौ बिलखि दुरि जात जल लखि जलजात लजात ॥
      • सब ही त्यौं समुहाति छिनु, चलति सबनु दै पीठि। वाही त्यौँ ठहराति यह, कविलंनवी लौं दीठि॥
      • मेरी भवबाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाईँ पा स्यामु हरित-दुति होइ। कहत नटत रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भी भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात॥
      • डारे ठोड़ी-गाड़, गहिं नैन-बटोही मारि। चिलक चौंध में रूप ठग, हाँसी-फाँसी डारि॥ तंत्रीनाद, कवित्त रस, सरस राग, रति-रंग। अनबूड़े बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग॥
      • “जो कोई रस-रीति को समुझै चाहे सार। पढ़े बिहारी-सतसई कविता को सिंगार॥'' इस उक्ति के आधार पर बिहारी की “रस-रीति' की विवेचना कीजिए।
      • 'सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर, देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।’ इस दोहे के आलोक में बिहारी की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
      • खेलन सिखए, अलि, भलैँ चतुर अहेरी मार। कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार।। रससिंगार-मंजनु किए, कंजनु भंजनु दैन। अंजनु रंजनु हूँ बिना खंजनु गंजनु, नैन।
      • अंग-अंग नग जगमगत दीपसिखा-सी देह। दिया बढ़ाएँ हूँ रै बड़ी उज्यारी गेह।। पत्रा ही तिथि पाइयै वा घर कै चहुँ पास। नितप्रति पून्यौई रहै, आनन ओप उजास।
      • मेरी भव-बाधा हरी, राध्या नागरि सोइ। जा तन की झाँई परै, स्यामु हरित-दुति होङ।। कहल, नटल, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियाल। भरे भौन मैं करत हैं, नैननु हीं सब बात।। नहिं परागु नहिं मधुर मधु नहिं बिकासु इहिं काल। अली, कली ही सौं बंध्यौ, आगं कौन हवाल।। (‘बिहारी-सतसई’, दोहा सं. 1, 32, 38)।
    • मैथिलीशरण गुप्त
      • 'भारत-भारती' में अभिव्यक्त राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप विश्लेषण कीजिए।
      • "भारत-भारती’ में वर्तमान की त्रासदीपूर्ण स्थिति, वैभवपूर्ण भव्य विरासत एवं उन्नत भविष्य की कामना करते हुए राष्ट्रीयता का स्वर मुखरित हुआ है।" इसे उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
      • “गुप्त जी ने ‘भारत-भारती’ में अतीत का गौरव गान, वर्तमान को रचनात्मक ऊर्जा एवं जागरण का संदेश देने हेतु किया है।” स्पष्ट कीजिए।
      • “गुप्त जी ने ‘भारत-भारती’ के माध्यम से न सिर्फ अतीत के गौरव का गान किया है, बल्कि वर्तमान को भी झकझोरा है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
      • “भारत भारती’ की राष्ट्रीय चेतना को आज के संदर्भ में समझाइए।
      • “भारत-भारती’ की राष्ट्रीय-चेतना हिन्दू जातीयता पर अवलंबित है।” इस कथन के संदर्भ में अपना मत सोदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
      • स्वतंत्रता-संग्राम के व्यापक परिप्रेक्ष्य में मैथिलीशरण गुप्त की “भारत-भारती” की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
      • मैथिलीशरण गुप्त की आधुनिक हिन्दी कविता के विकास में जो भूमिका है, उसे स्पष्ट कीजिए।
      • क्या आप समझते हैं कि “भारत भारती’ में व्यक्त कवि के कतिपय विचार पुराने पड़ गये हैं और उनसे सहमत होना कठिन है? इस संदर्भ में ‘भारत भारती’ की प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।
      • आज के संदर्भ में ‘भारत-भारती’ का विवेचन कहाँ तक संगत प्रतीत होता है? विवेचन कीजिए।
      • “भारत भारती’ में अभिव्यक्त कवि की पुनरुत्थानवादी दृष्टि एवं राष्ट्रीय चेतना के द्वंद्व की समीक्षा कीजिए।
      • नवजागरण के मूलभूत तत्त्वों की अभिव्यक्ति ‘भारत-भारती’ में किस प्रकार हुई है? समीक्षा कीजिए।
    • मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ
      • हा दैव! अब वे दिन कहाँ हैं और वे रातें कहाँ ? हैं काल की घातें कि कल की आज हैं बातें कहाँ ? क्या थे तथा अब क्या हुए हम, जानता बस काल है; भगवान् जाने, काल की कैसी निराली चाल है !
      • जिसकी प्रभा के सामने रवि-तेज भी फीका पड़ा, अध्यात्म-विद्या का यहाँ आलोक फैला था बड़ा! मानस-कमल सबके यहाँ दिन-रात रहते थे खिले, मानो सभी जन ईश की ज्योतिश्छटा में थे मिले॥
      • हम बाहा उन्नति पर कभी मरते न थे संसार में, बस मप्र थे अन्तर्जगत के अमृत-पारावार में। जड़ से हमें क्या, जबकि हम थे नित्य चेतन से मिले, हैं दीप उनके निकट क्या जो पद्म दिनकर से खिले।
      • बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा— है किन्तु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा ! महिमा तुम्हारी ही जगत में धन्य आशे ! धन्य है, देखा नहीं कोई कहीं अवलम्ब तुम-सा अन्य है।। आशे, तुम्हारे ही भरोसे जी रहे हैं हम सभी, सब कुछ गया पर हाय रे! तुमको न छोड़ेंगे कभी। आशे, तुम्हारे ही सहारे टिक रही है यह मही, धोखा न दीजो अन्त में, बिनती हमारी है यही।
      • हम डूबते हैं आप तो अध के अँधेरे कूप में— हैं किन्तु रखना चाहते उनको सती के रूप में। निज दक्षिणांग पुरीष से रखते सदा हम लिप्त हैं, वामांग में चंदन चढ़ाना चाहते, विक्षिप्त है।
      • यद्यपि हताहत गात में कुछ सांस अब भी आ रही, पर सोच पूर्वापर दशा मुंह से निकलता है यही— जिसकी अलौकिक कीर्ति से उज्ज्वल हुई सारी मही, था जो जगत का मुकुट, है क्या हाय ! यह भारत वही? अब कमल क्या, जल तक नहीं, सर मध्य केवल पङ्क है वह राज राज कुबेर अब हा रङ्क का भी रङ्क है।
      • यह पुण्य भूमि प्रसिद्ध है इसके निवासी ‘आर्य्य’ हैं विद्या, कला-कौशल्य सबके जो प्रथम आचार्य्य हैं। सन्तान उनकी आज यद्यपि हम अधोगति में पड़े; पर चिह्न उनको उच्चता के आज भी कुछ हैं खड़े।। (‘भारत-भारती’, मैथिलीशरण गुप्त, ‘अतीत खण्ड’, पद-17, पृष्ठ-15)।
    • जयशंकर प्रसाद
      • "कामायनी आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि महाकाव्य है" — स्पष्ट कीजिए।
      • “कामायनी'' को चेतना का सुन्दर इतिहास' और “अखिल मानव-भावों का सत्य'- शोधक काव्य क्यों कहा गया है ? अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • “कामायनी में जयशंकर प्रसाद ने मानवमन एवं मानवता के विकास की कहानी प्रस्तुत की है।” - एतत्संबंध में अपना पक्ष उपस्थापित कीजिए।
      • जयशंकर प्रसाद रचित 'कामायनी' के महाकाव्यत्व का विश्लेषण कीजिए।
      • “कामायनी' का गौरव उसके युगबोध, परिपुष्ट चिंतन, महत्‌ उद्देश्य और प्रौढ़ शिल्प में निहित है।“ इस कथन की विवेचना कीजिए।
      • ‘प्रसाद मूलत: प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं।’ इस कथन के आधार पर “कामायनी' में अभिव्यक्त प्रेम एवं सौंदर्य का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • ‘कामायनी' विषम परिस्थितियों में जीवन के सृजन का महाकाव्य है। स्पष्ट कीजिए।
      • 'रामचरितमानस' के बाद “कामायनी' एक ऐसा प्रबंध काव्य है जो मनुष्य के सम्पूर्ण प्रश्नों का अपने ढंग से कोई न कोई सम्पूर्ण उत्तर देता है। विचार कीजिए।
      • “बुद्धिवाद के विकास में, अधिक सुख की खोज में, दुख मिलना स्वाभाविक है।'” ‘कामायनी’ के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “कामायनी उज्ज्वल चेतना का सुन्दर इतिहास है' -- इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं ?
      • 'कामायनी' को जयशंकर प्रसाद की अन्यतम काव्यकृति क्यों कहा जाता है? सतर्क और सोदाहरण अपने मत का उपस्थापन कीजिए।
      • “शरीर नश्वर और अस्थायी है? देवी अमरता चाहती हो? … उस संसार में क्या सुख और आकर्षण होगा?” – इस संवाद के माध्यम से कामायनी की विचारधारा स्पष्ट कीजिए।
      • रूपक तत्त्व को दृष्टि से 'कामायनी' की विवेचना करते हुए उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
      • 'कामायनी' का समरसता-सन्देश वर्तमान जीवन-स्थितियों में कहां तक प्रासंगिक है? तर्क सहित बतलाइए।
      • 'कामायनी' में चित्रित मानव-सभ्यता के विकास की विभिन्न स्थितियों और समस्याओं का विवेचन कीजिए।
      • छायावाद की प्रमुख विशेषताओं के आधार पर “कामायनी” का मूल्यांकन कीजिए।
      • कामायनी में अभिव्यक्त आनन्दवाद और समरसता का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • "कामायनी में प्राचीन एवं अर्वाचीन संस्कृतियों का सुन्दर समन्वय मिलता है।” - इस कथन की तर्कयुक्त विवेचना प्रस्तुत कीजिए।
      • कामायनी के अंगीरस का निरूपण रसवादी समीक्षा-पद्धति से कीजिए।
      • ध्वन्यात्मकता, लाक्षिणकता, उपचारवक्रता और अनुभूति की विवृति को छायावाद की विशेषता मानने वाले प्रसाद ने उसे 'कामायनी' में कैसा मूर्त किया है ? स्पष्ट कीजिए।
      • दिनकर जी ने ‘कामायनी’ को "दोष-रहित, दूषण-सहित" कहकर क्या कहना चाहा है -- संभावनाओं का आकलन करते हुए अपनी वैचारिक प्रतिक्रिया व्यक्त कीजिए।
      • “प्रसाद ने प्रकृति के कोमल और प्रलयंकारी दोनों रूपों का चित्रण किया है।” - 'कामायनी' में प्रकृति-वर्णन की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उपर्युक्त कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
      • 'कामायनी' के काव्य-सौंदर्य को उद्घाटित करते हुए उसमें निहित मिथक तत्व को स्पष्ट कीजिए।
      • छायावादी धारा के महाकाव्य के रूप में 'कामायनी' की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
      • 'कामायनी' के 'श्रद्धा' सर्ग के आधार पर कवि की जीवन-दृष्टि एवं उद्देश्य को रेखांकित कीजिए।
      • “कामायनी” काव्य और दर्शन के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मत की परीक्षा कीजिए।
      • 'कामायनी' के आधुनिक बोध अथवा ‘अंधेरे में’ के यथार्थ बोध का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • प्रतीकात्मकता, भाषा-शैली एवं छन्द-योजना की दृष्टि से ‘कामायनी’ (चिंता सर्ग) का महत्व स्पष्ट कीजिए।
      • श्रद्धा अथवा लज्जा सर्ग के काव्य-सौन्दर्यं का उदाहरणों के माध्यम से निरूपण कीजिए।
      • कामायनी के रूपक तत्व का विश्लेषण करते हुए उस में प्रतिपादित जीवन दर्शन को स्पष्ट कीजिए।
      • कामायनी के महाकाव्यत्व की मीमांसा कीजिए।
      • प्रसाद के नारी पात्र।
      • "प्रसाद के नाटक भारत के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।" — ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक के आधार पर इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
      • 'स्कन्दगुप्त' के आधार पर जयशंकर प्रसाद की राष्ट्रीय-चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • “‘स्कंदगुप्त’ नाटक राष्ट्रीय उन्नति की संवेदना को प्रकट करता है।” विवेचना कीजिए।
      • “प्रसाद जी के नाटक न सुखांत हैं न दुःखांत, बल्कि वे प्रसादांत हैं” इस कथन पर अपनी सहमति-असहमति व्यक्त कीजिए।
      • “प्रसाद के नाटक भारत के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।” 'स्कंदगुप्त' नाटक के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।
      • “गुप्त-कालीन प्रामाणिक इतिहास का अनुलेखन एवं कल्पनाधारित वस्तु-संयोजन ‘स्कंदगुप्त’ में परिलक्षित होते हैं।” इस कथन की सप्रमाण संपुष्टि कीजिए।
      • 'स्कंदगुप्त' नाटक की प्रमुख समस्या राष्ट्रीय-सुरक्षा की समस्या है। प्रसाद की नाट्य-दृष्टि के संदर्भ में समीक्षा कीजिए।
      • “जयशंकर प्रसाद के नाटकों के स्त्री-पात्र सदैव श्रेष्ठ रहे हैं।” इस कथन के आलोक में 'स्कंदगुप्त' में स्त्री-पात्र परिकल्पना की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
      • ‘स्कंदगुप्त’ नाटक प्रसाद के जीवन-मूल्यों का कौन-कौन सा संदर्भ उद्घाटित करता है?
      • क्या ‘स्कंदगुप्त’ नाटक में कल्पना और इतिहास के समन्वय से नाटक के संप्रेषणगत सौन्दर्य में वृद्धि हुई है? तर्कयुक्त उत्तर दीजिए।
      • प्रेक्षकों पर सम्प्रेषणगत प्रभाव की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद और मोहन राकेश के नाटकों का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • ‘स्कंदगुप्त’ में अभिव्यक्त राष्ट्रीय भावना पर तत्कालीन स्वाधीनता-आन्दोलन के प्रभावों का आकलन कीजिए।
      • क्या इतिहास और कल्पना के सुंदर योग को प्रसाद की नाट्यकलागत विशेषताओं में सर्वोपरि विशेषता माना जा सकता है? ‘स्कंदगुप्त’ के संदर्भ में तर्कसम्मत विवेचन कीजिए।
      • ‘स्कंदगुप्त’ के आधार पर प्रसाद की इतिहास-दृष्टि का विवेचन करते हुए उनकी नाट्य-कला की विशिष्टताओं का विश्लेषण कीजिए।
      • ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक में निरूपित इतिहास तत्त्व विषय पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
      • “चन्द्रगुप्त’ में भारतीय संस्कृति के तत्त्वों एवं इतिहास के तथ्यों की भरमार है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
      • नाट्यकला की दृष्टि से ‘चन्द्रगुप्त’ हिन्दी का श्रेष्ठ नाटक है, इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में अपना मत प्रकट कीजिए।
      • “चन्द्रगुप्त” नाटक में स्वच्छंदतावादी, नाटकीय तत्त्वों का आकलन कीजिए।
      • ‘अभिनेयता’ का आशय स्पष्ट करते हुए ‘चन्द्रगुप्त’ में उसकी संभावना पर विचार कीजिए।
      • स्वच्छंदतावादी नाटक के तत्वों का उल्लेख करते हुए बताइए कि ‘चन्द्रगुप्त’ में उनका कैसा नियोजन हुआ है।
      • ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक को सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय-चेतना का प्रतिपादन कीजिए।
      • अभिनेयता और रस की दृष्टि से ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
      • ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक की ऐतिहासिकता का परीक्षण कीजिए।
      • “प्रसाद के नाटकों के नारी पात्र पुरुष पात्रों की अपेक्षा अधिक प्रभावपूर्ण शक्तिशाली हैं।” ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए कि जयशंकर प्रसाद का ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक राष्ट्र-प्रेम और भारत की गरिमा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
      • रंगमंच की दृष्टि से “अंधेर नगरी” और “चन्द्रगुप्त” नाटकों में आप किसे श्रेष्ठ समझते हैं? युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • “चन्द्रगुप्त” नाटक में जहाँ एक ओर पात्रों को स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान किया गया है, वहीं उनके अंतर्द्वंद्व एवं बहिर्द्वंद्व के मर्म को भी उद्घाटित किया गया है।” इस उक्ति के सन्दर्भ में नाटक के प्रमुख पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
    • जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ
      • विषमता की पीड़ा से व्यस्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान । यही दुःख सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान ।
      • महानृत्य का विषम सम, अरी अखिल स्पंदनों की तू माप, तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप।
      • कौन हो तुम वसंत के दूत विरस पतझड़ में अति सुकुमार। घन-तिमिर में चपला की रेख, तपन में शीतल मंद बयार। नखत की आशा-किरण समान, हृदय के कोमल कवि की कांत - कल्पना की लघु लहरी दिव्य, कह रही मानस-हलचल शांत।।
      • दुःख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात। एक परदा यह झीना नील, छिपाये है जिसमें सुख गात। जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल— ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल॥
      • उषा की पहिली लेखा कांत, माधुरी से भींगी भर मोद; मदभरी जैसे उठे सलज्ज भोर की तारक-द्युति की गोद।।
      • अंधकार के अट्रहास सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य, 'छिपी सृष्टि के कण-कण में तू यह सुंदर रहस्य है नित्य। जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घनमाला में, सौदामिनी संधि सा सुंदर क्षण भर रहा उजाला में।।
      • चेतना का सुंदर इतिहास अखिल मानव भावों का सत्य; विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य अक्षरों से अंकित हो नित्य। विधाता की कल्याणी सृष्टि सफल हों इस भूतल पर पूर्ण; पटें सागर, बिखेरें ग्रह-पुंज और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।।
      • विश्व की दुर्बलता बल बने पराजय का बढ़ता व्यापार हंसाता रहे उसे सविलास शक्ति का क्रीड़ामय संचार। शक्ति के विद्युतकण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं हो निरुपाय समन्वय उसको करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाय।
      • “विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान, यही दुःख-सुख, विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार उमड़ता कारण-जलधि समान, व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुख-मणिगण द्युतिमान॥”
      • सुरा सुरभिमय वदन अरुण वे नयन भरे आलस अनुराग; कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पतृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये। आह! जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।।
      • नित्य-यौवन छवि से हो दीप्त विश्व की करुण कामना मूर्ति, स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण प्रकट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति। उषा की पहिली लेखा कांत, माधुरी से भीगी भर मोद, मद भरी जैसे उठे सलज्ज भोर की तारक-द्युति की गोद।।
      • “विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्तंभित विश्व महान; यही दुख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा में नीली लहरों बीच बिखरते सुख मणि गण द्युतिमान!”
      • महा-नृत्य का विषम सम, अरी अखिल स्पंदनों की तू माप, तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप। अधंकार के अट्टहास-सी, मुखरित सतत चिरंतन सत्य, छिपी सृष्टि के कण-कण में तू, यह सुन्दर रहस्य है नित्य।।
      • यह क्या मधुर-स्वप्न-सी झिलमिल सदय हृदय में अधिक अधीर व्याकुलता-सी व्यक्त हो रही आशा बन कर प्राण-समीर। यह कितनी स्पृहणीय बन गई मधुर जागरण-सी छविमान स्मिति की लहरों-सी उठती है नाच रही ज्यों मधुमय तान।
      • दया, माया, ममता लो आज मधुरिमा लो, अगाध विश्वास; हमारा हृदय-रत्न-निधि स्वच्छ तुम्हारे लिए खुला है पास। बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल; विश्व-भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल।
      • मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ, मैं शालीनता सिखाती हूँ, नूपुर-सी लिपट मनाती हूँ। लाली बन सरल कपोलों में, आँखों में अंजन-सी लगती, कुंचित अलकों-सी घुंघराली, मन की मरोर बन कर जगती।
      • उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं: जिसमें अनन्त अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती; ठोकर जो लगने वाली है। उसको धीरे से समझाती।
      • कर रही लीलामय आनंद, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त, विश्व का उन्मीलन अभिराम, इसी में सब होते अनुरक्त। काम-मंगल में मंडित श्रेय, सर्ग है इच्छा का परिणाम। तिरस्कृत कर उसको तुम भूल, बनाते हो असफल भवधाम।।
      • संकुचित असीम अमोघ शक्ति जीवन को बाधा-मय पथ पर ले चले भेद से भरी भक्ति या कभी अपूर्ण अजंता में हो रागमयी-सी महासक्ति ... तुम समझ न सको, बुराई से शुभ-इच्छा की है बड़ी शक्ति, हो विफल तर्क से भरी युक्ति।
      • उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।।
      • नेत्र निमीलन करती मानो प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने, जलधि लहरियों की अँगड़ाई बार-बार जाती सोने। सिंधु सेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी, प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये सी ऐठीं-सी।
      • सौंदर्य जलधि से भर लाये केवल तुम अपना गरल पात्र, तुम अति अबोध, अपनी अपूर्णता को न स्वयं तुम समझ सके ... 'कुछ मेरा हो' यह राग-भाव संकुचित पूर्णता है अजान — मानस-जलनिधि का क्षुद्र-यान॥
      • उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।
      • दिग्दाहों से धूम उठे, या जलघर उठे क्षितिज तट के। सधन गगन में भीम प्रकम्पन, झंझा के चलते झटके ॥ अन्धकारे में मलिन मित्त की धुंधली आभा लीन हुई; वरुण व्यस्त थे, घनी कालिमा स्तर स्तर जमती पीन हुई।
      • घिर रहे थे घुँघराले बाल अंस अव लम्बित मुख के पास। नील घन- शावक से सुकुमार सुधा भरने को विधु के पास॥ और उस मुख पर वह मुसक्यान ! रक्त किसलय पर ले विश्राम अरुण की एक किरण अम्लान अधिक अलसाई हो अभिराम !
      • अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी ! अरी आधि, मधुमय अभिशाप हृदय-गगन में धूमकेतु-सी, पुण्य-सृष्टि में सुंदर पाप। मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चित जाति का जीव अमर मरेगा क्या? तू कितनी गहरी डाल रही है नींव।
      • बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल वह विश्व मुकुट सा उज्ज्वलतम शशिखंड सदृश था स्पष्ट भाल दो पद्म-पलाश चषक-से दृग देते अनुराग विराग ढाल गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश वह आनन जिसमें भरा गान वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान था एक हाथ में कर्म-कलश वसुधा-जीवनरस-सार लिये दूसरा विचारों के नभ को या मधुर अभय अवलंब दिये त्रिवली थी त्रिगुण-तरंगमयी, आलोकवसन लिपटा अराल⁠⁠⁠ चरणों में थी गति भरी ताल ।।
      • नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पदतल में, पीपूष-स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा। संघर्ष सदा उर-अन्तर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा। आंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा।
      • हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खलखेला हरी-भरी-सी दौड़-धूप, ओ जल-माया की चल-रेखा। इस ग्रहकक्षा की हलचल-री तरल गरल की लघु-लहरी, जरा अमर-जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बहरी।
      • विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान; यही दु:ख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”।
      • राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है।
      • “संपूर्ण संसार कर्मण्य वीरों की चित्रशाला है। वीरत्व एक स्वावलंबी गुण है। प्राणियों का विकास संभवतः इसी विचार के ऊर्जित होने से हुआ है। जीवन में वही तो विजयी होता है जो दिन-रात 'युद्धस्व विगतज्वरः’ का शंखनाद सुना करता है।”
      • “अंधकार का आलोक से, असत्‌ का सत्‌ से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत्‌ का अंतर्जगत्‌ से संबंध कौन कराती है? कविता ही न!”
      • “इस गतिशील जगत्‌ में परिवर्तन पर आश्चर्य! परिवर्तन रुका कि महापरिवर्तन --प्रलय हुआ! परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शांति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है। समय पुरुष और स्त्री की गेंद लेकर दोनों हाथ से खेलता है।”
      • “उस हिमालय के ऊपर प्रभात-सूर्य की सुनहरी प्रभा से आलोकित प्रभा का, पीले पोखराज का सा, एक महल था। उसी से नवनीत की पुतली झाँक कर विश्व को देखती थी। वह हिम की शीतलता से सुसंगठित थी। सुनहरी किरणों को जलन हुई। तप्त होकर महल को गला दिया। पुतली! उसका मंगल हो, हमारे अश्रु की शीतलता उसे सुरक्षित रखे। कल्पना की भाषा के पंख गिर जाते हैं, मौन-नीड़ में निवास करने दो। छेड़ो मत मित्र!”
      • “अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है। अपने को नियामक और कर्ता समझने की बलवती स्पृहा उससे बेगार कराती है। उत्सवों में परिचारक और अस्त्रों में ढाल से भी अधिकार-लोलुप मनुष्य क्या अच्छे हैं?”
      • “राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ इसका दायित्व भी बढ़ गया है। पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को अब अनायास और अवश्य अपनी शरण में आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।”
      • “कष्ट हृदय की कसौटी है - तपस्या अग्नि है - सम्राट! यदि इतना भी न कर सके तो क्या! सब क्षणिक सुखों का अंत है। जिसमें सुखों का अंत न हो, इसलिए सुख करना ही न चाहिए। मेरे इस जीवन के देवता और उस जीवन के प्राप्य! क्षमा!”
      • “कवित्व वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, सत्‌ का असत्‌ से, जड़ का चेतन से, और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से सम्बन्ध कौन कराती है? कविता ही न!”
      • “उपनिषदों के 'नेति-नेति' से ही गौतम का अनात्मवाद पूर्ण है। यह प्राचीन महर्षियों का कथित सिद्धान्त 'मध्यमा-प्रतिपदा' के नाम से संसार में प्रचारित हुआ। व्यक्ति-रूप में आत्मा के सदृश कुछ नहीं है।”
      • “कविता करना अनन्त पुण्य का फल है। इस दुराशा और अनन्त उत्कण्ठा से कवि-जीवन व्यतीत करने की इच्छा हुई। संसार के समस्त अभावों को असन्तोष कहकर हृदय को धोखा देता रहा। परन्तु कैसी विडम्बना! लक्ष्मी के लालों का भ्रू-भंग और क्षोभ की ज्वाला के अतिरिक्त मिला क्या! - एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन, जो दूसरों की दया में अपना अस्तित्व रखता है!”
      • “आर्य, रक्तपात शत्रु को पराजित करने का सफल उपाय नहीं। शस्त्र द्वारा शत्रु को वध किया जा सकता है, उसे कुछ काल के लिए वश में किया जा सकता है, परन्तु विजय नहीं किया जा सकता। मनुष्य मृत्यु की अपेक्षा पराभव को केवल कायरता और प्रतिहिंसा की भावना से ही स्वीकार करता है।”
      • जब स्वजन लोग अपने शील-शिष्टाचार का नालन करें—आत्मसमर्पण, सहानुभूति, सत्पथ का अवलंबन करें, तो दुर्दिन का साहस नहीं कि उस कुटुम्ब की ओर आँख उठाकर देखे। इसलिए इस कठोर समय में भगवान्‌ की स्निग्धकरुणा का शीतल ध्यान कर।
      • विजय का क्षणिक उल्लास हृदय की भूख मिटा देगा? कभी नहीं। वीरों का भी क्या ही व्यवसाय है, क्या ही उन्मत्त भावना है। चक्रपालित! संसार में जो सबसे महान है, वह क्या है? त्याग! त्याग का ही दूसरा नाम महत्त्व है। प्राणों का मोह त्याग करना वीरता का रहस्य है।
      • राष्ट्रनीति दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद को समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ उसका दायित्व भी बढ़ गया है; पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को वे अब अनायास और अवश्य अपनी शरण आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।
      • परमात्मशक्ति का उत्थान पतन और पतन का उत्थान किया करती है। इसी का नाम है दम्भ का दमन। स्वयं प्रकृति की नियामिका शक्ति कृत्रिम स्वार्थसिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसा कार्य कोई जानबूझ कर नहीं करता, और न उसका प्रत्यक्ष में कोई कड़ा कारण दिखाई पड़ता है। उलट-फेर को शान्त और विचारशील महापुरुष ही समझते पर उसे रोकना उनके वश की भी बात नहीं है, क्योंकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है।
      • कवित्व वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, असत् का सत् से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से संबंध कौन कराती है, कविता न? (‘स्कन्दगुप्त’ नाटक, जयशंकर प्रसाद, प्रथम अंक, तृतीय दृश्य, पृष्ठ 47)।
      • मेरा साम्राज्य करुणा का था, मेरा धर्म प्रेम का था। आनन्द-समुद्र में शान्ति-द्वीप का अधिवासी ब्राह्मण मैं, चन्द्र-सूर्य-नक्षत्र मेरे दीप थे, अनन्त आकाश वितान था, शस्यश्यामला कोमला विश्वम्भरा मेरी शय्या थी। बौद्धिक विनोद कर्म था, सन्तोष धन था। उस अपनी, ब्राह्मण की, जन्म-भूमि को छोड़कर कहाँ आ गया! सौहार्द के स्थान पर कुचक्र, फूलों के प्रतिनिधि काँटे, प्रेम के स्थान में भय। ज्ञानामृत के परिवर्तन में कुमंत्रणा। पतन और कहाँ तक हो सकता है!
      • मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहा हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
      • मुझे इस देश में जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है। यहाँ के श्यामल-कुंज, घने जंगल सरिताओं की माला पहने हुए शैल-श्रेणी, हरी-भरी वर्षा, गर्मी की चाँदनी, शीत-काल की धूप, और भोले कृषक तथा सरला कृषक-बालिकाएँ, बाल्यकाल की सुनी हुई कहानियों की जीवित प्रतिमाएँ है। यह स्वप्नों का देश, यह त्याग और ज्ञान का पालना, यह प्रेम की रंगभूमि—भारतभूमि क्या भुलायी जा सकती है? कदापि नहीं। अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है; यह भारत मानवता की जन्मभूमि है।
      • परन्तु संसार—कठोर संसार ने सिखा दिया है कि तुम्हें परखना होगा। समझदारी आने पर यौवन चला जाता है—जब तक माला गूँथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चञ्चल स्थिति तब तक उस श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है।
      • ‘तुम मालव हो और यह मागध, यही तुम्हारे मान का अवसान है न? परन्तु आत्म-सम्मान इतने ही से सन्तुष्ट नहीं होगा। मालव और मागध को भूलकर जब तुम आर्यावर्त्त का नाम लोगे, तभी वह मिलेगा। क्या तुम नहीं देखते हो कि आगामी दिवसों में, आर्यावर्त्त के सब स्वतंत्र राष्ट्र एक के अनंतर दूसरे विदेशी विजेता से पददलित होंगे?’
      • मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
      • चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम!
      • अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं।
      • मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की?
      • समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता।
      • समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं।
      • मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
      • चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम!
      • अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं।
      • मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की?
      • समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता।
      • समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं।
    • निराला
      • 'कुकुरमुत्ता' कविता के मूल प्रतिपाद्य को स्पष्ट कीजिए।
      • 'निराला' रचित 'राम की शक्ति पूजा' के शिल्प-विधान की समीक्षा कीजिए।
      • 'कुकुरमुत्ता' की प्रगतिशील चेतना की मूल संवेदना को स्पष्ट कीजिए।
      • भाव, भाषा एवं विचार की दृष्टि से निराला की “कुकुरमुत्ता' कविता का मूल्यांकन कीजिए।
      • “राम की शक्तिपूजा' एक पराजित मन और दूसरे अपराजित मन के अस्तित्व की अनुभूति है।” – इस कथन की व्याख्या करते हुए निराला के काव्य का मूल्यांकन कीजिए।
      • 'राम की शक्ति पूजा' में निराला के आत्मसंघर्ष की भी व्यथा-कथा है। सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
      • “निराला कृत 'कुकुरमुत्ता' में व्यंग्य-विद्रूप के साथ भारतीय अस्मिता का जयघोष है''—युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • “कुकुरमुत्ता' अनुभूतिगत एवं अभिव्यक्तिगत स्तरों पर काव्य-आभिजात्य से मुक्ति का प्रयास है।” – इस कथन की व्याख्या करते हुए निराला के काव्य-सौन्दर्य को उद्घाटित कीजिए।
      • ‘राम की शक्तिपूजा' का आज के समय में नया पाठ क्या हो सकता है, स्पष्ट कीजिए।
      • “राम की शक्तिपूजा” के बाद निराला की रचनाओं में आकांक्षा-पूर्ति के स्वप्न क्रमशः कम गए हैं – सोदाहरण विवेचित कीजिए।
      • 'राम की शक्ति पूजा' की संरचना में तुलसीदास और 'सरोज-स्मृति' का सार सन्निहित है – विचार कीजिए।
      • निराला जीवन के राग-विराग के विशिष्ट कवि हैं – विवेचन कीजिए।
      • 'राम की शक्ति पूजा' में निराला की प्रसंग-चयन और विस्तार की विशेषता को स्पष्ट कीजिए।
      • 'कुकुरमुत्ता' के संदर्भ में निराला की प्रगतिशील चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • 'राम की शक्ति-पूजा' के आधार पर निराला की चरित्र-चित्रण कला की विशेषताएं स्पष्ट कीजिए।
      • 'राम की शक्ति-पूजा' और 'कुकुरमुत्ता' की संवेदना की भिन्नता को रेखांकित करते हुए निराला की शैलीगत विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
      • “राम की शक्ति पूजा” में महाकाव्यात्मक गरिमा है – इस कथन के आलोक में काव्य-सौष्ठव पर प्रकाश डालिए।
      • “देश के अभ्युत्थान के लिए शक्ति की उपासना आवश्यक है।” – इस अवधारणा को 'राम की शक्तिपूजा' के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
      • “राम की शक्ति-पूजा में महाकाव्योचित औदात्य की स्थिति लक्षित होती है।” – इस पर प्रमाण सहित उत्तर दीजिए।
      • “राम की शक्ति-पूजा' में युग-सत्य के साथ सार्वकालिक सत्य की भी व्यंजना की है।” – प्रमाण दीजिए।
      • 'सरोज स्मृति’ का गीतितात्विक विश्लेषण कीजिए।
      • “राम की शक्ति-पूजा' आख्यानात्मक कविता है जिसमें कवि को कल्पना विस्तार का अवसर मिला है” – समीक्षा कीजिए।
      • “राम की शक्तिपूजा' अथवा 'अंधेरे में' काव्य की शिल्प की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।
      • “सरोज स्मृति” तथा 'अंधेरे में’ में मानसिक विफलताओं के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
      • निराला ने महाकाव्य नहीं लिखा, पर कथात्मक काव्य में महाकाव्य के तत्व हैं – विवेचना कीजिए।
      • “वह एक और मन रहा राम का जो न थका” – यह पंक्ति 'राम की शक्ति पूजा' की संवेदना की वाहक है – परीक्षण कीजिए।
      • 'धिक जीवन को जो पाता ही पाया विरोध' – इस पंक्ति से 'राम की शक्ति पूजा' की द्वंद्वात्मक संरचना स्पष्ट कीजिए।
      • 'राम की शक्ति-पूजा' और 'अंधेरे में' में से किसे श्रेष्ठ मानते हैं – वस्तु-वर्णन के आधार पर विवेचना कीजिए।
      • 'सरोज-स्मृति’ और ‘राम की शक्ति-पूजा’ की भाव-व्यंजना की तुलना कीजिए।
      • 'सरोज-स्मृति’ और 'अंधेरे में' शीर्षक कविताओं की तुलना कीजिए।
      • 'सरोज स्मृति' के माध्यम से निराला की काव्यगत विशेषताएं स्पष्ट कीजिए।
      • 'सरोज स्मृति' की सरोज और 'कामायनी' की श्रद्धा की तुलना कीजिए।
      • ‘निराला’ छायावाद और प्रगतिवाद दोनों के प्रतिनिधि कवि हैं – विवेचना कीजिए।
      • 'सरोज स्मृति’ में निराला की आत्मव्यथा की कलात्मक अभिव्यक्ति की समीक्षा कीजिए।
      • निराला के काव्य में प्रगतिवादी स्वर।
    • निराला की रचनाएँ
      • विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण, हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण, आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर ।
      • धिकू जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका।
      • काँपते हुए किसलय, --झरते पराग समुदय,-- गाते खग नव-जीवन-परिचय, तरु मलय-वलय, ज्योतिः प्रपात स्वर्गीय, --ज्ञात छवि प्रथम स्वीय-- 'जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।
      • आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर, रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त, तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त, शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनंदन !
      • शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़ जल राशि-राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोड़ता बंध-प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।
      • दिल ने कहा--दलित माओं के सब बच्चे अब बागी होंगे अग्निपुत्र होंगे वे, अंतिम विप्लव में सहभागी होंगे दिल ने कहा--अरे यह बच्चा सचमुच अवतारी वराह है इसकी भावी लीलाओं का सारी धरती चरागाह है।
      • “ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार, ही श्वसित पवन-उनचास, पिता-पक्ष से तुमुल, एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग उठते पहाड़, जल राशि-राशि "जल पर चढ़ता खाता पछाड़, दर तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा, हो स्फीत-वक्ष, दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।।
      • कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रखा, सहाया जाड़ा-घाम; हाथ जिसके तू लगा, पैर सर रखकर व” पीछे को भगा औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा तभी साधारणों से तू रहा न्यारा।
      • “धिक्‌ जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राम का जो नं थका, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय, बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युत्‌-गति हतचेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।
      • बैठे मारुति देखते राम-चरणारविन्द युग ‘अस्ति-नास्ति’ के एक-रूप, गुण-गण-अनिन्द्य साधना-मध्य भी साम्य-वाम-कर दक्षिण-पद्‌ दखिण करतल पर वाम चरण, कपिवर गद्गद।
      • अबे, सुन बे गुलाब, भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब, खून चूसा खाद का तून अशिष्ट, डाल पर इतराता है केपीटलिस्ट! कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रक्खा, सहाय जाड़ा-घाम।
      • विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी स्नेह-स्वप्न-मगन अमल-कोमल-तनु तरुणी-जुही की कली, दृग बन्द किये, शिथिल, -पत्रांक में, वासन्ती निशा थी; विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़ किसी दूर देश में था पवन जिसे कहते हैं मलयानिल। (‘राग-विराग', निराला, ‘जुही की कली’ से, पृष्ठ 48)।
      • शोकगीत के रूप में 'सरोज-स्मृति' की समीक्षा कीजिए।।
      • शत-शुद्धि-बोध - सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है छात्र-धर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से, संयम से रक्षित, वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खण्डित ! देखा, हैं महाशक्ति रावण को लिए अंक, लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक; हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार !
      • देखो, बन्धुवर सामने स्थित जो यह भूधर शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर, पार्वती कल्पना हैं इसकी, मकरन्द-बिन्दु; गरजता चरण--प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु; दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर; लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व- मानव के मन का असुर मन्द, हो रहा. खर्व।
      • 'ये अश्रु राम के! आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार, हो श्वसित पवन उनंचास, पितापक्ष से तुमुल एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प का उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग भंग उठते पहाड़, जल राशि राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोडता बन्ध प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।
      • बोले-“सम्वरो देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, - नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर अर्चना राम की मूर्तिमान्‌ अक्षय-शरीर,। चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य, मर्यादापुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य, लीला-सहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार, करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार विद्या का ले आश्रम इस मन को दो प्रबोध, झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा-दूर रोध।
      • बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।।
      • देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति – शृंगार, रहा जो निराकार, रह कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना माही।
      • जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।।
      • फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर माँ की मधुरिमा व्यंजना भर। हर पिता-कंठ की दृप्त-धार उत्कलित रागिनी की बहार! बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वह्लि साकार हुई दृष्टि में सुघर, समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।
      • है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार।
      • फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को, ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण, पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन; लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;।
      • देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति— शृंगार, रहा जो निराकार रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग भरता प्राणों में राग-रंग रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदलकर बना मही।
      • देखता रहा मैं खड़ा अपल, वह शर-क्षेप वह रण-कौशल। व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल, कुद्ध युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल। और भी फलित होगी वह छवि, जागे जीवन-जीवन का रवि, लेकर कर कल तूलिका कला, देखो क्या रंग भरती विमला, वांछित उस किस लांक्षित छवि पर, फेरती स्नेह की कूची भर!
      • बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।।
      • देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति – शृंगार, रहा जो निराकार, रह कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना माही।
      • जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।।
      • फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर माँ की मधुरिमा व्यंजना भर। हर पिता-कंठ की दृप्त-धार उत्कलित रागिनी की बहार! बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वह्लि साकार हुई दृष्टि में सुघर, समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।
      • है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार।
      • फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को, ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण, पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन; लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन, खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;।
      • देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति— शृंगार, रहा जो निराकार रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग भरता प्राणों में राग-रंग रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदलकर बना मही।
      • देखता रहा मैं खड़ा अपल, वह शर-क्षेप वह रण-कौशल। व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल, कुद्ध युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल। और भी फलित होगी वह छवि, जागे जीवन-जीवन का रवि, लेकर कर कल तूलिका कला, देखो क्या रंग भरती विमला, वांछित उस किस लांक्षित छवि पर, फेरती स्नेह की कूची भर!
      • “धिक्‌ जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिये सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार, प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राय का जो न थका जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय बुद्धि के दुर्ग पहुंचा विद्युत-गति हत चेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।
      • स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय, रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय; जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रांत,— एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रांत, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।
      • है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।
      • “दुख ही जीवन की कथा रही। क्या कहूं आज तो नहीं कही।” इस उक्ति के संदर्भ में 'सरोज-स्मृति' का वैशिष्ट्य निरूपित कीजिए।।
      • शत-शुद्धि-बोध—सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है छात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित, वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खंडित!
      • शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़, जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।।
    • दिनकर
      • "युद्ध की समस्या मनुष्य की सारी समस्याओं की जड़ है" — दिनकर के 'कुरुक्षेत्र' काव्य के आधार पर इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
      • 'कुरुक्षेत्र' के आधार पर 'दिनकर' की युग-चेतना पर प्रकाश डालिए ।
      • "युद्ध की समस्या मनुष्य की सारी समस्याओं की जड़ है।" इस कथन के आलोक में दिनकर के 'कुरुक्षेत्र' का मूल्यांकन कीजिए।
      • “दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में युधिष्ठिर और भीष्म के माध्यम से अपने ही मानसिक अंतदूद्वों को अभिव्यक्त किया है।” कथन का तर्कपूर्ण विवेचन कीजिए।
      • “दिनकर युगचेता कवि हैं।” ‘कुरुक्षेत्र’ से उदाहरण देते हुए इस कथन की सत्यता प्रमाणित कीजिए।
      • 'कुरुक्षेत्र' एक साधारण मनुष्य का शंकाकुल हृदय है, जो मस्तिष्क के स्तर पर चढ़कर बोल रहा है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “कुरुक्षेत्र में युग प्रबुद्ध उद्धि्नि मानस का जो दृन्द्र चित्रित हुआ है, उससे उसकी प्रबन्धात्मकता भी प्रभावित हुई है।” पक्षापक्ष विमर्श कीजिए।
      • “दिनकर की रचना “कुरुक्षेत्र” के सृजन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रयोजन ‘शिवेतरक्षतये’ भी है।” -- अपने मत को सोदाहरण एवं तर्क सहित प्रस्तुत कीजिए।
      • युद्ध की विभीषिका को दिनकर ने अपने काव्य “कुरुक्षेत्र” में किस प्रकार रेखांकित किया है? समीक्षा कीजिए।
      • दिनकर की रचनाओं के संदेश अपनी भाषा में लिखिए।
      • दिनकर की काव्य भाषा की उन विशेषताओं पर उदाहरण-सहित विचार कीजिए जो उन्हें लोकप्रिय बनाती हैं।
      • युद्ध और शांति की समस्या वास्तव में सामाजिक समता की समस्या है - 'कुरुक्षेत्र' के आधार पर विचार कीजिए।
    • दिनकर की रचनाएँ
      • बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहाय जा रहा तू किस दिशा की ओर को निरुपाय? लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ? यह नहीं यदि ज्ञात, तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ।
      • शोषण की शृंखला के हेतु बनती जो शांति, युद्ध है, यथार्थ में, व' भीषण अशांति है; सहना उसे हो मौन, हार मनुजत्व की है, ईश की अवज्ञा घोर, पौरुष की श्रांति है; पातक मनुष्य का है, मरण मनुष्यता का, ऐसी शृंखला में धर्म विप्लव है, क्रांति है।
      • बालहीना माता की पुकार कभी आती, और आता आर्त्तनाद पितृहीन बाल का; आँख पड़ती है जहाँ, हाय वहीं देखता हूँ सेंदुर पुँछा हुआ सुहागिनी के भाल का; बाहर से भाग कक्ष में जो छिपता हूँ कभी, तो भी सुनता हूँ अट्टहास क्रूर काल का; और सोते-जागते में चौंक उठता हूँ, मानो शोणित पुकारता हो अर्जुन के लाल का।
      • शांति-बीन तब तक बजती है नहीं सुनिश्चित सुर में, स्वर की शुद्ध प्रतिध्वनि जब तक उठे नहीं उर-उर में। यह न बाह्म उपकरण, भार बन जो आवे ऊपर से, आत्मा की यह ज्योति, फूटती सदा बिमल अंतर से ॥
      • ईश जानें, देश का लज्जा-विषय तत्त्व है कोई कि केवल आवरण उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का जो कि जलती आ रही चिरकाल से स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी नायकों के पेट में जठराग्नि-सी।
      • “न्यायोचित सुख सुलभ नहीं जब तक मानव-मानव को चैन कहाँ धरती पर, तब तक शान्ति कहाँ इस भव को? जब तक मनुज-मनुज का यह सुख-भाग नहीं सम होगा शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा।
      • भूल रहे हो धर्मराज, तुम, अभी हिंस्र भूतल है, खड़ा चतुर्दिक्‌ अहंकार है, खड़ा चतुर्दिक्‌ छल है। में भी हूँ सोचता, जगत से कैसे उठे जिघांसा। किस प्रकार फैले पृथ्वी पर करुणा, प्रेम, अहिंसा।
      • “चुराता न्याय जो, रण को बुलाता भी वही है; युधिष्ठिर ! स्वत्व की अन्वेषणा पातक नहीं है। नरक उनके लिए, जो पाप को स्वीकारते हैं; न उनके हेतु जो रण में उसे ललकारते हैं।।
    • अज्ञेय
      • 'असाध्य वीणा' के परिप्रेक्ष्य में 'अज्ञेय' के काव्यगत वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
      • “‘असाध्य वीणा' में अज्ञेय के कवि-कर्म का क्रमिक विकास विभिन्न स्तर पर अभिव्यक्त हुआ है।” सम्यक् विवेचना कीजिए।
      • 'असाध्य वीणा' कविता का मूल स्रोत क्या है? कवि ने कविता-सृजन की प्रक्रिया को किन स्तरों पर प्रस्तुत किया है?
      • अज्ञेय द्वारा रचित कविता “असाध्य वीणा” की मूल संवेदना स्पष्ट कीजिए।
      • ‘असाध्य वीणा’ के किरीटी तरु में जो ध्वनियाँ समाहित हुईं और वीणा वादन के बीच जो ध्वनियाँ झंकृत हुईं उनके साम्य-वैषम्य पर विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • “अज्ञेय ने ‘असाध्य वीणा’ कविता में अनेक मिथकों के माध्यम से अभीष्ट एवं सार्थक बिंबों का सृजन किया है।” अज्ञेय की काव्य-कला के संदर्भ में विचार कीजिए।
      • सिद्ध कीजिए कि “असाध्य वीणा” सृजनात्मकता के रहस्य को उसकी समग्रता में अभिव्यक्त करती है।
      • अन्तस्‌ और बाह्य जगत की एकाकारता के सजीव प्रतीक के रूप में “असाध्य वीणा” की समीक्षा कीजिए।
      • अज्ञेय की कविता: व्यक्तित्व के खोज की कविता है या व्यक्तित्व के विलयन की? ‘असाध्य वीणा’ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
      • मगर कोटरी में बैठने की देर थी कि आँखों से छल-छल आँसू बहने लगे। वह दुपट्टे से बार-बार उन्हें पोंछती, पर वे बार-बार उमड़ आते, जैसे बरसों का बाँध तोड़कर उमड़ आए हों। माँ ने बहुतेरा दिल को समझाया, हाथ जोड़े, भगवान का नाम लिया, बेटे के चिरायु होने की प्रार्थना की, बार-बार आँखें बंद कीं, मगर आँसू बरसात के पानी की तरह जैसे थमने में ही न आते थे।
      • ‘असाध्य वीणा’ को केन्द्र में रखकर अज्ञेय की रचनादृष्टि और जीवन-दर्शन का निरूपण कीजिए।
    • अज्ञेय की रचनाएँ
      • सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था: वह तो सब कुछ की तथता थी महाशून्य, वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सब में गाता है।
      • तू गा : मेरे अँधियारे अंतसू में आलोक जगा स्मृति का, श्रुति का : तू गा, तू गा, तू गा, तू गा।
      • अलस अँगड़ाई लेकर मानो जाग उठी थी वीणा : किलक उठे थे स्वर-शिशु। नीरव पद रखता जालिक मायावी सधे करों से धीरे-धीरे डाल रहा था जाल हेम तारों का।
      • अवतरित हुआ संगीत स्वयंभू, जिसमें सोता है अखण्ड ब्रह्मा का मौन, अशेष प्रभामय।
      • सबने भी अलग-अलग संगीत सुना इसको वह कृपा वाक्य था प्रभुओं का उसको आतंक मुक्ति का आश्वासन इसको वह भरी तिजोरी में सोने की खनक। उसे बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुशबू। किसी एक को नयी वधू की सहमी सी पायल ध्वनि किसी दूसरे को शिशु की किलकारी 'एक किसी को जाल फँसी मछली की तड़पन--एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की। 'एक तीसरे को मंडी की ठेलमठेल, ग्राहकों की आस्पर्धा भली बोलियाँ, चौथे को मंदिर की ताल-युक्त घंटा-ध्वनि। और पाँचवें को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोर और छठें को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की अविराम थपक 'बटिया पर चमरौधे की रुंधी चाम सातवें के लिए-- और आठवें को कुलिया की कटी मेड़ से बहते जल की छुल-छुल। इसे गमक नद्टिन की ऐड़ी के घुँघरू की। उसे युद्ध का ढोल। इसे संझा-गोधूली की लघु टुन-टुन उसे प्रलय का डमरू नाद। इसको जीवन की पहली अंगड़ाई पर उसको महाजृंभ विकराल काल सब डूबे, तिरे, झिपे जागे हो रहे वशंबद स्तब्ध इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी।।
      • “श्रेय नहीं कुछ मेरा: मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब-कुछ को सौंप दिया था - सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था: वह तो सब-कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सब में गाता है।
      • “ओ विशाल तरु! शत-सहस्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा, कितनी बरसातों, कितने खद्योतों ने आरती उतारी दिन भौरे कर गये गुंजरित, रातों में झिल्ली ने अनथक मंगल-गान सुनाये, सांझ-सवेरे अनगिन अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा-काकलि डाली-डाली को कँपा गयी -।
      • “श्रेय नहीं कुछ मेरा : मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब कुछ को सौंप दिया था - सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था : वह तो सब कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सबमें गाता है।“
      • श्रेय नहीं कुछ मेरा : मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैं ने सब-कुछ को सौंप दिया था - सुना आप ने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था : वह तो सब-कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन। सब में गाता है।
      • पर उस स्पन्दित. सन्नाटे में मोन प्रियवंद साध रहा था वीराग- नहीं स्वयं अपने को शोध रहा था। सघन निविड में वह अपने को। सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को। कौन प्रियंवद है कि दंभ कर। इस अभिमंत्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?।।
    • 'शेखर : एक जीवनी'
      • 'शेखर : एक जीवनी' हिन्दी में कथा-वस्तु, शैली-शिल्प तथा भाव-बोध के स्तर पर अपना विशिष्टं स्थान रखती है। समीक्षा कीजिए।
      • “सभी संस्थाओं के प्रति, समस्त रीतियों के प्रति, जीवन मात्र के प्रति विद्रोह क्रांतिकारी की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।” - इस कथन के आलोक में शेखर के चरित्र की समीक्षा कीजिए।
      • “'शेखर : एक जीवनी' व्यक्ति-स्वातंत्र्य और समाज के मध्य अन्तरद्वन्द्व और संघर्ष की कहानी है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
      • “शेखर में मानवता के संचित अनुभव के प्रकाश में ईमानदारी से अपने को पहचानने की कोशिश है।” - पक्ष अथवा विपक्ष में अपना मंतव्य स्पष्ट कीजिए।
      • शेखर का जीवन-दर्शन स्वातंत्र्य की खोज है — निर्धारित उपन्यास को दृष्टिगत कर अज्ञेय की स्वातंत्र्य-विषयक अवधारणा शेखर के वितरित जीवन के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
      • स्पष्ट कीजिए कि "शेखर : एक जीवनी” का मूल मन्तव्य मानवीय परिस्थितियों के बीच “स्वतन्त्रता की खोज” है।
      • ‘शेखर एक जीवनी व्यक्ति का अभिन्नतम दस्तावेज होने के साथ-साथ उसके युग सन्दर्भ का प्रतिबिम्ब भी है।’ इस कथन की तर्कसम्मत समीक्षा कीजिए।
      • स्पष्ट कीजिए कि 'शेखर : एक जीवनी' कथ्य तथा शिल्प में परम्परागत सामाजिक उपन्यास से कैसे भिन्न है।
      • 'शेखर-एक जीवनी” में बौद्धिकता के आधार पर उच्च मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व हुआ है। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं?
      • “शेखर मूलतः और अंततः एक व्यक्तित्व की खोज है, एक व्यक्तित्व का उसके अपने साथ साक्षात्कार है।” ‘शेखर : एक जीवनी’ के आधार पर इस कथन की युक्तियुक्त समीक्षा कीजिए।
      • ‘शेखर: एक जीवनी’ उपन्यास के कलेवर में आत्मकथा है — क्या आप सहमत हैं? तर्कसम्मत उत्तर दीजिए।
      • उपन्यास-कला की दृष्टि से ‘शेखर : एक जीवनी’ की शिल्पगत विशिष्टताओं का परिचय दीजिए।
      • ‘चेतना-प्रवाह, प्रतीकात्मकता और भाषा की आन्तरिकता की दृष्टि से’ शेखर : एक जीवनी” का महत्व बतलाइए।
      • “शेखर के विद्रोही व्यक्तित्व का प्रेरक तत्व काम-भावना है।” क्या आप इस टिप्पणी से सहमत हैं? 'शेखर : एक जीवनी’ के आधार पर विचार कीजिए।
      • कथा-वस्तु, भाषा सौष्ठव और विचारों की गहनता की दृष्टि से ‘शेखर : एक जीवनी’ की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
      • “'शेखर : एक जीवनी' अज्ञेय की गहन अनुभूति-शीलता और बौद्धिक सजगता का सुन्दर उदाहरण है।” इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में विचार कीजिए।
      • इस कथन में कहाँ तक सच्चाई है कि शेखर अपने युग का प्रतिनिधि विद्रोही चरित्र है? ‘शेखर : एक जीवनी’ के आधार पर विचार कीजिए।
      • मूर्ति का निर्माण हो सकता है, मृत्तिका का नहीं! उसी मिट्टी से अच्छी प्रतिमा भी स्थापित की जा सकती है, बुरी भी, पर जहाँ मिट्टी ही न हो, वहाँ कितने ही प्रचार से, कितनी भी शिक्षा से, कितने भी जाज्वल्यमान बलिदान से मूर्ति नहीं बन सकती। (शेखर)।
      • “शेखर के माध्यम से व्यष्टि सत्य के साथ समष्टि सत्य को पाने और दोनों में परस्पर सन्तुलन स्थापित करने की चेष्टा दिखायीं पड़ती है।” इस कथन के आधार पर ‘शेखर : एक जीवनी’ की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
      • “शेखर एक व्यक्ति का अभिन्नतम निजी दस्तावेज है, यद्यपि वह साथ ही उस व्यक्ति के युग संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है।” — इस कथन की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
      • वेदना के बिना ज्ञान नहीं है, तभी तो ज्ञान अपौरुषेय है — पुरुष की बुद्धि में वह नहीं पाया जाता, वेदना में, तपस्या में, वह उदित होता है। वह मंथन से मिलने वाला अमृत नहीं है, वह अवतीर्ण होने वाला कोई अप्रमेय है... इसी तरह पीड़ा की तपस्या से सहसा जाग कर उन्होंने प्रज्ञा के बोझ से लड़खड़ाकर कहा होगा, अपौरुषेय! अपौरुषेय! (शेखर)।
      • ‘शेखर : एक जीवनी’ की शैलीगत विशेषताएं।
      • मृत्यु के भटके हुए उदास पैर द्वार-द्वार पर जाते हैं, और यौवन मुरझा जाता है, और जीवन धुल जाता है, और वेदना है अनन्त... एक नीरवता का क्षण आता है; जिसमें उन श्याम पंखों की उड़ान का रव सुन पड़ता है, जिन्हें देखना सो जाना है... हर कोई ऊँघता है और सो जाता है, हर व्यक्ति और हर वस्तु : केवल यह तृप्त न होने वाली भूख, यह किसी चरम ध्येय की पागल माँग, यह मुक्ति का विवश आकर्षण, यह नहीं बस होता... मृत्यु के पंख उस पर से बीत जाते हैं, लेकिन उनकी छाया उसे नहीं ग्रसती, वैसा ही उद्दीप्त छोड़ जाती है...।
      • इस कहानी में देखो, "धर्म संस्कृति का आदर्श नियम है, इसलिए धर्म की बुराइयाँ संस्कृति में पैदा होती हैं, इसलिए संस्कृति बुरी है" — यह केवल तर्कना-शक्ति का, नट का तमाशा है। संस्कृति की बुराई अगर हमें दिखती है, तो संस्कृति में स्पष्ट देखनी होगी, इस प्रकार दूर से सिद्ध नहीं करनी होगी। नहीं तो, अच्छा कुछ है ही नहीं, बुराई ही बुराई है, और यह हमारी अशांति भी तो उस बुराई में पैदा हुआ मनोविकार है: मानव बुरा होकर अच्छी बात सोच कैसे सकता है? आप अन्धकार दूर करना चाहें तो यही कर सकते हैं कि रोशनी जला दें, यह नहीं कर सकते कि अन्धकार का अधियारापन मिटा दें।
      • मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं। विद्रोहबुद्धि परिस्थितियों के संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती। वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि देव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है। यदि बाहरी होती, परकीय होती, तो हम उसे देव कह सकते, पर वह तो भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो। ......।
      • मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं ! विद्रोह बुद्धि परिस्थितियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती ! वह आत्मा की कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि दैव कुछ है, क्योंकि हम में कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो।
      • उसके मन में भावना हुई, इस दुर्गम पथ पर एक-एक करके सब रसिक रह गये हैं--वृक्ष रह गये, फूल रह गये, बूटियाँ रह गई, एकान्त, तपस्वी नीले पोस्त तक रह्‌ गये-- अब बचे हैं तो नीरस पत्थर, नीरस घास और नीरस जिज्ञासु वह.... इस बीहड़ मार्ग पर सौन्दर्य उसे दीखता ही चाहिए-- पर क्या सौन्दर्य कुछ है भी? क्या रस की कल्पना, आसन्न रस-लब्धि की सद्भाव भावना ही को सौन्दर्य नहीं कह देते? “इससे मैं अभी-अभी सुख पाउँगा” — इस चिन्ता में ही व्यक्ति इतना डूब जाता है कि सुख पाने से पहले ही रस-बोध उसे हो जाता है, तब वह कहता है “कितनी सुन्दर!” वासना की अमूर्त के द्वारा पूर्ति का नाम ही सौन्दर्य है न।
    • मुक्ति बोध
      • 'ब्रह्मराक्षस' कविता की प्रतीक-योजना पर प्रकाश डालिए।
      • ‘ब्रह्मराक्षस’ अस्तित्ववादी मान्यताओं और खंडित व्यक्तित्व का प्रतीक है। इस कथन के आलोक में ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए।
      • मुक्तिबोध की कविता ‘ब्रह्मराक्षस’ में अंतःस्यूत फैंटेसी को व्याख्यायित कीजिए।
      • 'मुक्तिबोध अपनी कविता में एक सच्चा-खरा और संघर्षशील संसार रचते हैं।' इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “ब्रह्मराक्षस के मिथकीय प्रयोग” की व्याख्या करते हुए मध्यवर्गीय जीवन की त्रासदी पर प्रकाश डालिए।
      • “मुक्तिबोध रचित ‘ब्रह्मराक्षस’ की उपलब्धि है भयानक अंगीरस, तिलिस्मी ‘वस्तु’ और आवेग — कल्पना-संवेदना का संगम।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “मुक्तिबोध ने ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता में फैंटेसी शैली के माध्यम से कविता जैसी विधा में नाटकीय प्रभाव की सृष्टि की है।” — इस कथन की तर्क एवं उदाहरण सहित विवेचना कीजिए।
      • वैश्वीकृत परिदृश्य में मुक्तिबोध की कविता का पुनर्पाठ प्रस्तुत कीजिए।
      • मुक्तिबोध की कविता में आधुनिकताबोध के नए आयाम के साथ आत्मबोध के स्वर भी हैं। विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • समकालीन दौर में भी मुक्तिबोध की कविता का पुनर्पाठ लगातार हो रहा है। समकालीन कविता में मुक्तिबोध की कविता किस तरह संस्थित है?
      • नई कविता के आत्मसंघर्ष का सर्वोत्तम रूप मुक्तिबोध की कविताओं में मिलता है — इस विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
      • क्या मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष में सामाजिक संघर्ष भी व्यक्त हुआ है? मुक्तिबोध के काव्य में सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए।
      • नई कविता के दायरे में रहते हुए मुक्तिबोध की काव्यशैली में प्रगतिशीलता का निर्वहन हुआ है — स्पष्ट कीजिए।
      • ‘ब्रह्मराक्षस’ को प्रतीकात्मकता पर प्रकाश डालते हुए समझाइए कि इस कविता की भाषा तथा शिल्प कहाँ तक कवि की संवेदना के अनुकूल हैं।
      • ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता की संवेदनागत तथा शिल्पगत विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
      • ‘राम की शक्तिपूजा’ अथवा ‘अंधेरे में’ काव्य की शिल्प की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।
      • ‘सरोज स्मृति’ तथा ‘अंधेरे में’ में अभिव्यक्त मानसिक विफलताओं के मौलिक अंतर को स्पष्ट कीजिए और इस अंतर के कारण बताइए।
      • “‘अंधेरे में’ कविता का मूल काव्य है – अस्मिता की खोज; जो आधुनिक मानव की सर्वाधिक ज्वलंत समस्या है।” — इस उक्ति की तर्कयुक्त व्याख्या कीजिए।
      • “मुक्तिबोध हमेशा एक विशाल विस्तृत कैनवस लेता है: जो समतल नहीं होता।” ‘अंधेरे में’ को ध्यान में रखते हुए युक्तियुक्त विचार कीजिए।
      • ‘कामायनी’ के आधुनिक बोध अथवा ‘अंधेरे में’ के यथार्थ बोध का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • वस्तु वर्णन की दृष्टि से ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘अंधेरे में’ शीर्षक कविताओं पर विचार कीजिए। आप दोनों में किसे श्रेष्ठ कविता मानते हैं?
      • “‘अंधेरे में’ शीर्षक कविता के प्रतीक प्राचीन गाथाओं के टुकड़े जान पड़ते हैं, मगर इन टुकड़ों के सन्दर्भ आधुनिक हैं।” — इस उक्ति के औचित्य पर विचार कीजिए।
      • प्रतीकात्मकता, बिंब-विधान और छंद-योजना की दृष्टि से ‘अंधेरे में’ शीर्षक कविता का महत्व स्पष्ट कीजिए।
      • वस्तु-वर्णन के आधार पर ‘सरोज-स्मृति’ और ‘अंधेरे में’ शीर्षक कविताओं की तुलना कीजिए। आप दोनों में किसे श्रेष्ठ कविता मानते हैं?
      • ‘अंधेरे में’ शीर्षक कविता की भाषा और शैली पर प्रकाश डालिए। आवश्यक उदाहरण भी दीजिए।
      • ‘अंधेरे में’ शीर्षक कविता का कथ्य क्या है? स्पष्ट कीजिए।
      • ‘अंधेरे में’ कविता का कथ्य क्या है? इस कविता की विशेषताओं का उद्घाटन कीजिए।
    • मुक्ति बोध की रचनाएँ
      • अति-प्रफुल्लित कंटकित तन-मन वही करता रहा अनुभव कि नभ ने भी विनत हो मान ली है श्रेष्ठता उसकी !!
      • महत्ता के चरण में था विषादाकुल मन ! मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर बताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्य, उसकी महत्ता !
      • पिस गया वह भीतरी औ' बाहरी दो कठिन पाटों वीच, ऐसी ट्रेजिडी है नीच ! बावड़ी में वह स्वयं पागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहा वह कोठरी में किस तरह अपना गणित करता रहा औ' मर गया।
      • थे गरजती, गूँजती आन्दोलिता गहराइयों से उठ रहीं ध्वनियाँ, अतः उद्भ्रान्त शब्दों के नये आवर्त में हर शब्द निज प्रति-शब्द को भी काटता, वह रूप अपने बिम्ब से ही जूझ विकृताकार-कृति है बन रहा, ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ।।
      • मैं ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्य होना चाहता जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य, उसकी वेदना का स्रोत संगत, पूर्ण निष्कर्षों तलक पहुँचा सक।
      • किन्तु, गहरी बावड़ी को भीतरी दीवार पर तिरछी गिरी रवि-रश्मि के उड़ते हुए परमाणु, जब तल तक पहुंचते हैं कभी तब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य ने झुककर “नमस्ते” कर दिया।।
      • एक-एक वस्तु या एक-एक प्राणाग्नि-बम है ये परमास्त्र है, प्रक्षेपास्त्र है, यम है। शून्याकाश में से होते हुए वे अरे, अरि पर ही टूटे पड़े अनिवार। यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हाँ भई। कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी॥
      • पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव, हाथों से महसूस अनुभव करता हूँ दुनियाँ, मस्तक अनुभव करता है आकाश, दिल में तड़पता है अन्धेरे का अन्दाज, आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगती, केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी। आत्मा में, भीषण सत-चित्-वेदना जल उठी, दहकी। विचार हो गए विचरण-सहचर।
      • सचमुच, मुझको तो जिंदगी-सरहद सूर्यों के प्रांगण पार भी जाती-सी दीखती! मैं परिणत हूँ कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ — वर्तमान समाज चल नहीं सकता, स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी छल नहीं सकता मुक्ति के मन को, जन को।
      • विचित्र प्रोसेशन, गंभीर क्विक मार्च... कलाबत्तूवाली काला ज़रीदार ड्रेस पहने चमकदार बैंड-दल— अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति आँतों के जालों से, बाजे वे दमकते हैं भयंकर गंभीर गीत-स्वप्न-तरंगें उभारते रहते, ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर।
      • अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब। पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार तब कहीं देखने मिलेगी हमको नीली झील की लहरीली थाहें जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता अरुण कमल एक — धँसना ही होगा झील के हिम-शीत सुनील जल में।
      • वह बिठा देता है तुंग शिखर के खतरनाक, खुरदरे कगार-तट पर शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको। कहता है - "पार करो पर्वत-संधि के गहवर, रस्सी के पुल पर चलकर दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो" अरे आई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा, मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से।
      • बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये, करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये, बन गये पत्थर, बहुत-बहुत ज़्यादा लिया, दिया बहुत-बहुत कम, मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!
      • दुःखों के दागों को तमगों-सा पहना, अपने ही खयालों में दिन-रात रहना, असंग बुद्धि व अकेले में सहना, जिंदगी निष्क्रिय बन गयी तलघर, अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!
      • पर्चा पढ़ते हुए उड़ता हूँ हवा में, चक्रवात-गतियों में घूमता हूँ नभ पर, ज़मीन पर एक साथ सर्वत्र सचेत उपस्थित। प्रत्येक स्थान पर लगा हूँ मैं काम में, प्रत्येक चौराहे, दुराहे व राहों के मोड़ पर सड़क पर खड़ा हूँ, मानता हूँ, मानता हूँ, मनवाता अड़ा हूँ!
      • वह रहस्यमय व्यक्ति अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है पूर्ण अवस्था वह निज-संभावनाओं निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की, मेरे परिपूर्ण की आविर्भाव हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह, आत्मा की प्रतिमा।
      • बौद्धिक वर्ग है कीतदास, किराये के विचारों का उद्भास। बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियां पुत गयीं। नपुंसक श्रद्धा सड़क के नीचे गटर में छिप गयी। कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी।
    • नागार्जुन
      • नागार्जुन रचित 'अकाल और उसके बाद' की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
      • नागार्जुन के काव्य-वैविध्य पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
      • "हरिजन गाथा” कविता के आधार पर नागार्जुन की जनवादी दृष्टि की मीमांसा कीजिए।
      • 'हरिजन गाथा' कविता की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए।
      • नागार्जुन की कविता में प्रकृति वर्णन का विवेचन कीजिए।
      • ‘अकाल के बाद’ कविता की मूल संवेदना को सोदाहरण विवेचित कीजिये।
      • “नागार्जुन अकाल को प्राकृतिक अभिशाप के रूप में कम, मानवीय अभिशाप के रूप में ज्यादा देखते हैं” -- इस कथन के आलोक में नागार्जुन के काव्य की समीक्षा कीजिए।
      • नागार्जुन की लोक-दृष्टि के आधारभूत तत्त्व कौन-कौन से हैं ? समीक्षा कीजिए।
      • बाबा नागार्जुन नये काव्य में किन अर्थों में महत्त्वपूर्ण हैं, स्पष्ट कीजिए।
      • नागार्जुन की कविता लोक-जीवन की भूमि से उग कर, प्रतिबद्धता पर आरूढ़ हो, व्यंग्य के शिखर का स्पर्श करती है। - इस कथन की पुष्टि कीजिए।
      • नागार्जुन को जन-कवि क्यों कहा जाता है?
      • नागार्जुन की काव्य-संवेदना और भाषा-शैली की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
    • नागार्जुन की रचनाएँ
      • छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को, मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है।
      • दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद, धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद, चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद, कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।
      • जाने दो, वह कवि-कल्पित था, मैंने तो भीषण जाड़ों में नभ-चुंबी कैलास शीर्ष पर, महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है।
      • दुर्गम बर्फानी घाटी में शत-सहस्र फुट की ऊँचाई पर अलख नाभि से उठने वाले निज के ही उन्मादक परिमल के पीछे धावित हो-होकर तरल-तरुण कस्तूरी-मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है, बादल को घिरते देखा है।।
      • दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद, धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद, चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद, कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।।
    • भारतेन्दु
      • "‘भारत दुर्दशा’ अतीत गौरव की चमकदार स्मृति है; आँसू भरा वर्तमान है और भविष्य निर्माण की प्रेरणा है।" — इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • 'भारत-दुर्दशा' की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
      • 'भारत दुर्दशा' एक प्रतीकात्मक नाटक है। विश्लेषण कीजिए।
      • भारत दुर्दशा नाटक अंग्रेज़ी राज्य की अप्रत्यक्ष रूप से कटु और सच्ची आलोचना है। विश्लेषण कीजिए।
      • “‘भारत-दुर्दशा’ अतीत गौरव की चमकदार स्मृति है, आँसू भरा वर्तमान है और भविष्य-निर्माण की भव्य प्रेरणा है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
      • “भारत दुर्दशा' नाटक में व्यंग्य को एक जबरदस्त हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है।” स्पष्ट कीजिए।
      • “भारत दुर्दशा' में अपने समय की विभीषिका का चित्रण हुआ है।” स्पष्ट कीजिए।
      • 'नाटयरसक' या “लास्वरूपक' की शिल्प-विधि की दृष्टि से “भारत दुर्दशा' का तात्विक मूल्यांकन कीजिए।
      • “भारत-दुर्दशा' प्राय: कथाविहीन, घटनाविहीन नाट्य-रचना है। 'फिर भी इसके मंचन की संभावनाएँ, कम नहीं हैं।' अभिनेयता की दृष्टि से विवेचन कीजिए।
      • “भारत दुर्दशा' का इच्छित आदर्श क्या है ? समीक्षात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।
      • “भारतेन्दु के कुछ नाटकों में गदर की साहित्यिक प्रतिक्रिया प्रकट हुई है।” “भारत दुर्दशा' के विशेष संदर्भ में तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
      • “भारत-दुर्दशां' में तत्कालीन समाज का जो प्रतिबिम्बन हुआ है, वह आज कहाँ तक प्रासंगिक है ? युक्तियुक्त विवेचना कीजिए।
      • क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि भारतेन्दु युग के गद्य में जिन्दादिली मिलती है? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
      • भारत-दुर्दशा का हिन्दी नव-जागरण से क्या सम्बन्ध है? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
      • “भारत दुर्दशा” में व्यक्त भारतीय नवजागरण की चिन्ता का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • “भारत दुर्दशा’ में प्रतिबिम्बित तत्कालीन भारत की परिस्थितियों और उन्हें लेकर लेखक की चिन्ताओं का विवेचन कीजिए।
      • "भरतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'अंधेर नगरी’ में लोक-नाट्य को गहराई चेतना को बिना विस्मृत किए नवीन नांट्यशास्त्रीय गुणवत्ता का समावेश किया है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “ 'अंधेर नगरी’ समसामयिक संदर्भो का जीवन्त नाटक है, क्योंकि इसमें तत्कालीन भारत की अनेक कुरीतियों को बड़ी मार्मिकता के साथ कुरेदा गया है।” - इस कथन को पुष्टि कीजिए।
      • “अंधेरी नगरी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने व्यंग्य को प्रमुख स्थान दिया है। इस व्यंग्य के द्वारा उन्होंने वर्तमान की वास्तविकता पर प्रहार किया है।” इस कथन की सारगर्भित व्याख्या कीजिए।
      • “'अंधेर नगरी' में भारतेंदु ने लोक-नाटकों का लचीलापन, उन्मुक्तता, संगीत और वातावरण अवश्य रखा है पर उसकी रूढ़ियों का प्रयोग ज्यों का त्यों नहीं किया है।” - पर अपना मंतव्य व्यक्त कीजिए।
      • 'अंधेरी-नगरी' समसामयिक संदर्भों का जीवन नाटक है।” स्पष्ट कीजिए।
      • 'अंधेर नगरी में निहित रचनाकार की ‘कान्तदर्शिता' का अनावरण कीजिए।
      • “अन्धेर नगरी” स्वतन्त्रता, आत्मनिर्भरता, समता, स्वावलम्बन और न्याय की खोज का फल है।” इस कथन की तर्कयुक्त समीक्षा कीजिए।
      • “अंधेर नगरी” के आधार पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के युगबोध का विवेचन कीजिए।
      • नाटक के तत्वों के आधार पर 'अंधेर नगरी” की समीक्षा कीजिए।
      • ‘अंधेर नगरी’ के सामाजिक-लक्ष्य एवं नाटकीयता का युक्तियुक्त विवेचन कीजिए।
      • अन्धेर नगरी में भारतेन्दु ने अपने समय की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना और राजनीतिक पुनर्जागरण के अवरोधक तत्वों को आकार दिया है — सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
      • यथार्थ-चित्रण की दृष्टि से 'अंधेर नगरी' की समयातीत प्रासंगिकता का विवेचन कीजिए।
      • “भारतेन्दु हरिश्चन्द्र नाटक का अभिनय से अनिवार्य सम्बन्ध मानते थे।” इस कथन को ध्यान में रखते हुए अभिनय और रंगमंच की दृष्टि से ‘अंधेर नगरी' की विशेषताएँ बतलाइए।
      • ‘अंधेर नगरी’ को प्रहसन क्यों कहा जाता है? यथार्थ चित्रण और भाषा-शैली की दृष्टि से इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
      • “अंधेर नगरी' को प्रसिद्ध एवं लोकप्रियता का एक कारण इसकी उत्कृष्ट संवाद-योजना भी है। इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
      • रंगमंच की दृष्टि से “अंधेर नगरी” और “चन्द्रगुप्त” नाटकों में आप किसे श्रेष्ठ समझते हैं? युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • “अंधेर नगरी' नामक नाटक अपने यथार्थवाद के कारण आज भी प्रासंगिक है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
      • क्या नाटक का अभिनेय होना आवश्यक है? अभिनेयता और नाटकीय उत्कर्ष की दृष्टि से अंधेर नगरी और चन्द्रगुप्त की तुलना कीजिए।
    • भारतेन्दु की रचनाएँ
      • फूट, डाह, लोभ, भय, उपेक्षा, स्वार्थपरता, पक्षपात, हठ, शोक, अश्रुमार्जन और निर्बलता -- इन एक दरजन दूती और दूतों को शत्रुओं की फौज में हिला-मिलाकर ऐसा पंचामृत बनाया कि सारे शत्रु बिना मारे घंटा पर के गरुड़ हो गए।
      • भगवान् सोम की मैं कन्या हूँ। प्रथम वेदों ने मधु नाम से मुझे आदर दिया। फिर देवताओं की प्रिया होने से मैं सुरा कहलाई और मेरे प्रचार के हेतु श्रौत्रामणि यज्ञ की सृष्टि हुई। स्मृति और पुराणों में भी प्रवृत्ति मेरी नित्य कही गई। तंत्र केवल मेरी ही हेतु बने। संसार में चार मत बहुत प्रबल हैं। इन चारों में मेरी चार पवित्र प्रेम मूर्ति विराजमान हैं।
      • हा ! भारतवर्ष को ऐसी मोहनिद्रा ने घेरा है कि अब उसके उठने की आशा नहीं। सच है, जो जान बूझकर सोता है उसे कौन जगा सकेगा ? हा दैव ! तेरे विचित्र चरित्र हैं, जो कल राज करता था वह आज जूते में टांका उधार लगवाता है। कल जो हाथी पर सवार फिरते थे, आज नंगे पाँव बन-बन की धूल उड़ाते फिरते हैं।
      • हाय ! भारत को आज क्या हो गया है ? क्या निस्संदेह परमेश्वर इससे ऐसा ही रूठा है ? हाय, क्‍या अब भारत के फिर वे दिन न आवेंगे ? हाय, यह वही भारत है, जो किसी समय सारी पृथ्वी का शिरोमणि गिना जाता था।
      • “महाराज, वेदान्त ने बड़ा ही उपकार किया। सब हिन्दू ब्रह्म हो गये। किसी की इतिकर्त्तव्यता बाकी ही न रही। ज्ञानी बनकर ईश्वर से विमुख हुए, रुक्ष हुए, अभिमानी हुए और इसी से स्नेहशून्य हो गए। जब स्नेह ही नहीं तब देशोद्धार का प्रयत्न कहाँ!”
      • वेदान्त ने बड़ा ही उपकार किया। सब हिन्दू ब्रह्म हो गए। किसी को इतिकर्त्तव्यता बाकी ही न रही। ज्ञानी बनकर ईश्वर से विमुख हुए, रूक्ष हुए, अभिमानी हुए, और इसी से स्नेहशून्य हो गए। जब स्नेह ही नहीं तब देशोद्धार का प्रयत्न कहाँ!
      • महाराज वेदान्त ने बडा ही ऊपकार किया। सब हिन्दू ब्रह्मा हो गए। महाराज, वेदांत ने बड़ा ही उपकार किया। सब हिंदू ⁠⁠ब्रह्म हो गए। किसी को इतिकर्त्तव्यता बाकी हो न ⁠⁠रही। ज्ञानी बनकर ईश्वर से विमुख हुए, रुक्ष हुए, ⁠⁠अभिमानी हुए और इसी से स्नेहशून्य हो गए। जब ⁠⁠स्नेह ही नहीं तब देशोद्धार का प्रयत्न कहाँ? बस, जय ⁠⁠शंकर की।।
      • गुरु जी, ऐसा तो संसार भर में कोई देस ही नहीं है। दो पैसा पास रहने ही से मज़े से पेट भरता है। मैं तो इस नगर को छोड़कर नहीं जाऊँगा। और जगह दिन भर माँगो तो भी पेट नहीं भरता। वरंच बाजे-बाजे दिन उपास करना पड़ता है। सो में तो यहीं रहूँगा।।
    • मोहन राकेश
      • ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक के आधार पर लेखक के नारी संबंधी दृष्टिकोण पर प्रकाश डालिए।
      • 'आषाढ़ का एक दिन' के आधार पर मोहन राकेश की नाट्य-कला की समीक्षा कीजिए।
      • ‘आषाढ़ का एक दिन’ की नाट्य-वस्तु में मंचन-क्षमता की सुरक्षा, भावना और यथार्थ का सामंजस्य, जीवन की कटुता और असफलता का निरूपण पाया जाता है। इसे स्पष्ट कीजिए।
      • “ ‘आषाढ़ का एक दिन’ की मल्लिका स्वाधीन चेता स्त्री के जीवन के स्वाभिमान और विडंबना को चरितार्थ करती है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “मल्लिका की अनन्यता एवं सात्विक प्रेम “आषाढ़ का एक दिन' की महती उपलब्धि है। उसके चरित्र में भारतीय आदर्श ललना साकार हो उठी है।” इस कथन की तर्कसंगत मीमांसा कीजिए।
      • “‘आषाढ़ का एक दिन' का कालिदास दुर्बल नहीं है; कोमल, अस्थिर और अंतर्द्वंद्व से पीड़ित है।” इस कथन की सप्रमाण संपुष्टि कीजिए।
      • “रंगमंच की दृष्टि से 'आषाढ़ का एक दिन' की विवेचना कीजिए।
      • “आषाढ़ का एक दिन” नाटक के त्रासदीय तत्त्वों का समीक्षात्मक विश्लेषण कीजिए।
      • रंगमंचीय सम्भावनाओं की दृष्टि से किए गए एक प्रयोग के रूप में “आषाढ़ का एक दिन' नाटक पर विचार कीजिए।
      • आधुनिक मनुष्य की त्रासदी को मोहन राकेश कालिदास, मल्लिका एवं विलोम के माध्यम से किस हद तक व्यक्त कर पाए हैं? विचार कीजिए।
      • नाटकीय तत्त्वों के आलोक में 'आषाढ़ का एक दिन” आपको किन-किन बिन्दुओं पर आकृष्ट करता है? तर्कपुष्ट ढंग से अपना अभिमत प्रकट कीजिए।
      • 'आषाढ़ का एक दिन' शीर्षक की सार्थकता पर विचार करते हुए उसकी आधुनिक प्रासंगिकता की समीक्षा कीजिए।
    • मोहन राकेश की रचनाएँ
      • मैं जीवन में पहली बार समझ पाई कि क्यों कोई पर्वत-शिखरों को सहलाती मेघ-मालाओं में खो जाता है, क्यों किसी को अपने तन-मन की अपेक्षा आकाश में बनते-मिटते चित्रों का इतना मोह हो रहता है।
      • "वह बहुत अद्भुत अनुभव था माँ, बहुत अद्भुत! नीलकमल की तरह कोमल और आर्द्र, वायु की तरह हल्का और स्वप्न की तरह चित्रमय! मैं चाहती थी उसे अपने में भर लूँ और आँखें मूंद लूँ।"
      • "राजनीति साहित्य नहीं है। उसमें एक-एक क्षण का महत्त्व है। कभी एक क्षण भी स्खलित हो जाए, तो बड़ा अनिष्ट हो सकता है। राजनीतिक जीवन की धुरी में बने रहने के लिए व्यक्ति को बहुत जागरूक रहना पड़ता है।"
      • "अब भी उत्साह का अनुभव नहीं होता .... ? विश्वास करो तुम यहाँ से जाकर भी यहाँ से अलग नहीं होओगे। यहाँ की वायु, यहाँ के मेघ और यहाँ के हरिण, इन सबको तुम साथ ले जाओगे ....। और मैं भी तुम से दूर नहीं होऊँगी। जब भी तुम्हारे निकट होना चाहूँगी, पर्वत-शिखर पर चली जाऊँगी और उड़कर आते मेघों में घिर जाया करूँगी।"
      • "सौन्दर्य का ऐसा साक्षात्कार मैंने कभी नहीं किया। जैसे वह सौन्दर्य अस्पृश्य होते हुए भी मांसल हो। तभी मुझे अनुभव हुआ कि वह क्या है, जो भावना को कविता का रूप देता है। मैं जीवन में पहली बार समझ पायी कि क्यों कोई पर्वत-शिखरों को सहलाती हुई मेघ-मालाओं में खो जाता है, क्यों किसी को अपने तन-मन की अपेक्षा आकाश से बनते-मिटते चित्रों का ईतना मोह हो रहता है।"
      • "मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रांतर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि के साथ जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली, हरिणों के बच्चे, पशुपाल हैं। ... यहाँ से जाकर मैं अपनी भूमि से उखड़ जाऊँगा।"
      • "मैं मानती हूँ माँ, अपवाद होता है। तुम्हारे दुःख की बात भी जानती हूँ। फिर भी मुझे अपराध का अनुभव नहीं होता। मैंने भावना में एक भावना का वरण किया है। मेरे लिए यह संबंध और सब संबंधों से बड़ा है। मैं वास्तव में अपनी भावना से प्रेम करती हूँ जो पवित्र है, कोमल है, अनश्वर है ...।।"
      • "यह मेरे अभाव की संतान है। जो भाव तुम थे, वह दूसरा नहीं हो सका, परंतु अभाव के कोष्ठ में किसी दूसरे की जाने कितनी-कितनी आकृतियाँ हैं ! जानते हो मैंने अपना नाम खोक़र एक विशेषण उपार्जित किया है और अब मैं अपनी दृष्टि में नाम नहीं, केवल विशेषण हूँ।"
      • "सौन्दर्य का ऐसा साक्षात्कार मैंने कभी नहीं किया। जैसे वह सौन्दर्य अस्पृश्य होते हुए भी मांसल हो। मुझे अनुभव हुआ कि वह क्या है, जो भावना को कविता का रूप देता है। क्यों कोई पर्वत-शिखरों को सहलाती हुई मेघमालाओं में खो जाता है !"
      • "तुमने लिखा था कि एक दोष गुणों के समूह में उसी प्रकार छिप जाता है जैसे इन्दु की किरणों में कलंक; परन्तु दारिद्रय नहीं छिपता, सौ-सौ गुणों में भी नहीं छिपता। नहीं, छिपता ही नहीं, सौ-सौ गुणों को छा लेता है-एक-एक करके नष्ट कर देता है।"
      • "प्रेक्षकों पर सम्प्रेषणगत प्रभाव की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद और मोहन राकेश के नाटकों का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।"
      • "मैं ऐसे व्यक्ति को अच्छी तरह समझती हूँ। तुम्हारे साथ उसका इतना ही सम्बन्ध है कि तुम एक उपादान हो, जिसके आश्रय से वह अपने से प्रेम कर सकता है, अपने पर गर्व कर सकता है। परन्तु तुम क्या सजीव व्यक्ति नहीं हो? तुम्हारे प्रति उसका या तुम्हारा कोई कर्तव्य नहीं है? कल तुम्हारी माँ का शरीर नहीं रहेगा, और घर में एक समय के भोजन की व्यवस्था भी नहीं होगी, तो जो प्रश्‍न तुम्हारे सामने उपस्थित होगा, उसका तुम क्या उत्तर दोगी? तुम्हारी भावना उस प्रश्‍न का समाधान कर देगी?"
      • "..... तुम्हारे दुःख की बात भी जानती हूँ। फिर भी मुझे अपराध का अनुभव नहीं होता। मैंने भावना में एक भावना का वरण किया हे। मेरे लिए वह संबंध और सब संबंधों से बड़ा है। मैं वास्तव में अपनी भावना से प्रेम करती हूँ जो पवित्र है, कोमल है, अनश्वर है।...."
      • "नील कमल की तरह कोमल और आर्द्र, वायु की तरह हल्का और स्वप्न की तरह चित्रमय मैं चाहती थी उसे अपने में भर लूँ और आँखें मूँद लूँ। मेरा तों शरीर भी निचुड़ रहा है माँ ! कितना पानी इन वस्त्रों ने पिया है! ओह ! शीत की चुभन के बाद उष्णता का यह स्पर्श !" (‘आषाढ़ का एक दिन’ मोहन राकेश, पृष्ठ 8)
    • रामचंद्र शुक्ल
      • "‘कविता क्या है’ निबंध काव्य के सर्वांगपूर्ण विवेचन की दृष्टि से अद्वितीय बन पड़ा है" — इस कथन की सत्यता पर प्रकाश डालिए ।
      • 'श्रद्धा और भक्ति' निबंध के आधार पर रामचन्द्र शुक्ल की गद्य-शैली की समीक्षा कीजिए।
      • 'श्रद्धा-भक्ति' निबंध के आधार पर प्रेम, श्रद्धा एवं भक्ति का अंत-संबंध स्पष्ट कीजिए।
      • 'कविता क्या है” निबंध के आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य विषयक विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • “रामचंद्र शुक्ल के निबंधों में बुद्धितत्व और हृदय की अनुभूति का सुंदर समन्वय हुआ है।” — इस कथन की विवेचना कीजिए।
      • “कविता क्या है' निबंध के आधार पर कविता के संबंध में निबंधकार के विचारों का विवेचन कीजिए।
      • ‘श्रद्धा और भक्ति' के अंतर को स्पष्ट करते हुए आचार्य शुक्ल के निबंधों की विशेषता बताइये।
      • आचार्य शुक्ल के निबंधों की विभिन्न कोटियों का परिचय देते हुए मनोभावों से संबंधित निबंधों का वैशिष्ट्य प्रतिपादित कीजिए।
      • “कविता क्या है” निबंध के आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की “कविता की भाषा” विषयक मान्यताओं पर प्रकाश डालिए।
      • 'कविता क्या है' के आधार पर रामचंद्र शुक्ल की कविता संबंधी मूलभूत दृष्टि और उसकी सार्थकता पर विचार कीजिए।
      • श्रद्धा और भक्ति के सामाजिक उपयोग एवं दुरुपयोग पर विचार कीजिए।
      • शुक्लजी के मनोविकार सम्बन्धी निबंधों पर उनकी रसदृष्टि का प्रभाव है — इस विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
      • ‘कविता क्या है’ निबंध के आधार पर सभ्यता के विकास और कविकर्म का दन्द्वात्मक सम्बन्ध निरूपित कीजिए।
      • शिल्प एवं विषय की दृष्टि से स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी पर प्रकाश डालिए।
      • 'चिंतामणि', भाग-एक के निबंधों के आधार पर रामचन्द्र शुक्ल की निबंध-कला की प्रमुख विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
      • भाव या मनोविकार क्या हैं? रामचन्द्र शुक्ल ने उनका वर्गीकरण किस रूप में किया है? 'चिन्तामणि' में संगृहीत भाव या मनोविकार से सम्बन्धित निबंधों की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
      • “निबंध-लेखन में आचार्य शुक्ल ने एक साहित्यकार के रूप में ही भावों अथवा मनोविकारों पर विचार किया है, मनोवैज्ञानिक के रूप में नहीं।” — इस कथन के विषय में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
      • “आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंधों में भावों की भव्यता है, अभिव्यंजना प्रणाली की नव्यता है, विचारों की तीव्रता है, संस्कृति की सशक्त अभिव्यक्ति है और संतुलन की आमोद शक्ति है।” — इस कथन का संपरीक्षण कीजिए।
      • निबंध "उन्मुक्त चिंतन है”, "मन की मुक्त भटकन है” – जैसी अवधारणा को शुक्लजी के निबंध प्रमाणित करते हैं या अप्रमाणित? — सोपपत्ति अपना मंतव्य प्रस्तुत कीजिए।
      • आचार्य शुक्ल के निबंधों में व्यक्तित्व-व्यंजक उपकरणों पर प्रकाश डालिए।
      • शुक्लजी के मनोविकारपरक निबंधों में निहित उनकी विचारधारा का ब्योरेवार उपस्थापन कीजिए।
      • “आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उच्चकोटि के विचारात्मक निबंधों की रचना की है, जिनमें चिन्तन की मौलिकता, विवेचन की गम्भीरता, विश्लेषण की सूक्ष्मता एवं शैली की प्रौढ़ता दृष्टिगोचर होती है।” “चिंतामणि” के निबंधों के आधार पर इसकी सोदाहरण पुष्टि कीजिए।
      • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंधों को आप विषय प्रधान मानते हैं या व्यक्ति प्रधान? ‘चिंतामणि भाग-I’ के पठित निबंधों के आधार पर अपने मत का तर्कसम्मत प्रतिपादन कीजिए।
      • निबंधकार के रूप में शुक्लजी की आलोचना करते हुए हिन्दी निबंध के क्षेत्र में उनका स्थान निर्धारित कीजिए।
      • शुक्लजी के मनोविकार सम्बन्धी निबंधों को मनोवैज्ञानिक कहना समीचीन होगा या साहित्यिक? युक्तिपूर्वक अपने मत की पुष्टि कीजिए।
      • आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मनोविचार संबंधी निबंधों की विशेषताएँ बताते हुए ‘करुणा’ शीर्षक निबंध की विवेचना कीजिए।
      • निबंधकार के रूप में ‘श्रद्धा-भक्ति’ या ‘लोभ और प्रीति’ के आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मूल्यांकन कीजिए।
      • ‘चिन्तामणि’ के निबंधों को आचार्य शुक्ल ने अपनी “अंतर्यात्रा में पड़ने वाले कुछ प्रदेश” कहा है, जिनमें यात्रा के लिए बुद्धि हृदय को साथ लेकर निकलती रही है। इस कथन के प्रकाश में उनके किसी एक निबंध का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • निबंध-कला की दृष्टि से रामचन्द्र शुक्ल के ‘लज्जा और ग्लानि’ अथवा ‘लोभ और प्रीति’ शीर्षक निबंध की विवेचना कीजिए।
      • ‘चिन्तामणि’ में संकलित रामचन्द्र शुक्ल के निबंध विषय-प्रधान हैं या व्यक्ति-प्रधान हैं? निर्धारित निबंधों के आधार पर युक्तियुक्त विवेचन कीजिए।
      • रामचन्द्र शुक्ल के निबंधों को सामने रखकर स्वयं उन्हीं के इस कथन की समीक्षा कीजिए कि “यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसोटी है तो निबंध-गद्य की कसौटी है।”
      • “शुक्ल जी निबंध में विषय की गम्भीरता को अन्तर्भेदी दृष्टि से देखते हैं; साथ ही उनमें गंभीर मर्यादित आत्म-व्यंजना भी है।” इस संदर्भ को ध्यान में रखकर शुक्ल जी के विचारात्मक निबंधों की समीक्षा कीजिए।
      • “इस पुस्तक में मेरी अंतर्यात्रा में पड़ने वाले कुछ प्रदेश हैं। यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि, पर हृदय को भी साथ लेकर।” — लेखक के इस कथन के परिप्रेक्ष्य में ‘चिन्तामणि’ के निबंधों की आलोचना कीजिए।
      • “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है... तब हृदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए।” — इस विचार की समीक्षा कीजिए।
      • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंधों का वर्गीकरण करते हुए उनकी निबंध शैली की विशेषताएँ निरूपित कीजिए।
    • रामचंद्र शुक्ल की रचनाएँ
      • कविता ही हृदय को प्रकृत दशा में लाती है और जगत के बीच क्रमशः उसका अधिकाधिक प्रसार करती हुई उसे मनुष्यत्व की उच्च भूमि पर ले जाती है।
      • "जब कभी वह अपनी पृथक् सत्ता की धारणा से छुटकर—अपने आपको बिल्कुल भूलकर—विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, इसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है।"
      • "यदि प्रेम स्वप्न है, तो श्रद्धा जागरण है। प्रेम प्रिय को अपने लिए और अपने को प्रिय के लिए संसार से अलग करना चाहता है। प्रेम में केवल दो पक्ष होते हैं और श्रद्धा में तीन। प्रेम में कोई मध्यस्थ नहीं पर श्रद्धा में मध्यस्थ अपेक्षित है।"
      • "मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य-असभ्य सभी जातियों में, किसी न किसी रूप में पायी जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता का प्रचार अवश्य रहेगा। बात यह है कि मनुष्य अपने ही व्यापारों का ऐसा सघन और जटिल मंडल बाँधता चला आ रहा है। जिसके भीतर बंध-बंध वह शेष सृष्टि के साथ अपने हृदय का संबंध भूला-सा रहता है।"
      • "श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। जब पूज्य भाव की वृद्धि के साथ श्रद्धा भाजन के सामीप्य-लाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो, तब हृदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए।"
      • "ज्यों-ज्यों सभ्यता बढ़ती जायेगी त्यों-त्यों कवियों के लिए यह काम बढ़ता जायेगा। इससे यह स्पष्ट है कि ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण चढ़ते जायेंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जायेगी, दूसरी ओर कवि-कर्म कठिन होता जायेगा।"
      • "कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक सामान्य भूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत्‌ की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है, इस भूमि पर पहुँचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता। वह अपनी सत्ता को लोक-सत्ता में लीन किए रहता है। उसकी अनुभूति सबकी अनुभूति होती है या हो सकती है।"
      • "बुद्धि की क्रिया से हमारा ज्ञान जिस अद्वैत भूमि पर पहुँचता पहुँचता है, उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय भी इस सत्त्व-रस के प्रभाव से पहुँचता है। इस प्रकार अंत में जाकर दोनों पक्षों की का समन्वय हो जाता है। इस समन्वय के बिना मनुष्यत्व की साधना पूरी नहीं हो सकती।"
      • "मनुष्य सारी पृथ्वी छेंकता चला जा रहा है। जंगल कट-कट कर खेत, गाँव और नगर बनते चले जा रहे हैं। 'पशु-पक्षियों का भाग छिनता चला जा रहा है। उनके सब ठिकानों पर हमारा निष्ठुर अधिकार होता चला जा रहा है। वे कहाँ जायँ।... "
      • "जिस सौंदर्य की भावना में मग्न होकर मनुष्य अपनी पृथक सत्ता का विसर्जन करता है वह अवश्य एक दिव्य विभूति है। भक्त लोग अपनी उपासना या ध्यान में इसी विभूति का अवलंबन करते हैं।"
      • "भक्ति संबंधहीन सिद्धान्तमार्ग निश्चयात्मिका बुद्धि को चाहे व्यक्त हों, पर प्रवर्तक मन को अव्यक्त रहते हैं। वे मनोरंजनकारी तभी लगते हैं, जब किसी व्यक्ति के, जीवन-क्रम के रूप में देखे जाते हैं। शील की विभूतियाँ अनन्त रूपों में दिखाई पड़ती हैं। जब इन रूपों पर मनुष्य मोहित होता, है, तब सात्विक शील की ओर ओप से आप आकर्षित होता है।"
      • "रूप को भावना का बहुत कुछ सम्बन्ध व्यक्तिगत रुचि से होता है। अतः किसी के रूप और हमारे बीच यदि तीसरा व्यक्ति आया तो इस व्यापार में सामाजिकता आ गई; क्योंकि हमें उस समय यह ध्यान हुआ कि उस रूप से एक तीसरे व्यक्ति को आनन्द या सुख मिला और हमें भी मिल सकता है। जब तक हम किसी के रूप का बखान सुनकर 'वाह-वाह' करते जायेंगे तब तक हम एक प्रकार के लोभी अथवा रीझने वाले या कद्रदान ही कहलाएंगे, पर जब हम उसके दर्शन के लिए आकुल होंगे, उसे बराबर अपने पास रखना चाहेंगे; तब प्रेम का सूत्रपात समझा जाएगा।"
      • "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं। इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग के समकक्ष मानते हैं।"
      • "प्रिय का चिंतन हम आँख मूँदे हुए, संसार को भुलाकर करते हैं, पर श्रद्धेय का चिंतन हम आँख खोले हुए, संसार का कुछ अंश सामने रख कर करते हैं। यदि प्रेम स्वप्न है तो श्रद्धा जागरण है। प्रेम प्रिय को अपने लिए और अपने को प्रिय के लिए संसार से अलग करना चाहता है। प्रेम में केवल दो पक्ष होते हैं, श्रद्धा में तीन। प्रेम में कोई मध्यस्थ नहीं, पर श्रद्धा में मध्यस्थ अपेक्षित है।"
      • "इन रूपों और व्यापारों के सामने जब कभी वह अपनी पृथक सत्ता को धारणा से छूटकर—अपने आपको बिल्कुल भूलकर—विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त-हृदय हो जाता है। जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हदय की इसी मुक्ति की साधना को मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं। इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं।"
      • "कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-सम्बन्धों के संकुचित मण्डल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है, जहां जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है। इस भूमि पर पहुंचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता। वह अपनी सत्ता को लोकसत्ता में लीन किए रहता है।"
      • "केवल असाधारणत्व की रुचि सच्ची सहदयता की पहचान नहीं है। शोभा और सौंदर्य की भावना के साथ जिनमें मनुष्य-जाति के उस समय के पुराने सहचरों की वंशपरंपरागत स्मृति वासना के रूप में बनी हुई है; जब वह प्रकृति के खुले क्षेत्र में विचरती थी, वे ही पूरे सहृदय या भावुक कहे जा सकते हैं।"
      • "कवि की दृष्टि तो सौन्दर्य की ओर जाती है, चाहे वह जहाँ हो—वस्तुओं के रूप-रंग में अथवा मनुष्यों के मन, वचन और कर्म में। उत्कर्ष-साधन के लिए, प्रभाव की वृद्धि के लिए, कवि लोग कई प्रकार के सौन्दर्यों का मेल भी किया करते हैं।"
      • “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्तावस्था के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।” साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं।
      • अत्याचारी से पीड़ित होकर मनुष्य उसके कोप का आह्वान करता है, आपद्ग्रस्त होकर उसकी दया का भिखारी होता है, सुख से सम्पन्न होकर उसके धन्यवाद के लिए हाथ उठाता है, भक्ति से पूर्ण होकर उसके आश्रय की वांछा करता है।
      • जिस व्यक्ति से किसी की घनिष्ठता और प्रीति होती है वह उसके जीवन के बहुत से व्यापारों तथा मनोवृत्तियों का आधार होता है। उसके जीवन का बहुत-सा अंश उसी के संबंध द्वारा व्यक्त होता है। मनुष्य अपने लिए संसार आप बनाता है, संसार तो कहने-सुनने के लिए है, वास्तव में किसी मनुष्य का संसार तो वे ही लोग हैं जिनसे उसका संसर्ग या व्यवहार है। अतः ऐसे लोगों में किसी का दूर होना उसके संसार के एक प्रधान अंश का कट जाना या जीवन के एक अंग का खण्डित हो जाना है।
      • कर्म में आनंद अनुभव करनेवालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनंद भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फल-स्वरूप लगते हैं। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है वही लोकोपकारी कर्म-वीर का सच्चा सुख है। उसके लिए सुख तब तक के लिए रुका नहीं रहता, जब तक कि फल प्राप्त न हो जाए; बल्कि उसी समय से थोड़ा-थोड़ा करके मिलने लगता है, जब से वह कर्म की ओर हाथ बढ़ाता है।
      • श्रद्धावान‌ अपनी श्रद्धा द्वारा श्रद्धेय में कोई ऐसा परिवर्तन उपस्थित नहीं किया चाहता जिसका अपने लिए कोई अनुकूल फल हो। श्रद्धावान‌ श्रद्धेय को प्रसन्न करने की इच्छा कर सकता है, पर उस प्रसन्नता से आप कोई लाभ उठाने की नहीं।
      • बाहरी प्रतिबंधों से ही हमारा पूरा शासन नहीं हो सकता — उन सब बातों की रुकावट नहीं हो सकती जिन्हें हमें न करना चाहिए। प्रतिबंध हमारे अंत:करण में होना चाहिए। यह आभ्यंतर प्रतिबंध दो प्रकार का हो सकता है — एक विवेचनात्मक जो प्रयत्नसाध्य होता है, दूसरा मनप्रवृत्यात्मक जो स्वभावज होता है। बुद्धि द्वारा प्रवृत्ति जबरदस्ती रोकी जाती है, पर लज्जा, संकोच आदि की अवस्था में प्राप्त होकर प्रवर्तक मन आप से आप रुकता है, चेष्टाएँ आप से आप शिथिल पड़ जाती हैं।
      • मनुष्य की सजीवता मनोवेग या प्रवृत्ति में, भावों की तत्परता में है। नीतिज्ञों और धार्मिकों का मनोविकारों को दूर करने का उपदेश घोर पाषंड है। इस विषय में कवियों का प्रयत्न ही सच्चा है जो मनोविकारों पर सान ही नहीं चढ़ाते बल्कि उन्हें परिमार्जित करते हुए सृष्टि के पदार्थों के साथ उनके उपयुक्त संबंध निर्वाह पर ज़ोर देते हैं। यदि मनोवेग न हों तो स्मृति, अनुमान, बुद्धि आदि के रहते भी मनुष्य बिल्कुल जड़ है। प्रचलित सभ्यता और जीवन की कठिनता से मनुष्य अपने इन मनोवेगों को मारने और अशक्त करने पर विवश होता जाता है।
      • कर्मों से कर्ता की स्थिति को जो मनोहरता प्राप्त हो जाती है, उस पर मुग्ध होकर बहुत-से प्राणी उन कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं। कर्ता अपने सत्कर्म द्वारा एक विस्तृत क्षेत्र में मनुष्य की सद्वृत्तियों के आकर्षण का एक शक्ति-केंद्र हो जाता है। जिस समाज में किसी ऐसे ज्योतिष्मान शक्ति-केंद्र का उदय होता है, उस समाज में भिन्न-भिन्न हृदयों से शुभ भावनाएँ मेघ-खण्डों के समान उठकर परस्पर मिलकर इतनी घनी हो जाती हैं कि उनकी घटा-सी उमड़ पड़ती है और मंगल की ऐसी वर्षा होती है कि सारे दुःख और क्लेश बह जाते हैं।
      • जिस बात में कुछ लगे वह उनके काम की नहीं चाहे वह कष्ट निवारण हो या सुख-प्राप्ति, धर्म हो या न्याय। वे शरीर सुखाते हैं, अच्छे भोजन, अच्छे वस्त्र आदि की आकांक्षा नहीं करते। लोभ के अंकुश से अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में रखते हैं। लोभियों! तुम्हारा अक्रोध, तुम्हारा इन्द्रिय-निग्रह, तुम्हारा मानापमान-समता, तुम्हारा तप अनुकरणीय है। तुम्हारी निष्ठुरता, तुम्हारी निर्लज्जता, तुम्हारा अविवेक, तुम्हारा अन्याय विग्रहणीय है। तुम धन्य हो! तुम्हें धिक्कार है!
      • प्रचलित सभ्यता और जीवन की कठिनता से मनुष्य अपने इन मनोवेगों को मारने और अशक्त करने पर विवश होता है, इनका पूर्ण और सच्चा निर्वाह उसके लिए कठिन होता जाता है, और इस प्रकार उसके जीवन का स्वाद निकल जाता है। वन, नदी, पर्वत आदि को देखकर आनंदित होने के लिए अब उसके हृदय में उतनी जगह नहीं। दुराचार पर उसे क्रोध या घृणा होती है, पर झूठे शिष्टाचार के अनुसार उसे दुराचारी की भी मुँह पर प्रशंसा करनी पड़ती है।
      • यदि कहीं पाप है, अन्याय है, अत्याचार है तो उनका आशु फल उत्पन्न करना और संसार के समक्ष रखना लोक-रक्षा का कार्य है। अपने ऊपर किए जानेवाले अत्याचार और अन्याय का फल ईश्वर के ऊपर छोड़ना व्यक्तिगत आत्मोन्नति के लिए चाहे श्रेष्ठ हो; पर यदि अन्यायी या अत्याचारी अपना हाथ नहीं खींचता है, तो लोक-संग्रह की दृष्टि से वह उसी प्रकार आलस्य या कायरपन है जिस प्रकार अपने ऊपर किए हुए उपकार को कुछ भी बदला न देना कृतघ्नता है।
      • दण्ड कोप का ही एक विधान है। राजदण्ड राजकोप है, जहाँ कोप लोककोप और लोककोप धर्मकोप है। राजकोप धर्मकोप से राज्य-एकदम भिन्न दिखाई पड़े, वहाँ उसे राजकोप न समझकर कुछ विशेष मनुष्यों का कोप समझना चाहिए। ऐसा कोप राजकोप के महत्त्व और पवित्रता का अधिकारी नहीं हो सकता। उसका सम्मान जनता अपने लिए आवश्यक नहीं समझ सकती।
      • कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है। धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनन्द भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फल-स्वरूप लगते हैं। अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है वही लोकोपकारी कर्म-वीर का सच्चा सुख है।
      • मनुष्य की प्रकृति में शील और सात्विकता का आदि संस्थापक यही मनोविकार है। मनुष्य की सज्जनता या दुर्जनता अन्य प्राणियों के साथ उसके सम्बन्ध या संसर्ग द्वारा ही व्यक्त होती है। यदि कोई मनुष्य जन्म से ही किसी निर्जन स्थान में अपना निर्वाह करे तो उसका कोई कर्म सज्जनता या दुर्जनता की कोटि में न आएगा। उसके सब कर्म निर्लिप्त होंगे। संसार में प्रत्येक प्राणी के जीवन का उद्देश्य दुःख की निवृत्ति और सुख की प्राप्ति है।
      • अप्रेष्य मनोविकार जिसके प्रति उत्पन्न होते हैं, उसके हृदय में यदि करेंगे तो सदा दूसरे भावों की सृष्टि करेंगे। इनके अन्तर्गत भय, दया, ईर्ष्या आदि हैं। जिससे हम भय करेंगे वह हमसे हमारे भय के प्रभाव से भय नहीं करेगा बल्कि हम पर दया करेगा। जिस पर हम दया करेंगे वह हमारी दया के कारण हम पर दया नहीं करेगा बल्कि श्रद्धा करेगा। जिससे हम ईर्ष्या करेंगे वह हमारी ईर्ष्या को देख हमसे ईर्ष्या नहीं करेगा बल्कि घृणा करेगा।
      • शासन की पहुँच प्रवृत्ति और निवृत्ति की बाहरी व्यवस्था तक ही होती है। उनके मूल या मर्म तक उनकी गति नहीं होती। भीतरी या सच्ची प्रवृत्ति-निवृत्ति को जागरित रखनेवाली शक्ति कविता है जो धर्मक्षेत्र में शक्ति भावना को जगाती रहती है। भक्ति धर्म की रसात्मक अनुभूति है। अपने मंगल और लोक के मंगल का संगम उसी के भीतर दिखाई पड़ता है। इस संगम के लिए प्रकृति के क्षेत्र के बीच मनुष्य को अपने हृदय के प्रसार का अभ्यास करना चाहिए।
      • यदि कहीं पाप है, अन्याय है, अत्याचार है तो उनका आशु फल उत्पन्न करना और संसार के समक्ष रखना, लोक-रक्षा का कार्य है। अपने ऊपर किए जानेवाले अत्याचार और अन्याय का फल ईश्वर के ऊपर छोड़ना व्यक्तिगत आत्मोन्नति के लिए चाहे श्रेष्ठ हो; पर यदि अन्यायी या अत्याचारी अपना हाथ नहीं खींचता है, तो लोक-संग्रह की दृष्टि से वह उसी प्रकार आलस्य या कायरपन है, जिस प्रकार अपने ऊपर किए हुए उपकार को कुछ भी बदला न देना कृतघ्नता है।
      • ‘चिन्तामणि’ के निम्नलिखित वाक्यों का भाव-विस्तारण कीजिए: (क) “श्रद्धा महत्त्व की आनन्दपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है।” (ख) “करुणा अपने बीज अपने आलम्बन या पात्र में नहीं फेंकती है।” (ग) “ईर्ष्या एक संकर भाव है जिसकी संप्राप्ति आलस्य, अभिमान और नैराश्य के योग से होती है।”
      • प्रेम का दूसरा स्वरूप वह है जो अपना मधुर और अनुरंजनकारी प्रकाश जीवन-यात्रा के नाना पंथों पर फेंकता है। प्रेमी जगत के बीच अपने अस्तित्व की रमणीयता का अनुभव आप भी करता है और अपने प्रिय को भी कराना चाहता है। प्रेम के दिव्य प्रभाव से उसे अपने आस-पास चारों ओर सौंदर्य की आभा फैली दिखाई पड़ती है, जिसके बीच वह बड़े उत्साह और प्रफुल्लता के साथ अपना कम-सौंदर्य प्रदर्शित करता है।
      • लोभियों का दमन योगियों के दमन से किसी प्रकार कम नहीं होता। लोभ के बल से वे, काम और क्रोध को जीतते हैं, सुख की वासना का त्याग करते हैं, मान-अपमान में समान भाव रखते हैं। अब और चाहिए क्या? ... लोभियो! तुम्हारा अक्रोध, तुम्हारा इंद्रिय निग्रह, तुम्हारा मानापमान समता, तुम्हारा तप अनुकरणीय है, तुम्हारी निष्ठुरता, तुम्हारी निर्लज्जता, तुम्हारा अविवेक, तुम्हारा अन्याय विगर्हणीय है। तुम धन्य हो! तुम्हें धिक्कार है।
      • मनुष्य का मनुष्य के साथ जितना गूढ़, जटिल और व्यापक सम्बन्ध हो सकता है, उतना वस्तु के साथ नहीं। वस्तु-लोभ के आश्रय और आलम्बन, इन दो पक्षों में भिन्न-भिन्न कोटि की सताएँ रहती हैं; पर प्रेम एक ही कोटि की दो सताओं का योग है, इससे वह कहीं अधिक गूढ़ और पूर्ण होता है।
      • बात यह है कि लोभ का प्रथम अवयव सुखात्मक होने के कारण लोभी विषय की ओर बराबर प्रवृत्त रहता है। धन का लोभी धन पाकर लोभ से निवृत्त नहीं हो जाता; या तो भले-बुरे का सब विचार छोड़ उसकी रक्षा में तत्पर दिखाई देता है या और अधिक प्राप्ति में। इस प्रकार लोभ से अन्य मुख्य वृत्तियों का जो स्तम्भन होता है, वह स्वभावान्तरगत हो जाता है।
    • निबंध निलय
      • ‘तुलसी साहित्य के सामंत विरोधी मूल्य’ निबंध के आधार पर डॉ. रामविलास शर्मा की तुलसी-विषयक मान्यताओं की समीक्षा कीजिए।
      • काले साँप का काटा आदमी बच सकता है, हलाहल जहर पीने वाले की मौत रुक सकती है, किन्तु जिस पौधे को एक बार कर्मनाशा का पानी छू ले, वह फिर हरा नहीं हो सकता।
      • “मेरे राम का मुकुट भीग रहा है” निबंध की ललित निबंध के रूप में तात्विक समीक्षा कीजिए।
      • 'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है' निबंध की तात्विक समीक्षा कीजिए।
      • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबंध ‘कुटज' का तात्विक विवेचन कीजिए।
      • “आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में तर्क और विचार के साथ भाव प्रवणता भी है।” — इस कथन की सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
      • हिन्दी निबंध साहित्य का विषयमत वैविध्य भारतीय संस्कृति की बहुविध विशेषताओं को कैसे शब्दबद्ध कर रहा है? विवेचन कीजिए।
      • कुबेरनाथ राय के ललित निबंधों की भावात्मक और विचारात्मक पृष्ठभूमि का परिचय दीजिए।
      • द्विवेदीयुगीन निबंधों में भाषा-संस्कार, रुचि-परिमार्जन, वैचारिक परिपक्वता और विषय-विविधता के कारण आए परिवर्तनों को उदाहरणों सहित रेखांकित कीजिए।
      • हजारीप्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों में वैचारिकता किस भाँति अनुस्यूत रहती है? इस संबंध में युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • बालकृष्ण भट्ट और गुलाब राय के निबंधों की भाषा-शैली की विशेषताओं पर तुलनात्मक दृष्टि से विचार कीजिए।
      • जिस तरह से अपने ललित निबंधों में कुबेरनाथ राय भारत ही नहीं, विश्व-भर के नये-पुराने रूपों को हृदय और बुद्धि की कसौटी पर जाँचते हैं, निबंध-क्षेत्र के लिए यह नया बौद्धिक रस संजीवनी बना है—इसका विवेचन कीजिए।
      • ललित निबंधों में वैचारिक पक्ष किस तरह लालित्य में घुलमिल जाता है? समीक्षा कीजिए।
      • भारतेंदुयुगीन निबंधों की वैचारिकता कितनी गहन और गंभीर रही है? विचार कीजिए।
      • 'बालकृष्ण भट्ट 'हँसमुख गद्य के प्रणेता हैं। — सोदाहरण समझाइए।
      • कुबेरनाथ राय के निबंधों में लालित्य का अनुपात ज्यादा है या वैदुष्य का? विचार कीजिए।
      • हिन्दी निबन्ध-यात्रा में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की विशिष्ट पहचान को सतर्क रेखांकित कीजिए।
      • रामचंद्र शुक्ल अथवा कुबेरनाथ राय की निबन्ध-कला पर प्रकाश डालिए।
      • ललित निबन्ध की सांस्कृतिक एवं मानवीय पक्षधरता के परिप्रेक्ष्य में कुबेरनाथ राय के ललित निबन्ध-लेखन की समीक्षा कीजिए।
      • निबन्ध-कला की दृष्टि से 'करुणा' अथवा “घृणा” शीर्षक निबंध की विवेचना कीजिए।
    • निबंध निलय: रचनाएँ
      • काव्य-साहित्य और अन्य कलाएँ मूलतः सृजनात्मक हैं, अतः उनमें राजनीति के कार्य-विभाजन जैसा कोई विभाजन संभव ही नहीं होता। कोई भी सच्चा कलाकार ध्वंसयुग का अग्रदूत रहकर निर्माण का भार दूसरों पर नहीं छोड़ सकता, क्योंकि उसकी रचना तो निर्माण तक पहुँचने के लिए ही ध्वंस का पथ पार करती है।
      • जिसका मन अपने वश में नहीं है, वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है, अपने को छिपाने के लिए मिथ्या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज सब मिथ्याचारों से मुक्त है। वह वशी है। वह वैरागी है।
      • साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है--उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।
      • तुलसीदास की भक्ति वर्ण, जाति, धर्म आदि के कारण किसी का बहिष्कार नहीं करती। जो “अति अघ-रूप” समझे जाते हैं, उन “आभीर जवन किरात खस स्वपचादि” के लिए भी वह कहते हैं कि राम का नाम लेकर वे भी पवित्र हो जाते हैं। इससे उनकी भक्ति का जनवादी तत्त्व अच्छी तरह प्रकट हो जाता है। जिन तमाम लोगों के लिए पुरोहित वर्ग ने उपासना और मुक्ति के द्वार बन्द कर दिये थे, उन सब के लिए तुलसी ने उन्हें खोल दिया। तुलसी की जाति और कुलीनता पर पुरोहितों के आक्षेपों का यही कारण था।
      • उत्पीड़ित होकर भी वह शरण पाये है। आशरण हो वह कहाँ जायेगी। वर्षा में गृहविज्ञान स्तम्भ की ओट पाने का ही यत्न करता है.....। उनके नेत्र भीग गये और वह मौन रह गई। सोचा—प्रतूल और अंजना भी उसके दुर्भाग्य का रहस्य जानते हैं, इसलिए स्थूल बन्धनों का उपयोग करना आवश्यक नहीं समझते। स्थूल बन्धनों से कहीं अधिक दृढ़ परिस्थिति के सूक्ष्म, अदृश्य बंधन ही उसे बांधे हैं।
      • कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूर्व और अपर समुद्र—महोदधि और रत्नाकर—दोनों को दोनों भुजाओं से थामता हुआ हिमालय “पृथ्वी का मानदण्ड” कहा जाय तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। (निबंध-निलय, सम्पादक सत्येन्द्र, में संकलित निबंध 'कुटज', हजारीप्रसाद द्विवेदी से, पृष्ठ 228)
    • प्रेमचंद
      • ‘गोदान’ उपन्यास के मूल प्रतिपाद्य पर प्रकाश डालिए।
      • 'गोदान' के कथा-विधान की समीक्षा कीजिए।
      • मुंशी प्रेमचंद कृत 'गोदान' भारतीय कृषक-जीवन के वास्तविक धरातल का सटीक चित्रण प्रस्तुत करता है। उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
      • “गोदान” की भाषा और उसके शिल्प की विशेषताएँ बताइए।
      • “‘गोदान' के पात्र व्यष्टिपरक न होकर वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में आते हैं।” सिद्ध कीजिए।
      • “‘गोदान' भारतीय कृषि जीवन का ज्वलंत दस्तावेज़ है।” इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
      • 'गोदान' की धनिया स्त्री चरित्र का उदात्त रूप है। सोदाहरण प्रकाश डालिये।
      • “गोदान न केवल ग्रामीण जीवन का, बल्कि समूचे भारतीय जीवन की समस्याओं तथा यत्किंचित्‌ सम्भावनाओं का आख्यान है।” इस स्थापना का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण कीजिए।
      • “चूंकि कृषक जीवन की समस्या उस समय के भारत की मुख्य समस्या थी, इसलिए “गोदान” में कृषक जीवन की ट्रेजडी का आख्यान मानों युगीन समस्याओं का प्रतिनिधि आख्यान है।” इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
      • क्या प्रेमचंद की कहानियाँ घटना प्रधान अधिक और चरित्र प्रधान कम हैं? आलोचनात्मक टिप्पणी लिखते हुए अपने मत का प्रतिपादन कीजिए।
      • प्रेमचंद ने हिन्दी में पहली बार गाँव और कृषक जीवन को अपने उपन्यास-लेखन का केंद्रीय विषय बनाया। “गोदान” के माध्यम से प्रेमचंद की उक्त औपन्यासिक-दृष्टि की सांस्कृतिक समीक्षा प्रस्तुत कीजिए।
      • 'ईदगाह' या “पूस की रात” कहानियों में से किसी एक की समीक्षात्मक विवेचना कीजिए।
      • यदि आपको प्रेमचन्द की सभी कहानियों में से केवल एक ही सर्वोत्तम कहानी चुननी हो तो आप कौन-सी चुनेंगे और क्यों?
      • यदि प्रेमचन्द 'गोदान' को उपन्यास के बदले नाटक के रूप में लिखते, तो आपकी दृष्टि में वे उसमें क्या छोड़ते और जोड़ते?
      • प्रेमचन्द की कहानियों में आधुनिक विमर्शों के स्वरूप की पड़ताल कीजिए।
      • हिन्दी उपन्यास की आधुनिकता की चर्चा 'गोदान' से शुरू होती है। देसी आधुनिकता के कौन-कौन से तत्व 'गोदान' को आधुनिक सिद्ध करते हैं? स्पष्ट कीजिए।
      • “‘गोदान' न केवल कृषक-जीवन का महाकाव्य है, अपितु समूचे युग की व्यथा-कथा है।” — इस कथन का पक्षापक्ष-विमर्श प्रस्तुत कीजिए।
      • क्या यह सच है कि प्रेमचन्द ने हिन्दी कथा साहित्य की कर्मभूमि ही नहीं बदली बल्कि उसका कायाकल्प भी किया? सप्रमाण उत्तर दीजिए।
      • गोदान की बुनावट का विवेचन कीजिए।
      • क्या आपको 'गोदान' पढ़ते हुए यह लगता है कि होरी का जीवन दुःख का एक लम्बा नाटक है जिसमें सुख के भी कुछ दृश्य हैं? प्रमाण सहित उत्तर दीजिए।
      • पठित उपन्यास और कहानियों के आधार पर सोदाहरण सिद्ध कीजिए कि पात्रों के चित्रण में प्रेमचंद ने मनोविज्ञान का पर्याप्त ध्यान रखा है।
      • औपन्यासिक कला की दृष्टि से 'गोदान' उपन्यास की समीक्षा कीजिए।
      • अपने उपन्यासों एवं कहानियों में प्रेमचन्द की बुनियादी चिन्ताएं अपने समय की भी हैं और भविष्य की भी हैं। इस विचार से आप कहां तक सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर लिखिए।
      • शिल्प एवं भाषा-शैली की दृष्टि से 'गोदान' और 'मैला आँचल' का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • जीवन-यथार्थ के अंकन के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद की कहानी-कला की समीक्षा कीजिए।
      • भारतीय ग्रामों के यथार्थ की दृष्टि से “गोदान” और “मैला आँचल” का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • क्या आप 'गोदान' को राष्ट्रीय प्रतिनिधि-उपन्यास की संज्ञा से विभूषित कर सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
      • “गोदान” कृषक-जीवन का एक गद्य-महाकाव्य है। – इस उक्ति की पुष्टि कीजिए।
      • 'गोदान किसान जीवन का ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय जीवन का महाकाव्य है।' इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “गोदान” में भारतीय कृषक के शोषण के विभिन्न रूपों का उल्लेख हुआ है। स्पष्ट कीजिए।
      • 'गोदान' एक साधारण भारतीय किसान की करुण कथा है। युक्तियुक्त विवेचन कीजिए।
      • 'गोदान' में शहरी और ग्रामीण कथा का पारस्परिक गुंफन, उपन्यास की गठन को शिथिल बना देता है। इस कथन की परीक्षा कीजिए।
      • सभी प्रकार के मानवों को गहराई से समझने के साथ-साथ प्रेमचन्द, सभी पात्रों का सहज मानवीय सहानुभूति के साथ चित्रण भी करते हैं। — ‘गोदान’ के पात्रों के सम्बन्ध में निरूपित कीजिए।
      • “गोदान” पीढ़ियों की संघर्ष-कथा है, जिसमें पुरानी पीढ़ी (होरी) नयी विद्रोही पीढ़ी (गोबर) से टकरा रही है।” — युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • “गोदान” अपने युग का प्रतिबिम्ब भी है और आने वाले युग को प्रसव-पीड़ा भी।” — इस कथन की तर्कसंगत व्याख्या कीजिए।
      • काव्य और शिल्प की दृष्टि से 'मानसरोवर' (भाग एक) में संकलित “बड़े भाई साहब” तथा “पूस की रात” कहानियों की समीक्षा कीजिए।
      • ‘गोदान' स्वतंत्रता-पूर्व के भारतीय ग्राम-जीवन में नगर-जीवन के हस्तक्षेप की कथा है—परीक्षा कीजिए।
      • कहानी-कला की दृष्टि से 'ईदगाह' या “ठाकुर का कुआँ” कहानी का विवेचन कीजिए।
      • ‘गोदान’ भारतीय किसान के संघर्ष की महागाथा है — परीक्षा कीजिए।
      • 'मानसरोवर' खण्ड 1 में संकलित कहानियों में से किस कहानी को आप सर्वाधिक प्रभावशाली मानते हैं, और क्यों? — युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • “मानव जीवन के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में प्रेमचंद अद्वितीय हैं।” — “मानसरोवर” (भाग एक) के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
      • “अभिजात वर्ग और नागरिक जीवन का चित्रण प्रेमचन्द ने बहुत कम किया है; और जहाँ ऐसे स्थल पाए हैं वहाँ उनका मन रमा नहीं है।” — ‘गोदान’ झी इस आधार पर समीक्षा कीजिए।
      • “मानवमन की अनुभूतियां एवं संवेदनाएं ही प्रेमचंद की कहानियों का मुख्य आधार हैं।” — “मानसरोवर” (भाग एक) की कहानियों पर इस दृष्टि से विचार कीजिए।
      • “गोदान भारत के ग्रामीण जीवन का एक महाकाव्य है!” — इस कथन की व्याख्या कीजिए और आवश्यक उदाहरण भी दीजिए।
      • कहानी कला की दृष्टि से 'बड़ भाई साहब” अथवा "पूस की रात” शीर्षक कहानी की समीक्षा कीजिए ।
      • “में उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र मात्र समझता हूं।” “गोदान के आधार पर प्रेमचन्द के इस कथन की व्याख्या कीजिए।।
      • “सबसे उत्तम कहानी वह होती है, जिसका आधार किसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर हो।” इस कथन से क्या आप सहमत हैं ? “मान-सरोवर' के आधार पर स्पष्ट कीजिए।।
      • "गोदान भारतीय किसान की द्वोजडो है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।।
      • कहानी कला की दृष्टि से 'ईदगाह' अथवा “ठाकुर का कुआँ की समीक्षा कीजिए।।
      • 'मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है।‘ अपनी इस मान्यता को “गोदान” में उपस्थित करने में लेखक कहाँ तक सफल है ?
      • “मानव मन की अनुभूतियाँ एवं संवेदनाएँ ही प्रेमचन्द की कहानियों का मुख्य आधार है। ‘मानसरोवर’ में संकलित कहानियों के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
      • गोदान को भारतीय कृषक जीवन का महाकव्यात्मक उपन्यास क्यों कहा जाता है ? गोदान के ओपन्यासिक शिल्प पर विचार करते हुए उत्तर दीजिए।
      • मानसरोवर : प्रथम भाग में संकलित कहानियों के आधार पर प्रेमचन्द के यथार्थवाद का विवेचन कीजिए।
      • गोदान के वस्तु विधान का विश्लेषण करते हुए उसके गुण दोष पर विशेष विचार कीजिए।।
    • प्रेमचंद की रचनाएँ
      • जिस तरह मर्द के मर जाने से औरत अनाथ हो जाती है, उसी तरह औरत के मर जाने से मर्द के हाथ-पाँव टूट जाते हैं।
      • विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी, मानो झटका दे कर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा। बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गई थी।
      • "हाँ, दे दिया। अपनी गाय थी मार डाली, फिर किसी दूसरे के जानवर को तो नहीं मारा? तुम्हारी तहकीकात में यही निकलता है तो यही लिखो। पहना दो मेरे हाथों में हथकड़ियाँ। देख लिया तुम्हारा न्याय और तुम्हारे अक्कल की दौड़। गरीबों का गला काटना दूसरी बात है। दूध का दूध और पानी का पानी करना दूसरी बात है।"
      • कौन कहता है कि हम-तुम आदमी हैं। हमें आदमियत कहाँ? आदमी वह है जिसके पास धन है, अख्तियार है, इल्म है। हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं।
      • प्रेम में कुछ मान भी होता है, कुछ महत्त्व भी। श्रद्धा तो अपने को मिटा डालती है और अपने मिट जाने को ही अपना इष्ट बना लेती है। प्रेम अधिकार करना चाहता है, जो कुछ देता है, उसके बदले में कुछ चाहता भी है।
      • मैं प्रेम को संदेह से ऊपर समझती हूँ। वह देह की वस्तु नहीं, आत्मा की वस्तु है। संदेह का वहाँ ज़रा भी स्थान नहीं और हिंसा तो संदेह का ही परिणाम है। वह संपूर्ण आत्म-समर्पण है। उसके मंदिर में तुम परीक्षक बनकर नहीं, उपासक बनकर ही वरदान पा सकते हो।
      • संस्कृति में सदैव आदान-प्रदान होता आया है, लेकिन अंधी नकल तो मानसिक दुर्बलता का ही लक्षण है। पश्चिम की स्त्री आज गृह स्वामिनी नहीं रहना चाहती। भोग की विदग्ध लालसा ने उसे उच्छृंखल बना दिया है। लज्जा और गरिमा को, जो उसकी सबसे बड़ी विभूति थी, चंचलता और आमोद-प्रमोद पर वह होम कर रही है।
      • ठाकुर ठीक ही तो कहते हैं, जब हाथ में रुपए आ जाएँ, गाय ले लेना। तीस रुपए का कागद लिखने पर कहीं पचीस रुपए मिलेंगे और तीन-चार साल तक न दिए जाएँ, तो पूरे सौ हो जाएँगे। पहले का अनुभव यही बता रहा था कि कर्ज़ वह मेहमान है, जो एक बार आकर जाने का नाम नहीं लेता।
      • होरी प्रसन्न था। जीवन के सारे संकट, सारी निराशाएँ मानो उसके चरणों पर लोट रही थीं। कौन कहता है जीवन-संग्राम में वह हारा है? यह उल्लास, यह गर्व, यह पुलक क्या हार के लक्षण हैं? इन्हीं हारों में उसकी विजय है। उसके टूटे-फूटे अस्त्र उसकी विजय-पताकाएँ हैं। उसकी छाती फूल उठी है। मुख पर तेज आ गया है।
      • जो कुछ अपने से नहीं बन पड़ा, उसी के दूख का नाम मोह है। पाले हुए कर्तव्य और निपटाये हुए कामों का क्या मोह! मोह तो उन नावों को छोड़ जाने में है, साथ हम अपना कर्तव्य न निभा सके; उन अधूरे मंसूबों में है, जिन्हें हम पूरा न कर सके।
      • “जिसे संसार दुःख कहता है, वही कवि के लिए सुख है। धन और ऐश्वर्य, रूप और बल, विद्या और बुद्धि, ये विभूतियाँ संसार को चाहे कितना ही मोहित कर लें, कवि के लिए यहाँ जरा भी आकर्षण नहीं है, उसके मोद और आकर्षण की वस्तु तो बुझी हुई आशाएं और मिटी हुई स्मृतियां और टूटे हुए हृदय के आँसू हैं। जिस दिन इन विभूतियों में उसका प्रेम न रहेगा, उस दिन वह कवि न रहेगा” ।
      • अब हमने आप में सच्चा पथ-प्रदर्शक, सच्चा गुरु पाया है और इस शुभ दिन के आनन्द में आज हमें एकमन एकप्राण हो कर अपने अहंकार को अपने दम्भ को तिलांजलि दे देना चाहिए। हममें से आज से कोई ब्राह्मण नहीं है कोई शूद्र नहीं है, कोई हिन्दू नहीं है, कोई मुसलमान नहीं है, कोई ऊँच नहीं है, कोई नीच नहीं है। हम सब एक ही माता के बालक, एक ही गोद में खेलने वाले, एक ही थाली के खाने वाले भाई हैं। जो लोग भेद-भाव में विश्वास रखते हैं, जो लोग पृथकता और कट्टरता के उपासक हैं, उनके लिए हमारी सभा में स्थान नहीं है।।
      • अगर प्रेम खूँख्वार शेर है तो मैं उससे दूर ही रहूँगी। मैंने तो उसे गाय ही समझ रखा था। मैं प्रेम को सन्देह से ऊपर समझती हूँ। वह देह की वस्तु नहीं, आत्मा की वस्तु है। सन्देह का वहाँ ज़रा भी स्थान नहीं और हिंसा तो सन्देह का ही परिणाम है। वह सम्पूर्ण आत्मसमर्पण है। उसके मंदिर में तुम परीक्षक बन कर नहीं, उपासक बन कर ही वरदान पा सकते हो।।
      • जीवन के संघर्ष में उसे सदैव हार हुई, पर उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। प्रत्येक हार जैसे उसे भाग्य से लड्ने की शक्ति दे देती थी; मगर अब वह उस अन्तिम दशा को पहुँच गया था, जब उसमें आत्मविश्वास भी न रहा था। अगर वह अपने धर्म पर अटल रह सकता, तो भी कुछ आंसू पुँछते; मगर वह बात न थी। उसने नीयत भी बिगाड़ी, अधर्म भी कमाया, कोई ऐसी बुराई न थी जिसमें वह पड़ा न हो; पर जीवन की कोई अभिलाषा न पूरी हुई, और भले दिन मृगतृष्णा को भाँति दूर ही होते चले गये। यहाँ तक कि आब उसे धोखा भी न रह गया था। झूठी आशा को हरियाली और चमक भी अब नज़र न आती थी। हारे हुए महीप की भाँति उसने अपने को तीन बीघे के किले में बन्द कर लिया. था और उसे प्राणों की तरह बचा रहा था।।
      • तू जो बात नहीं समझती, उसमें टांग क्‍यों अड़ाती है भाई! मेरी लाठी दे दे और अपना काम देख। यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है, नहीं कहीं पता न लगता किधर गये। गांव में इतने आदमी तो हैं, किस पर बेदखली नहीं आयी, किस पर कुड़की नहीं आयी। जब दूसरे के पाँवों तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पांवों को सहलाने में ही कुशल है।।
      • “'बिगड़नेवाली बात को तो सभी पहले से जान लेते हैं; जिनके पास बल है, उसे नहीं होने देते, जो कमजोर हैं। उसे धोखा कहकर छिपाते हैं “बाबू को सब मालूम हो गया था, पर अच्छे घर-वर के लिए जो चाहिए वह बाबू कहाँ से लाते। इसमें तुम तो एक बहाना बन गये, तुम्हारा क्या कसूर है इसमें....” ।
      • मालती बाहर से तितली है, भीतर से मधुमक्खी। उसके जीवन में हँसी ही हँसी नहीं है, केवल गुड़ खाकर कौन जी सकता है ! और जिए भी तो वह कोई सुखी जीवन न होगा। वह हँसती है, इसलिए कि उसे इसके भी दाम मिलते हैं।।
      • “गोदान' में प्रस्तुत गाँव और शहर की कथाओं के सम्बन्ध पर विचार करते हुए उपन्यास के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।।
      • सच्चा आनंद, सच्ची शांति केवल सेवा-व्रत में है। वही अधिकार का स्त्रोत है, वही शक्ति का उद्गम है। सेवा ही वह सीमेंट है, जो दंपति को जीवनपर्यंत स्नेह और साहचर्य में जोड़े रख सकता है, जिस पर बड़े-बड़े आघातों का भी कोई असर नहीं होता। जहां सेवा का अभाव है, वहीं विवाह-विच्छेद है, परित्याग है, अविश्वास है। (‘गोदान, प्रेमचंद, पृष्ठ।67, संस्करण-1967)
      • मुझे तुम्हारी इस कमअकली पर दुख होता है। जहीन हो, इसमें शक नहीं; लेकिन वह जहन किस काम का, जो हमारे आत्म-गौरव की हत्या कर डाले?।
      • नारी केवल माता है और इसके उपरान्त वह जो कुछ है वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र। मातृत्व संसार की सबसे बड़ी साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान विजय है। एक शब्द में, उसे लय कहूँगा—जीवन का, व्यक्तित्व का और नारीत्व का भी।
      • वैवाहिक जीवन के प्रभात में लालसा अपनी गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और हृदय के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रंजित कर देती है। फिर मध्याह का प्रखर ताप आता है, क्षण-क्षण पर बगूले उठते हैं और पृथ्वी काँपने लगती है। लालसा का सुनहरा आवरण हट जाता है और अपने नग्न रूप में सामने आ खड़ी होती है। उसके बाद विश्राममय संध्या आती है, शीतल और शांत, जब हम थके हुए पथिकों की भाँति दिन भर की यात्रा का वृत्तांत कहते और सुनते हैं तटस्थ भाव से, मानो हम किसी ऊँचे शिखर पर जा बैठे हैं, जहाँ नीचे का जन-रव हम तक नहीं पहुँचता।
      • तो क्या यह मेरे मोटे होने के दिन हैं? मोटे वह होते हैं, जिन्हें न रिन का सोच होती है, न इज़्ज़त का। इस ज़माने में मोटा होना बेहयाई है। सौ को दुबला करके तब एक मोटा होता है। ऐसे मोटेपन में क्या सुख? सुख तो जब है कि सभी मोटे हों।
      • आपका अपने असामियों के साथ बहुत अच्छी बर्ताव है, मगर प्रश्न यह है कि उसमें स्वार्थ है या नहीं? इसका एक कारण क्या यह नहीं हो सकता कि मद्धिम आँच में भोजन ज्यादा स्वादिष्ट पकता है? गुड़ से मारने वाला ज़हर से मारने वाले की अपेक्षा कहीं सफल हो सकता है। मैं तो केवल इतना जानता हूँ कि हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं हैं। हैं तो उसका व्यवहार करें, नहीं हैं, तो बकना छोड़ दें। मैं नकली ज़िंदगी का विरोधी हूँ।
      • मालंती और मेहता के पारस्परिक संवादों से उभरने वाले जीवन-दर्शन को स्पष्ट कीजिए और अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कीजिए।
      • वह जानते थे, जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं, केवल एक बंधन से बंध जाने के बाद ही पैदा होता है—हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम पैदा होता है—वह तो रूप की आसक्ति मात्र है, जिसका कोई टिकाव नहीं; मगर इसके पहले तो यह निश्चय कर लेना ही था कि जो पत्थर साहचर्य के खराद पर चढ़ेगा, उसमें खरादे जाने की क्षमता है भी या नहीं। सभी पत्थर तो खराद पर चढ़कर मूर्तियाँ नहीं बन जाते।
      • ‘गोदान’ में चित्रित कृषक-जीवन की समस्याओं के निदान और समाधान पर प्रेमचन्द का पक्ष प्रस्तुत कीजिए।
      • मर्द में वह सामर्थ्य ही नहीं है। वह अपने को मिटाएगा, तो शून्य हो जाएगा। वह किसी खोह में जा बैठेगा और सर्वात्मा में मिल जाने का स्वप्न देखेगा। वह तेज प्रधान जीव है, और अहंकार में यह समझकर कि वह ज्ञान का पुतला है, सीधा ईश्वर में लीन होने की कल्पना किया करता है। स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान है, शांति-संपन्न है, सहिष्णु है। पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं, तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं, तो वह कुलटा हो जाती है।
      • इस बड़ाई के अनुभव को भोगने का जिसे दुर्व्यसन हो जाता है, उसके लिए उन्नति का द्वार बन्द-सा हो जाता है। उसे हर घड़ी अपनी बड़ाई अनुभव करते रहने का नशा हो जाता है, इससे उसकी चाट के लिए वह सदा अपने से घटकर लोगों की ओर दृष्टि डाला करता है, और अपने से बड़े लोगों की ओर—नशा मिट्टी होने के भय से—देखने का साहस नहीं करता। ऐसी अवस्था में वह उन्नति की उत्तेजना और शिक्षा से वंचित रहता है।
      • रूप का आकर्षण तो उन पर कोई असर न कर सकता था। ब्रह्मगुण का आकर्षण था। वे यह जानते थे; जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं; केवल एक बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम होता है, यह तो रूप की आसक्ति मात्र है, जिसका कोई टिकाव नहीं। अगर इसके पहले यह निश्चय तो कर लेना ही था कि वह पत्थर साहचर्य के खराद पर चढ़ेगा, उसमें खरादे जाने की क्षमता है भी या नहीं। सभी पत्थर तो खराद पर चढ़कर सुंदर मूर्तियाँ नहीं बन जाते।
      • जिसे तुम प्रेम कहती हो, वह धोखा है, उद्दीप्त लालसा का विकृत रूप, उसी तरह जैसे संन्यास केवल भीख माँगने का संस्कृत रूप है। वह प्रेम अगर वैवाहिक जीवन में कम है, तो मुक्त विलास में बिलकुल नहीं है। सच्चा आनंद, सच्ची शांति केवल सेवा-व्रत में है। वही अधिकार का स्रोत है, वही शक्ति का उद्गम है। सेवा ही वह सीमेंट है, जो दंपति को जीवनपर्यंत स्नेह और साहचर्य में जोड़े रख सकता है, जिस पर बड़े-बड़े आघातों का भी कोई असर नहीं होता।
      • मुझ में और आप में अंतर इतना ही है कि मैं जो कुछ मानता हूँ, उस पर चलता हूँ। आप लोग मानते कुछ हैं, करते कुछ हैं। धन को आप किसी अन्याय से बराबर फैला सकते हैं, लेकिन बुद्धि को, चरित्र को, और रूप को, प्रतिभा को और बल को बराबर फैलाना तो आपकी शक्ति के बाहर है; छोटे-बड़े का भेद केवल धन से ही तो नहीं होता। मैंने बड़े-बड़े धनकुबेरों को भिक्षुकों के सामने घुटने टेकते देखा है, और आपने भी देखा होगा। रूप के चौखट पर बड़े-बड़े महीप नाक रगड़ते हैं। क्या यह सामाजिक विषमता नहीं है?
      • इस स्वच्छंद जीवन से उनके मन में अनुराग उत्पन्न हुआ। सामने की पर्वत-माला दर्शन-तत्त्व की भाँति अगम्य और अनंत फैली हुई, मानो ज्ञान का विस्तार कर रही हो, मानों आत्मा उस ज्ञान को, उस प्रकाश को, उस अगम्यता को, उसके प्रत्यक्ष विराट रूप में देख रही हो। दूर के एक बहुत ऊँचे शिखर पर एक छोटा-सा मन्दिर था, जो उस अगम्यता में बुद्धि की भाँति ऊँचा, पर खोया हुआ-सा खड़ा था, मानो वहाँ तक पर मार कर पक्षी विश्राम लेना चाहता है और कहीं स्थान नहीं पाता।
      • आध्यात्मिक और त्यागमय प्रेम और निःस्वार्थ प्रेम, जिसमें आदमी अपने को मिटाकर केवल प्रेमिका के लिए जीता है; उसके आनंद से आनंदित होता है और उसके चरणों पर अपनी आत्मा का समर्पण कर देता है, मेरे लिए निरर्थक शब्द हैं। मैंने पुस्तकों में ऐसी प्रेम-कथाएँ पढ़ी हैं, जहाँ प्रेमी ने प्रेमिका के नए प्रेमियों के लिए अपनी जान दे दी है; अगर उस भावना को मैं श्रद्धा कह सकता हूँ, प्रेम कभी नहीं। प्रेम सीधी सादी गऊ नहीं, खूंखार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आँख भी नहीं पड़ने देता।
      • सेवा ही वह सीमेंट है, जो दम्पत्ति को जीवनपर्यन्त स्नेह और साहचर्य में जोड़ रख सकता है, जिस पर बड़े-बड़े आघातों का कोई असर नहीं होता। जहाँ सेवा का अभाव है, वहीं विवाह-विच्छेद है, परित्याग है, अविश्वास है। और आपके ऊपर, पुरुष जीवन की नौका का कर्णधार होने के कारण जिम्मेदारी ज्यादा है। आप चाहें तो नौका को आँधी और तूफानों में पार लगा सकती हैं। और आपने असावधानी की, तो नौका डूब जाएगी और उसके साथ आप भी डूब जाएंगी। (गोदान)
    • जयशंकर प्रसाद
      • "कामायनी आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि महाकाव्य है" — स्पष्ट कीजिए।
      • “कामायनी'' को चेतना का सुन्दर इतिहास' और “अखिल मानव-भावों का सत्य'- शोधक काव्य क्यों कहा गया है ? अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • “कामायनी में जयशंकर प्रसाद ने मानवमन एवं मानवता के विकास की कहानी प्रस्तुत की है।” - एतत्संबंध में अपना पक्ष उपस्थापित कीजिए।
      • जयशंकर प्रसाद रचित 'कामायनी' के महाकाव्यत्व का विश्लेषण कीजिए।
      • “कामायनी' का गौरव उसके युगबोध, परिपुष्ट चिंतन, महत्‌ उद्देश्य और प्रौढ़ शिल्प में निहित है।“ इस कथन की विवेचना कीजिए।
      • ‘प्रसाद मूलत: प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं।’ इस कथन के आधार पर “कामायनी' में अभिव्यक्त प्रेम एवं सौंदर्य का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • ‘कामायनी' विषम परिस्थितियों में जीवन के सृजन का महाकाव्य है। स्पष्ट कीजिए।
      • 'रामचरितमानस' के बाद “कामायनी' एक ऐसा प्रबंध काव्य है जो मनुष्य के सम्पूर्ण प्रश्नों का अपने ढंग से कोई न कोई सम्पूर्ण उत्तर देता है। विचार कीजिए।
      • “बुद्धिवाद के विकास में, अधिक सुख की खोज में, दुख मिलना स्वाभाविक है।'” ‘कामायनी’ के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “कामायनी उज्ज्वल चेतना का सुन्दर इतिहास है' -- इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं ?
      • 'कामायनी' को जयशंकर प्रसाद की अन्यतम काव्यकृति क्यों कहा जाता है? सतर्क और सोदाहरण अपने मत का उपस्थापन कीजिए।
      • “शरीर नश्वर और अस्थायी है? देवी अमरता चाहती हो? … उस संसार में क्या सुख और आकर्षण होगा?” – इस संवाद के माध्यम से कामायनी की विचारधारा स्पष्ट कीजिए।
      • रूपक तत्त्व को दृष्टि से 'कामायनी' की विवेचना करते हुए उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
      • 'कामायनी' का समरसता-सन्देश वर्तमान जीवन-स्थितियों में कहां तक प्रासंगिक है? तर्क सहित बतलाइए।
      • 'कामायनी' में चित्रित मानव-सभ्यता के विकास की विभिन्न स्थितियों और समस्याओं का विवेचन कीजिए।
      • छायावाद की प्रमुख विशेषताओं के आधार पर “कामायनी” का मूल्यांकन कीजिए।
      • कामायनी में अभिव्यक्त आनन्दवाद और समरसता का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • "कामायनी में प्राचीन एवं अर्वाचीन संस्कृतियों का सुन्दर समन्वय मिलता है।” - इस कथन की तर्कयुक्त विवेचना प्रस्तुत कीजिए।
      • कामायनी के अंगीरस का निरूपण रसवादी समीक्षा-पद्धति से कीजिए।
      • ध्वन्यात्मकता, लाक्षिणकता, उपचारवक्रता और अनुभूति की विवृति को छायावाद की विशेषता मानने वाले प्रसाद ने उसे 'कामायनी' में कैसा मूर्त किया है ? स्पष्ट कीजिए।
      • दिनकर जी ने ‘कामायनी’ को "दोष-रहित, दूषण-सहित" कहकर क्या कहना चाहा है -- संभावनाओं का आकलन करते हुए अपनी वैचारिक प्रतिक्रिया व्यक्त कीजिए।
      • “प्रसाद ने प्रकृति के कोमल और प्रलयंकारी दोनों रूपों का चित्रण किया है।” - 'कामायनी' में प्रकृति-वर्णन की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उपर्युक्त कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
      • 'कामायनी' के काव्य-सौंदर्य को उद्घाटित करते हुए उसमें निहित मिथक तत्व को स्पष्ट कीजिए।
      • छायावादी धारा के महाकाव्य के रूप में 'कामायनी' की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
      • 'कामायनी' के 'श्रद्धा' सर्ग के आधार पर कवि की जीवन-दृष्टि एवं उद्देश्य को रेखांकित कीजिए।
      • “कामायनी” काव्य और दर्शन के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मत की परीक्षा कीजिए।
      • 'कामायनी' के आधुनिक बोध अथवा ‘अंधेरे में’ के यथार्थ बोध का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
      • प्रतीकात्मकता, भाषा-शैली एवं छन्द-योजना की दृष्टि से ‘कामायनी’ (चिंता सर्ग) का महत्व स्पष्ट कीजिए।
      • श्रद्धा अथवा लज्जा सर्ग के काव्य-सौन्दर्यं का उदाहरणों के माध्यम से निरूपण कीजिए।
      • कामायनी के रूपक तत्व का विश्लेषण करते हुए उस में प्रतिपादित जीवन दर्शन को स्पष्ट कीजिए।
      • कामायनी के महाकाव्यत्व की मीमांसा कीजिए।
      • प्रसाद के नारी पात्र।
      • "प्रसाद के नाटक भारत के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।" — ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक के आधार पर इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
      • 'स्कन्दगुप्त' के आधार पर जयशंकर प्रसाद की राष्ट्रीय-चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • “‘स्कंदगुप्त’ नाटक राष्ट्रीय उन्नति की संवेदना को प्रकट करता है।” विवेचना कीजिए।
      • “प्रसाद जी के नाटक न सुखांत हैं न दुःखांत, बल्कि वे प्रसादांत हैं” इस कथन पर अपनी सहमति-असहमति व्यक्त कीजिए।
      • “प्रसाद के नाटक भारत के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।” 'स्कंदगुप्त' नाटक के संदर्भ में व्याख्या कीजिए।
      • “गुप्त-कालीन प्रामाणिक इतिहास का अनुलेखन एवं कल्पनाधारित वस्तु-संयोजन ‘स्कंदगुप्त’ में परिलक्षित होते हैं।” इस कथन की सप्रमाण संपुष्टि कीजिए।
      • 'स्कंदगुप्त' नाटक की प्रमुख समस्या राष्ट्रीय-सुरक्षा की समस्या है। प्रसाद की नाट्य-दृष्टि के संदर्भ में समीक्षा कीजिए।
      • “जयशंकर प्रसाद के नाटकों के स्त्री-पात्र सदैव श्रेष्ठ रहे हैं।” इस कथन के आलोक में 'स्कंदगुप्त' में स्त्री-पात्र परिकल्पना की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
      • ‘स्कंदगुप्त’ नाटक प्रसाद के जीवन-मूल्यों का कौन-कौन सा संदर्भ उद्घाटित करता है?
      • क्या ‘स्कंदगुप्त’ नाटक में कल्पना और इतिहास के समन्वय से नाटक के संप्रेषणगत सौन्दर्य में वृद्धि हुई है? तर्कयुक्त उत्तर दीजिए।
      • प्रेक्षकों पर सम्प्रेषणगत प्रभाव की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद और मोहन राकेश के नाटकों का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • ‘स्कंदगुप्त’ में अभिव्यक्त राष्ट्रीय भावना पर तत्कालीन स्वाधीनता-आन्दोलन के प्रभावों का आकलन कीजिए।
      • क्या इतिहास और कल्पना के सुंदर योग को प्रसाद की नाट्यकलागत विशेषताओं में सर्वोपरि विशेषता माना जा सकता है? ‘स्कंदगुप्त’ के संदर्भ में तर्कसम्मत विवेचन कीजिए।
      • ‘स्कंदगुप्त’ के आधार पर प्रसाद की इतिहास-दृष्टि का विवेचन करते हुए उनकी नाट्य-कला की विशिष्टताओं का विश्लेषण कीजिए।
      • ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक में निरूपित इतिहास तत्त्व विषय पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
      • “चन्द्रगुप्त’ में भारतीय संस्कृति के तत्त्वों एवं इतिहास के तथ्यों की भरमार है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
      • नाट्यकला की दृष्टि से ‘चन्द्रगुप्त’ हिन्दी का श्रेष्ठ नाटक है, इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में अपना मत प्रकट कीजिए।
      • “चन्द्रगुप्त” नाटक में स्वच्छंदतावादी, नाटकीय तत्त्वों का आकलन कीजिए।
      • ‘अभिनेयता’ का आशय स्पष्ट करते हुए ‘चन्द्रगुप्त’ में उसकी संभावना पर विचार कीजिए।
      • स्वच्छंदतावादी नाटक के तत्वों का उल्लेख करते हुए बताइए कि ‘चन्द्रगुप्त’ में उनका कैसा नियोजन हुआ है।
      • ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक को सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय-चेतना का प्रतिपादन कीजिए।
      • अभिनेयता और रस की दृष्टि से ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
      • ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक की ऐतिहासिकता का परीक्षण कीजिए।
      • “प्रसाद के नाटकों के नारी पात्र पुरुष पात्रों की अपेक्षा अधिक प्रभावपूर्ण शक्तिशाली हैं।” ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए कि जयशंकर प्रसाद का ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक राष्ट्र-प्रेम और भारत की गरिमा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
      • रंगमंच की दृष्टि से “अंधेर नगरी” और “चन्द्रगुप्त” नाटकों में आप किसे श्रेष्ठ समझते हैं? युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • “चन्द्रगुप्त” नाटक में जहाँ एक ओर पात्रों को स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान किया गया है, वहीं उनके अंतर्द्वंद्व एवं बहिर्द्वंद्व के मर्म को भी उद्घाटित किया गया है।” इस उक्ति के सन्दर्भ में नाटक के प्रमुख पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
    • जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ
      • विषमता की पीड़ा से व्यस्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान । यही दुःख सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान ।
      • महानृत्य का विषम सम, अरी अखिल स्पंदनों की तू माप, तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप।
      • कौन हो तुम वसंत के दूत विरस पतझड़ में अति सुकुमार। घन-तिमिर में चपला की रेख, तपन में शीतल मंद बयार। नखत की आशा-किरण समान, हृदय के कोमल कवि की कांत - कल्पना की लघु लहरी दिव्य, कह रही मानस-हलचल शांत।।
      • दुःख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात। एक परदा यह झीना नील, छिपाये है जिसमें सुख गात। जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल— ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल॥
      • उषा की पहिली लेखा कांत, माधुरी से भींगी भर मोद; मदभरी जैसे उठे सलज्ज भोर की तारक-द्युति की गोद।।
      • अंधकार के अट्रहास सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य, 'छिपी सृष्टि के कण-कण में तू यह सुंदर रहस्य है नित्य। जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घनमाला में, सौदामिनी संधि सा सुंदर क्षण भर रहा उजाला में।।
      • चेतना का सुंदर इतिहास अखिल मानव भावों का सत्य; विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य अक्षरों से अंकित हो नित्य। विधाता की कल्याणी सृष्टि सफल हों इस भूतल पर पूर्ण; पटें सागर, बिखेरें ग्रह-पुंज और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।।
      • विश्व की दुर्बलता बल बने पराजय का बढ़ता व्यापार हंसाता रहे उसे सविलास शक्ति का क्रीड़ामय संचार। शक्ति के विद्युतकण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं हो निरुपाय समन्वय उसको करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाय।
      • “विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान, यही दुःख-सुख, विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार उमड़ता कारण-जलधि समान, व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुख-मणिगण द्युतिमान॥”
      • सुरा सुरभिमय वदन अरुण वे नयन भरे आलस अनुराग; कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पतृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये। आह! जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।।
      • नित्य-यौवन छवि से हो दीप्त विश्व की करुण कामना मूर्ति, स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण प्रकट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति। उषा की पहिली लेखा कांत, माधुरी से भीगी भर मोद, मद भरी जैसे उठे सलज्ज भोर की तारक-द्युति की गोद।।
      • “विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्तंभित विश्व महान; यही दुख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा में नीली लहरों बीच बिखरते सुख मणि गण द्युतिमान!”
      • महा-नृत्य का विषम सम, अरी अखिल स्पंदनों की तू माप, तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप। अधंकार के अट्टहास-सी, मुखरित सतत चिरंतन सत्य, छिपी सृष्टि के कण-कण में तू, यह सुन्दर रहस्य है नित्य।।
      • यह क्या मधुर-स्वप्न-सी झिलमिल सदय हृदय में अधिक अधीर व्याकुलता-सी व्यक्त हो रही आशा बन कर प्राण-समीर। यह कितनी स्पृहणीय बन गई मधुर जागरण-सी छविमान स्मिति की लहरों-सी उठती है नाच रही ज्यों मधुमय तान।
      • दया, माया, ममता लो आज मधुरिमा लो, अगाध विश्वास; हमारा हृदय-रत्न-निधि स्वच्छ तुम्हारे लिए खुला है पास। बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल; विश्व-भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल।
      • मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ, मैं शालीनता सिखाती हूँ, नूपुर-सी लिपट मनाती हूँ। लाली बन सरल कपोलों में, आँखों में अंजन-सी लगती, कुंचित अलकों-सी घुंघराली, मन की मरोर बन कर जगती।
      • उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं: जिसमें अनन्त अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती; ठोकर जो लगने वाली है। उसको धीरे से समझाती।
      • कर रही लीलामय आनंद, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त, विश्व का उन्मीलन अभिराम, इसी में सब होते अनुरक्त। काम-मंगल में मंडित श्रेय, सर्ग है इच्छा का परिणाम। तिरस्कृत कर उसको तुम भूल, बनाते हो असफल भवधाम।।
      • संकुचित असीम अमोघ शक्ति जीवन को बाधा-मय पथ पर ले चले भेद से भरी भक्ति या कभी अपूर्ण अजंता में हो रागमयी-सी महासक्ति ... तुम समझ न सको, बुराई से शुभ-इच्छा की है बड़ी शक्ति, हो विफल तर्क से भरी युक्ति।
      • उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।।
      • नेत्र निमीलन करती मानो प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने, जलधि लहरियों की अँगड़ाई बार-बार जाती सोने। सिंधु सेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी, प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये सी ऐठीं-सी।
      • सौंदर्य जलधि से भर लाये केवल तुम अपना गरल पात्र, तुम अति अबोध, अपनी अपूर्णता को न स्वयं तुम समझ सके ... 'कुछ मेरा हो' यह राग-भाव संकुचित पूर्णता है अजान — मानस-जलनिधि का क्षुद्र-यान॥
      • उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।
      • दिग्दाहों से धूम उठे, या जलघर उठे क्षितिज तट के। सधन गगन में भीम प्रकम्पन, झंझा के चलते झटके ॥ अन्धकारे में मलिन मित्त की धुंधली आभा लीन हुई; वरुण व्यस्त थे, घनी कालिमा स्तर स्तर जमती पीन हुई।
      • घिर रहे थे घुँघराले बाल अंस अव लम्बित मुख के पास। नील घन- शावक से सुकुमार सुधा भरने को विधु के पास॥ और उस मुख पर वह मुसक्यान ! रक्त किसलय पर ले विश्राम अरुण की एक किरण अम्लान अधिक अलसाई हो अभिराम !
      • अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी ! अरी आधि, मधुमय अभिशाप हृदय-गगन में धूमकेतु-सी, पुण्य-सृष्टि में सुंदर पाप। मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चित जाति का जीव अमर मरेगा क्या? तू कितनी गहरी डाल रही है नींव।
      • बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल वह विश्व मुकुट सा उज्ज्वलतम शशिखंड सदृश था स्पष्ट भाल दो पद्म-पलाश चषक-से दृग देते अनुराग विराग ढाल गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश वह आनन जिसमें भरा गान वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान था एक हाथ में कर्म-कलश वसुधा-जीवनरस-सार लिये दूसरा विचारों के नभ को या मधुर अभय अवलंब दिये त्रिवली थी त्रिगुण-तरंगमयी, आलोकवसन लिपटा अराल⁠⁠⁠ चरणों में थी गति भरी ताल ।।
      • नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पदतल में, पीपूष-स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा। संघर्ष सदा उर-अन्तर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा। आंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा।
      • हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खलखेला हरी-भरी-सी दौड़-धूप, ओ जल-माया की चल-रेखा। इस ग्रहकक्षा की हलचल-री तरल गरल की लघु-लहरी, जरा अमर-जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बहरी।
      • विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान; यही दु:ख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”।
      • राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है।
      • “संपूर्ण संसार कर्मण्य वीरों की चित्रशाला है। वीरत्व एक स्वावलंबी गुण है। प्राणियों का विकास संभवतः इसी विचार के ऊर्जित होने से हुआ है। जीवन में वही तो विजयी होता है जो दिन-रात 'युद्धस्व विगतज्वरः’ का शंखनाद सुना करता है।”
      • “अंधकार का आलोक से, असत्‌ का सत्‌ से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत्‌ का अंतर्जगत्‌ से संबंध कौन कराती है? कविता ही न!”
      • “इस गतिशील जगत्‌ में परिवर्तन पर आश्चर्य! परिवर्तन रुका कि महापरिवर्तन --प्रलय हुआ! परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शांति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है। समय पुरुष और स्त्री की गेंद लेकर दोनों हाथ से खेलता है।”
      • “उस हिमालय के ऊपर प्रभात-सूर्य की सुनहरी प्रभा से आलोकित प्रभा का, पीले पोखराज का सा, एक महल था। उसी से नवनीत की पुतली झाँक कर विश्व को देखती थी। वह हिम की शीतलता से सुसंगठित थी। सुनहरी किरणों को जलन हुई। तप्त होकर महल को गला दिया। पुतली! उसका मंगल हो, हमारे अश्रु की शीतलता उसे सुरक्षित रखे। कल्पना की भाषा के पंख गिर जाते हैं, मौन-नीड़ में निवास करने दो। छेड़ो मत मित्र!”
      • “अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है। अपने को नियामक और कर्ता समझने की बलवती स्पृहा उससे बेगार कराती है। उत्सवों में परिचारक और अस्त्रों में ढाल से भी अधिकार-लोलुप मनुष्य क्या अच्छे हैं?”
      • “राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ इसका दायित्व भी बढ़ गया है। पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को अब अनायास और अवश्य अपनी शरण में आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।”
      • “कष्ट हृदय की कसौटी है - तपस्या अग्नि है - सम्राट! यदि इतना भी न कर सके तो क्या! सब क्षणिक सुखों का अंत है। जिसमें सुखों का अंत न हो, इसलिए सुख करना ही न चाहिए। मेरे इस जीवन के देवता और उस जीवन के प्राप्य! क्षमा!”
      • “कवित्व वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, सत्‌ का असत्‌ से, जड़ का चेतन से, और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से सम्बन्ध कौन कराती है? कविता ही न!”
      • “उपनिषदों के 'नेति-नेति' से ही गौतम का अनात्मवाद पूर्ण है। यह प्राचीन महर्षियों का कथित सिद्धान्त 'मध्यमा-प्रतिपदा' के नाम से संसार में प्रचारित हुआ। व्यक्ति-रूप में आत्मा के सदृश कुछ नहीं है।”
      • “कविता करना अनन्त पुण्य का फल है। इस दुराशा और अनन्त उत्कण्ठा से कवि-जीवन व्यतीत करने की इच्छा हुई। संसार के समस्त अभावों को असन्तोष कहकर हृदय को धोखा देता रहा। परन्तु कैसी विडम्बना! लक्ष्मी के लालों का भ्रू-भंग और क्षोभ की ज्वाला के अतिरिक्त मिला क्या! - एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन, जो दूसरों की दया में अपना अस्तित्व रखता है!”
      • “आर्य, रक्तपात शत्रु को पराजित करने का सफल उपाय नहीं। शस्त्र द्वारा शत्रु को वध किया जा सकता है, उसे कुछ काल के लिए वश में किया जा सकता है, परन्तु विजय नहीं किया जा सकता। मनुष्य मृत्यु की अपेक्षा पराभव को केवल कायरता और प्रतिहिंसा की भावना से ही स्वीकार करता है।”
      • जब स्वजन लोग अपने शील-शिष्टाचार का नालन करें—आत्मसमर्पण, सहानुभूति, सत्पथ का अवलंबन करें, तो दुर्दिन का साहस नहीं कि उस कुटुम्ब की ओर आँख उठाकर देखे। इसलिए इस कठोर समय में भगवान्‌ की स्निग्धकरुणा का शीतल ध्यान कर।
      • विजय का क्षणिक उल्लास हृदय की भूख मिटा देगा? कभी नहीं। वीरों का भी क्या ही व्यवसाय है, क्या ही उन्मत्त भावना है। चक्रपालित! संसार में जो सबसे महान है, वह क्या है? त्याग! त्याग का ही दूसरा नाम महत्त्व है। प्राणों का मोह त्याग करना वीरता का रहस्य है।
      • राष्ट्रनीति दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद को समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ उसका दायित्व भी बढ़ गया है; पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को वे अब अनायास और अवश्य अपनी शरण आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।
      • परमात्मशक्ति का उत्थान पतन और पतन का उत्थान किया करती है। इसी का नाम है दम्भ का दमन। स्वयं प्रकृति की नियामिका शक्ति कृत्रिम स्वार्थसिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसा कार्य कोई जानबूझ कर नहीं करता, और न उसका प्रत्यक्ष में कोई कड़ा कारण दिखाई पड़ता है। उलट-फेर को शान्त और विचारशील महापुरुष ही समझते पर उसे रोकना उनके वश की भी बात नहीं है, क्योंकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है।
      • कवित्व वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, असत् का सत् से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से संबंध कौन कराती है, कविता न? (‘स्कन्दगुप्त’ नाटक, जयशंकर प्रसाद, प्रथम अंक, तृतीय दृश्य, पृष्ठ 47)।
      • मेरा साम्राज्य करुणा का था, मेरा धर्म प्रेम का था। आनन्द-समुद्र में शान्ति-द्वीप का अधिवासी ब्राह्मण मैं, चन्द्र-सूर्य-नक्षत्र मेरे दीप थे, अनन्त आकाश वितान था, शस्यश्यामला कोमला विश्वम्भरा मेरी शय्या थी। बौद्धिक विनोद कर्म था, सन्तोष धन था। उस अपनी, ब्राह्मण की, जन्म-भूमि को छोड़कर कहाँ आ गया! सौहार्द के स्थान पर कुचक्र, फूलों के प्रतिनिधि काँटे, प्रेम के स्थान में भय। ज्ञानामृत के परिवर्तन में कुमंत्रणा। पतन और कहाँ तक हो सकता है!
      • मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहा हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
      • मुझे इस देश में जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है। यहाँ के श्यामल-कुंज, घने जंगल सरिताओं की माला पहने हुए शैल-श्रेणी, हरी-भरी वर्षा, गर्मी की चाँदनी, शीत-काल की धूप, और भोले कृषक तथा सरला कृषक-बालिकाएँ, बाल्यकाल की सुनी हुई कहानियों की जीवित प्रतिमाएँ है। यह स्वप्नों का देश, यह त्याग और ज्ञान का पालना, यह प्रेम की रंगभूमि—भारतभूमि क्या भुलायी जा सकती है? कदापि नहीं। अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है; यह भारत मानवता की जन्मभूमि है।
      • परन्तु संसार—कठोर संसार ने सिखा दिया है कि तुम्हें परखना होगा। समझदारी आने पर यौवन चला जाता है—जब तक माला गूँथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चञ्चल स्थिति तब तक उस श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है।
      • ‘तुम मालव हो और यह मागध, यही तुम्हारे मान का अवसान है न? परन्तु आत्म-सम्मान इतने ही से सन्तुष्ट नहीं होगा। मालव और मागध को भूलकर जब तुम आर्यावर्त्त का नाम लोगे, तभी वह मिलेगा। क्या तुम नहीं देखते हो कि आगामी दिवसों में, आर्यावर्त्त के सब स्वतंत्र राष्ट्र एक के अनंतर दूसरे विदेशी विजेता से पददलित होंगे?’
      • मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
      • चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम!
      • अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं।
      • मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की?
      • समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता।
      • समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं।
      • मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
      • चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम!
      • अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं।
      • मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की?
      • समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता।
      • समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं।
    • यशपाल
      • 'दिव्या' के आधार पर यशपाल की विचारधारा पर प्रकाश डालिए।
      • "'दिव्या' उपन्यास का मूल प्रतिपाद्य मार्क्सवादी विचारधारा का प्रतिपादन करना है।" इस मत के पक्ष-विपक्ष में तर्कयुक्त उत्तर देते हुए 'दिव्या' का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
      • "'दिव्या' इतिहास नहीं, ऐतिहासिक कल्पना मात्र है।" इस कथन के आधार पर 'दिव्या' उपन्यास में इतिहास और कल्पना के समन्वय का विवेचन कीजिए।
      • "'दिव्या' ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में व्यक्ति और समाज की प्रवृत्ति और गति का चित्र है।" इस कथन का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए।
      • "'दिव्या' स्त्री स्वतंत्रता का उद्घोष है।" विवेचना कीजिए।
      • ‘दिव्या’ में लेखक की यथार्थभेदी दृष्टि से भारत के स्वर्णकाल का इतिहास विरूपित हुआ है या अभिमण्डित? युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • "'दिव्या' उपन्यास देश की गौरवगाथा मात्र नहीं है, अपितु आगे की दिशा भी तलाशती है।" इस पर विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • "'दिव्या' में यशपाल का वैचारिक हस्तक्षेप उपन्यास के रचना-कौशल का अतिक्रमण करता है" — इस मत का विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।
      • "'दिव्या' ऐतिहासिक नहीं, ऐतिहासिक परिवेश की कथा है।" विवेचना कीजिए।
      • "‘दिव्या’ के औपन्यासिक प्रतिमानों का विश्लेषण करते हुए यशपाल के ऐतिहासिक बोध के दार्शनिक आधार की समीक्षा कीजिए।"
      • 'दिव्या' के आधार पर यशपाल की विचारधारा पर प्रकाश डालिए।
      • "'दिव्या' उपन्यास का मूल प्रतिपाद्य मार्क्सवादी विचारधारा का प्रतिपादन करना है।" इस मत के पक्ष-विपक्ष में तर्कयुक्त उत्तर देते हुए 'दिव्या' का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
      • "'दिव्या' इतिहास नहीं, ऐतिहासिक कल्पना मात्र है।" इस कथन के आधार पर 'दिव्या' उपन्यास में इतिहास और कल्पना के समन्वय का विवेचन कीजिए।
      • "'दिव्या' ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में व्यक्ति और समाज की प्रवृत्ति और गति का चित्र है।" इस कथन का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए।
      • "'दिव्या' स्त्री स्वतंत्रता का उद्घोष है।" विवेचना कीजिए।
      • ‘दिव्या’ में लेखक की यथार्थभेदी दृष्टि से भारत के स्वर्णकाल का इतिहास विरूपित हुआ है या अभिमण्डित? युक्तियुक्त उत्तर दीजिए।
      • "'दिव्या' उपन्यास देश की गौरवगाथा मात्र नहीं है, अपितु आगे की दिशा भी तलाशती है।" इस पर विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • "'दिव्या' में यशपाल का वैचारिक हस्तक्षेप उपन्यास के रचना-कौशल का अतिक्रमण करता है" — इस मत का विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।
      • "'दिव्या' ऐतिहासिक नहीं, ऐतिहासिक परिवेश की कथा है।" विवेचना कीजिए।
      • "‘दिव्या’ के औपन्यासिक प्रतिमानों का विश्लेषण करते हुए यशपाल के ऐतिहासिक बोध के दार्शनिक आधार की समीक्षा कीजिए।"
    • यशपाल की रचनाएँ
      • वह संसार के सुख-दुःख अनुभव करता है। अनुभूति और विचार ही उसकी शक्ति है। उस अनुभूति का ही आदान-प्रदान वह देवी से कर सकता है। वह संसार के धूल-धूसरित मार्ग का पथिक है। उस मार्ग पर देवी के नारीत्व की कामना में वह अपना पुरुषत्व अर्पण करता है। वह आश्रय का आदान-प्रदान चाहता है।
      • परलोक में अधिक भोग का अवसर पाने की कामना से किया गया यह त्याग त्याग नहीं। तुम्हारी आशा और विश्वास के अनुसार यह त्याग भोग की आशा का मूल्य है, भोग की इच्छा है तो साधन रहते भोग करो।
      • जिसे तुम नाश कहती हो, वह केवल परिवर्तन है। अमरता का अर्थ है अपरिवर्तन। कल्पना करो, संसार में कोई भी परिवर्तन न हो? उस संसार में क्या सुख और आकर्षण होगा?
      • आवेग एक वस्तु है, जीवन दूसरी। जीवन जल का पात्र है, आवेग उसमें बुदबुदा मात्र है। जीवन की सफलता के लिए किसी समय आवेग का दमन आवश्यक हो जाता है, जैसे रोग में पथ्य अरुचिकर होने पर भी उपयोगिता के विचार से ग्रहण किया जाता है।
      • दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है?
      • मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रांतर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि के साथ जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली, हरिणों के बच्चे, पशुपाल हैं। ... यहाँ से जाकर मैं अपनी भूमि से उखड़ जाऊँगा।
      • स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी।
      • मनुष्य-समाज समय की नदी के तट पर स्थित वन के समान है। समय की नदी में आने वाले प्लावन इस वन की भूमि को उर्वरा करते रहते हैं। इसी प्रकार सागल के नगर-समाज में परिवर्तन के अनेक प्लावन आये और भावनाओं और अनुभूतियों के उर्वर स्तर समाज की भूमि पर छोड़ते गये।
      • जन-सागर इस घोषणा के झंझावात से तरंगित हो उठा। जन-समूह की ग्रीवाएँ उठ गयीं और दृष्टि मार्ग के पश्चिम छोर की ओर चली गयी। दीपदण्ड-धारी अश्वारोहियों के पीछे रथ चले आ रहे थे और रथों के पीछे फिर दीपदण्ड-धारी अश्वारोही। रथ शीघ्र ही मण्डप के समीप जन-प्रवाह में आ पहुँचे।
      • परिवर्तन ही गति है। गति ही जीवन है। अमरता का अर्थ है- अपरिवर्तन, गतिहीनता। देवी, यदि सूर्य जैसे और जहाँ है, वहीँ स्थिर हो जाए? यदि जलवायु जैसे और जहाँ स्थिर हो जाए, सब स्थिर और अपरिवर्तनशील हो जाएँ तो क्या जीवन काम्य और सुखमय होगा?
      • “आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।”
      • “जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ है।”
      • वह संसार के सुख-दुःख अनुभव करता है। अनुभूति और विचार ही उसकी शक्ति है। उस अनुभूति का ही आदान-प्रदान वह देवी से कर सकता है। वह संसार के धूल-धूसरित मार्ग का पथिक है। उस मार्ग पर देवी के नारीत्व की कामना में वह अपना पुरुषत्व अर्पण करता है। वह आश्रय का आदान-प्रदान चाहता है।
      • परलोक में अधिक भोग का अवसर पाने की कामना से किया गया यह त्याग त्याग नहीं। तुम्हारी आशा और विश्वास के अनुसार यह त्याग भोग की आशा का मूल्य है, भोग की इच्छा है तो साधन रहते भोग करो।
      • जिसे तुम नाश कहती हो, वह केवल परिवर्तन है। अमरता का अर्थ है अपरिवर्तन। कल्पना करो, संसार में कोई भी परिवर्तन न हो? उस संसार में क्या सुख और आकर्षण होगा?
      • आवेग एक वस्तु है, जीवन दूसरी। जीवन जल का पात्र है, आवेग उसमें बुदबुदा मात्र है। जीवन की सफलता के लिए किसी समय आवेग का दमन आवश्यक हो जाता है, जैसे रोग में पथ्य अरुचिकर होने पर भी उपयोगिता के विचार से ग्रहण किया जाता है।
      • दारुण व्यथा और आघात से उसके जड़ मस्तिष्क में केवल एक ही बात स्पष्ट थी – वेश्या स्वतंत्र नारी है। परतंत्र होने के कारण उसके लिए कहीं शरण और स्थान नहीं। दासी होकर वह परतंत्र हो गई? ... वह स्वतंत्र थी ही कब? ... अपनी संतान को पा सकने की स्वतंत्रता के लिए ही उसने दासत्व स्वीकार किया। अपना शरीर बेचकर उसने इच्छा को स्वतंत्र रखना चाहा। परंतु स्वतंत्रता मिली कहाँ? कुल-नारी के लिए स्वतंत्रता कहाँ है?
      • मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रांतर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि के साथ जुड़ा हूँ। उन सूत्रों में तुम हो, यह आकाश और ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली, हरिणों के बच्चे, पशुपाल हैं। ... यहाँ से जाकर मैं अपनी भूमि से उखड़ जाऊँगा।
      • स्थाविर चिबुक की चामत्कारिक औषधि और कांधारी फलों के रस से शरीर में शीघ्र ही रसवृद्धि होकर पृथुसेन की प्राणशक्ति सामर्थ्य अनुभव करने लगी। उसी अनुपात में दिव्या की स्मृति और उसके लिए व्याकुलता का वेग बढ़ने लगा। जीवन का पांसा फेंक कर प्राप्त की हुई सफलता दिव्या के अभाव में उसे निस्सार जान पड़ने लगी।
      • मनुष्य-समाज समय की नदी के तट पर स्थित वन के समान है। समय की नदी में आने वाले प्लावन इस वन की भूमि को उर्वरा करते रहते हैं। इसी प्रकार सागल के नगर-समाज में परिवर्तन के अनेक प्लावन आये और भावनाओं और अनुभूतियों के उर्वर स्तर समाज की भूमि पर छोड़ते गये।
      • जन-सागर इस घोषणा के झंझावात से तरंगित हो उठा। जन-समूह की ग्रीवाएँ उठ गयीं और दृष्टि मार्ग के पश्चिम छोर की ओर चली गयी। दीपदण्ड-धारी अश्वारोहियों के पीछे रथ चले आ रहे थे और रथों के पीछे फिर दीपदण्ड-धारी अश्वारोही। रथ शीघ्र ही मण्डप के समीप जन-प्रवाह में आ पहुँचे।
      • परिवर्तन ही गति है। गति ही जीवन है। अमरता का अर्थ है- अपरिवर्तन, गतिहीनता। देवी, यदि सूर्य जैसे और जहाँ है, वहीँ स्थिर हो जाए? यदि जलवायु जैसे और जहाँ स्थिर हो जाए, सब स्थिर और अपरिवर्तनशील हो जाएँ तो क्या जीवन काम्य और सुखमय होगा?
      • “आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।”
      • “जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ है।”
    • फणीश्वरनाथ रेणु
      • भारतीय ग्रामीण जीवन को वैध सम्मान दिलाने की दृष्टि से ‘मैला आँचल’ उपन्यास की समीक्षा कीजिए।
      • 'मैला आँचल' के आधार पर फणीश्वरनाथ रेणु की कथा-भाषा की समीक्षा कीजिए।
      • आंचलिक उपन्यास के तत्त्वों के आलोक में 'मैला आँचल' उपन्यास की विवेचना कीजिए।
      • 'मैला आँचल' के आधार पर उपन्यासकार की जीवनदृष्टि का परिचय दीजिए।
      • 'मैला आंचल' की राजनीतिक चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • 'मैला आँचल' “ग्राम कथा” की कलात्मक परिणति है या 'आंचलिकता' की स्वतंत्र संरचना? भारतीय आंचलिक उपन्यासों के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिए।
      • उपन्यास की भाषा को कथ्य का अनुसरण करना क्या श्रेयस्कर माना जाएगा? “मैला आँचल” के संदर्भ में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
      • “मैला आँचल में अभिव्यक्त स्त्री-पुरुष संबंध एक नवीन मुक्ति के पक्ष में है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? तार्किक व्याख्या कीजिए।
      • ‘मैला आँचल’ में निहित सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संक्रमण पर प्रकाश डालिए।
      • आंचलिक उपन्यास के रूप में 'मैला आँचल' का मूल्यांकन कीजिए।
      • “इसमें फूल भी हैं शूल भी… मैं किसी से दामन बचाकर नहीं पाया।” — रेणु के इस कथन के आलोक में 'मैला आँचल' का मूल्यांकन कीजिए।
      • “रेणु पाठक को छपे हुए पृष्ठों की सुरक्षित दुनिया से बाहर खींचते हैं…” 'मैला आँचल' के सन्दर्भ में इस वक्तव्य का विवेचन कीजिए।
      • 'मैला आँचल' की आँचलिकता उपन्यास की वस्तु-स्थिति में विचलित होती है या स्थानीयता ही बनी रहती है? समीक्षा कीजिए।
      • 'मैला आँचल' “ग्राम कथा” की नव्य कलात्मक परिणति है। — इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “मैला आंचल” के शीर्षक की सार्थकता पर विचार करते हुए इसके प्रतिपाद्य का विवेचन कीजिए और एक आंचलिक उपन्यास के रूप में इसकी सर्जनात्मक उपलब्धियों का संक्षेप में परिचय दीजिए।
      • 'मैला आँचल' की सफलता में भाषा के योगदान पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट कीजिए कि रेणु बहुत सजग, सृजनशील और प्रयोगशील रहे हैं।
      • ऐतिहासिक उपन्यास लिखने के पीछे यशपाल की विशेष रचना-दृष्टि रही है; 'दिव्या' के आधार पर उक्त विशेष रचना-दृष्टि की आलोचना कीजिए।
      • शिल्प एवं भाषा-शैली की दृष्टि से 'गोदान' और 'मैला आँचल' का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • भारतीय ग्रामों के यथार्थ की दृष्टि से 'गोदान' और 'मैला आँचल' का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • 'मैला आँचल' से व्यक्त जीवन के छंद का विश्लेषण करते हुए उसके नाम की सार्थकता पर विचार कीजिए।
      • “मैला आँचल” उपन्यास में आँचलिक जीवन के साथ व्यापक राष्ट्रीय सन्दर्भों का भी बड़ा जीवन्त चित्रण हुआ है।” इस मत का सतर्क मूल्यांकन कीजिए।
      • भारतीय ग्रामीण जीवन को वैध सम्मान दिलाने की दृष्टि से ‘मैला आँचल’ उपन्यास की समीक्षा कीजिए।
      • 'मैला आँचल' के आधार पर फणीश्वरनाथ रेणु की कथा-भाषा की समीक्षा कीजिए।
      • आंचलिक उपन्यास के तत्त्वों के आलोक में 'मैला आँचल' उपन्यास की विवेचना कीजिए।
      • 'मैला आँचल' के आधार पर उपन्यासकार की जीवनदृष्टि का परिचय दीजिए।
      • 'मैला आंचल' की राजनीतिक चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • 'मैला आँचल' “ग्राम कथा” की कलात्मक परिणति है या 'आंचलिकता' की स्वतंत्र संरचना? भारतीय आंचलिक उपन्यासों के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिए।
      • उपन्यास की भाषा को कथ्य का अनुसरण करना क्या श्रेयस्कर माना जाएगा? “मैला आँचल” के संदर्भ में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
      • “मैला आँचल में अभिव्यक्त स्त्री-पुरुष संबंध एक नवीन मुक्ति के पक्ष में है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? तार्किक व्याख्या कीजिए।
      • ‘मैला आँचल’ में निहित सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संक्रमण पर प्रकाश डालिए।
      • आंचलिक उपन्यास के रूप में 'मैला आँचल' का मूल्यांकन कीजिए।
      • “इसमें फूल भी हैं शूल भी… मैं किसी से दामन बचाकर नहीं पाया।” — रेणु के इस कथन के आलोक में 'मैला आँचल' का मूल्यांकन कीजिए।
      • “रेणु पाठक को छपे हुए पृष्ठों की सुरक्षित दुनिया से बाहर खींचते हैं…” 'मैला आँचल' के सन्दर्भ में इस वक्तव्य का विवेचन कीजिए।
      • 'मैला आँचल' की आँचलिकता उपन्यास की वस्तु-स्थिति में विचलित होती है या स्थानीयता ही बनी रहती है? समीक्षा कीजिए।
      • 'मैला आँचल' “ग्राम कथा” की नव्य कलात्मक परिणति है। — इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • “मैला आंचल” के शीर्षक की सार्थकता पर विचार करते हुए इसके प्रतिपाद्य का विवेचन कीजिए और एक आंचलिक उपन्यास के रूप में इसकी सर्जनात्मक उपलब्धियों का संक्षेप में परिचय दीजिए।
      • 'मैला आँचल' की सफलता में भाषा के योगदान पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट कीजिए कि रेणु बहुत सजग, सृजनशील और प्रयोगशील रहे हैं।
      • ऐतिहासिक उपन्यास लिखने के पीछे यशपाल की विशेष रचना-दृष्टि रही है; 'दिव्या' के आधार पर उक्त विशेष रचना-दृष्टि की आलोचना कीजिए।
      • शिल्प एवं भाषा-शैली की दृष्टि से 'गोदान' और 'मैला आँचल' का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • भारतीय ग्रामों के यथार्थ की दृष्टि से 'गोदान' और 'मैला आँचल' का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • 'मैला आँचल' से व्यक्त जीवन के छंद का विश्लेषण करते हुए उसके नाम की सार्थकता पर विचार कीजिए।
      • “मैला आँचल” उपन्यास में आँचलिक जीवन के साथ व्यापक राष्ट्रीय सन्दर्भों का भी बड़ा जीवन्त चित्रण हुआ है।” इस मत का सतर्क मूल्यांकन कीजिए।
    • फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाएँ
      • नीलोत्पल ! नहीं-नहीं ! यह अँधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूँजती है—पवित्र वाणी! उन्हें प्रकाश मिल गया है। तेजोमय! क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चंदन लेप रहा है। प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय!
      • आज तक वे भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच टुकड़े-टुकड़े हो कर हमेशा घुटने ही टेकते आए हैं। हर बार दिनेश को लड़ाई के मैदान में ले तो ज़रूर गए हैं, पर जैसे ही गोलियाँ चली हैं, उसे वहीं छोड़कर भाग आए हैं अकेला, निहत्था। वह गोलियों की बौछार से लहूलुहान होता रहा है और ये ख़ुद एक असह्य अपराध-बोध से।
      • “मैं फिर काम शुरू करूँगा—यहीं, इसी गाँव में। मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी हुई धरती पर प्यार के पौधे लहलहाएँगे। मैं साधना करूँगा, ग्रामवासिनी भारत माता के मैले आँचल तले!"
      • “मैला आँचल” उपन्यास की भाषा, परिवेश को जीवंत करने में कितनी सफल सिद्ध हुई है? उदाहरण सहित विवेचन कीजिए।
      • विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बड़ा शक्तिशाली है। उसको पराजित करना असंभव है, प्रचण्ड शक्तिशाली बमों से भी नहीं। पागलों! आदमी-आदमी है, गिनीपिग नहीं।... सबरि ऊपर मानुस सत्य!
      • मैं फिर काम शुरू करूंगा यहीं इसी गाँव में, मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी धरती पर प्यार के पौधे लहलहायेंगे। मैं साधना करूँगा, ग्रामवासिनी भारतमाता के मैले आँचल तले। कम से कम एक ही गाँव के कुछ प्राणियों के मुरझाये ओठों पर मुस्कराहट लौटा सकूँ। उनके हृदय में आशा और विश्वास को प्रतिष्ठित कर सकूँ।
      • “विद्यापति कवि के गान कहाँ?" बहुत दिनों बाद मन में उलझे हुए उस प्रश्न का जवाब दिया — ज़िंदगी-भर बेगारी खटने वाले, अपढ़ गँवार और अर्धनग्नों में, कवि! तुम्हारे विद्यापति के गान हमारी टूटी झोपड़ियों में ज़िंदगी के मधुरस बरसा रहे हैं। — ओ कवि! तुम्हारी कविता ने मचल कर एक दिन कहा था — चलो कवि, बनफूलों की ओर!
      • यह अंधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है—पवित्र वाणी। उन्हें प्रकाश मिल गया है। तेजोमय! क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चन्दन लेप रहा है। प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय! विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बढ़कर शक्तिशाली है। उसको पराजित करना असम्भव है। प्रचण्ड शक्तिशाली बमों से भी नहीं ...... पगला आदमी आदमी है, गिनीपिग नहीं। ..... सबरि ऊपर मानुस सत्य!
      • नीलोत्पल ! नहीं-नहीं ! यह अँधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूँजती है—पवित्र वाणी! उन्हें प्रकाश मिल गया है। तेजोमय! क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चंदन लेप रहा है। प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय!
      • आज तक वे भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच टुकड़े-टुकड़े हो कर हमेशा घुटने ही टेकते आए हैं। हर बार दिनेश को लड़ाई के मैदान में ले तो ज़रूर गए हैं, पर जैसे ही गोलियाँ चली हैं, उसे वहीं छोड़कर भाग आए हैं अकेला, निहत्था। वह गोलियों की बौछार से लहूलुहान होता रहा है और ये ख़ुद एक असह्य अपराध-बोध से।
      • “मैं फिर काम शुरू करूँगा—यहीं, इसी गाँव में। मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी हुई धरती पर प्यार के पौधे लहलहाएँगे। मैं साधना करूँगा, ग्रामवासिनी भारत माता के मैले आँचल तले!"
      • “मैला आँचल” उपन्यास की भाषा, परिवेश को जीवंत करने में कितनी सफल सिद्ध हुई है? उदाहरण सहित विवेचन कीजिए।
      • विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बड़ा शक्तिशाली है। उसको पराजित करना असंभव है, प्रचण्ड शक्तिशाली बमों से भी नहीं। पागलों! आदमी-आदमी है, गिनीपिग नहीं।... सबरि ऊपर मानुस सत्य!
      • मैं फिर काम शुरू करूंगा यहीं इसी गाँव में, मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी धरती पर प्यार के पौधे लहलहायेंगे। मैं साधना करूँगा, ग्रामवासिनी भारतमाता के मैले आँचल तले। कम से कम एक ही गाँव के कुछ प्राणियों के मुरझाये ओठों पर मुस्कराहट लौटा सकूँ। उनके हृदय में आशा और विश्वास को प्रतिष्ठित कर सकूँ।
      • “विद्यापति कवि के गान कहाँ?" बहुत दिनों बाद मन में उलझे हुए उस प्रश्न का जवाब दिया — ज़िंदगी-भर बेगारी खटने वाले, अपढ़ गँवार और अर्धनग्नों में, कवि! तुम्हारे विद्यापति के गान हमारी टूटी झोपड़ियों में ज़िंदगी के मधुरस बरसा रहे हैं। — ओ कवि! तुम्हारी कविता ने मचल कर एक दिन कहा था — चलो कवि, बनफूलों की ओर!
      • यह अंधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है—पवित्र वाणी। उन्हें प्रकाश मिल गया है। तेजोमय! क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चन्दन लेप रहा है। प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय! विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बढ़कर शक्तिशाली है। उसको पराजित करना असम्भव है। प्रचण्ड शक्तिशाली बमों से भी नहीं ...... पगला आदमी आदमी है, गिनीपिग नहीं। ..... सबरि ऊपर मानुस सत्य!
    • मन्नू भण्डारी
      • "‘महाभोज’ उपन्यास राजनीति और अपराध के आपसी गठजोड़ पर करारा प्रहार करता है" — स्पष्ट कीजिए।
      • "मन्नू भण्डारी रचित ‘महाभोज’ उपन्यास राजनीति में पिसते दलित समाज की दास्ताँ का जीवंत दस्तावेज है।" इसे स्पष्ट कीजिए।
      • “‘महाभोज' उपन्यास राजनीतिक विकृतियों का सच्चा दस्तावेज़ है।” इस कथन से आप कितने सहमत हैं, तर्कसंगत मीमांसा कीजिए।
      • ‘महाभोज’ उपन्यास के नामकरण की सार्थकता पर विचार कीजिए।
      • ‘महाभोज’ की मूल संवेदना को स्पष्ट कीजिए।
      • ‘महाभोज’ में समसामयिक अव्यवस्था का मात्र निदान है अथवा विधेयात्मक समाधान भी? तर्कपूर्वक समझाइए।
      • “‘महाभोज’ स्वातंत्योत्तर भारतीय राजनीति की विकृति के पर्दाफाश का ज्वलंत दस्तावेज है।” तर्क एवं उदाहरण सहित सिद्ध कीजिए।
      • “महाभोज” उपन्यास को क्या एक सशक्त राजनीतिक उपन्यास का दर्जा दिया जा सकता है? उपन्यास में चित्रित पात्रों के आधार पर समीक्षा कीजिए।
      • एक राजनैतिक उपन्यास के रूप में ‘महाभोज’ का विवेचन कीजिए।
      • “‘महाभोज’ उपन्यास में हमारे वर्तमान समाज और राजनीति का नकारात्मक यथार्थ-वर्णन तो विश्वसनीय बन पड़ा है, लेकिन सकारात्मक पहलू हवाई आदर्श बन गया है।” — इस टिप्पणी के संदर्भ में तर्कपूर्ण पक्ष प्रस्तुत कीजिए।
      • “‘महाभोज’ में समकालीन दलगत राजनीति का जन-विरोधी चरित्र विश्वसनीय तरीके से उभारा गया है।” — इस बात की परीक्षा कीजिए।
      • राजनीति और अपराध के आपसी सम्बन्धों की औपन्यासिक प्रस्तुति के रूप में ‘महाभोज’ पर विचार कीजिए।
      • "‘महाभोज’ उपन्यास राजनीति और अपराध के आपसी गठजोड़ पर करारा प्रहार करता है" — स्पष्ट कीजिए।
      • "मन्नू भण्डारी रचित ‘महाभोज’ उपन्यास राजनीति में पिसते दलित समाज की दास्ताँ का जीवंत दस्तावेज है।" इसे स्पष्ट कीजिए।
      • “‘महाभोज' उपन्यास राजनीतिक विकृतियों का सच्चा दस्तावेज़ है।” इस कथन से आप कितने सहमत हैं, तर्कसंगत मीमांसा कीजिए।
      • ‘महाभोज’ उपन्यास के नामकरण की सार्थकता पर विचार कीजिए।
      • ‘महाभोज’ की मूल संवेदना को स्पष्ट कीजिए।
      • ‘महाभोज’ में समसामयिक अव्यवस्था का मात्र निदान है अथवा विधेयात्मक समाधान भी? तर्कपूर्वक समझाइए।
      • “‘महाभोज’ स्वातंत्योत्तर भारतीय राजनीति की विकृति के पर्दाफाश का ज्वलंत दस्तावेज है।” तर्क एवं उदाहरण सहित सिद्ध कीजिए।
      • “महाभोज” उपन्यास को क्या एक सशक्त राजनीतिक उपन्यास का दर्जा दिया जा सकता है? उपन्यास में चित्रित पात्रों के आधार पर समीक्षा कीजिए।
      • एक राजनैतिक उपन्यास के रूप में ‘महाभोज’ का विवेचन कीजिए।
      • “‘महाभोज’ उपन्यास में हमारे वर्तमान समाज और राजनीति का नकारात्मक यथार्थ-वर्णन तो विश्वसनीय बन पड़ा है, लेकिन सकारात्मक पहलू हवाई आदर्श बन गया है।” — इस टिप्पणी के संदर्भ में तर्कपूर्ण पक्ष प्रस्तुत कीजिए।
      • “‘महाभोज’ में समकालीन दलगत राजनीति का जन-विरोधी चरित्र विश्वसनीय तरीके से उभारा गया है।” — इस बात की परीक्षा कीजिए।
      • राजनीति और अपराध के आपसी सम्बन्धों की औपन्यासिक प्रस्तुति के रूप में ‘महाभोज’ पर विचार कीजिए।
    • मन्नू भण्डारी की रचनाएँ
      • आप लोगों की नाराज़गी मुझ पर है तो मुझे ही झेलनी चाहिए और अकेले ही झेलनी चाहिए। दूसरों को इसमें साझीदार बनाना तो दूसरों के साथ अन्याय होगा। कुछ समय पहले आप लोगों ने अपना प्यार और विश्वास दिया था मुझे। मैंने सिर-आँखों पर ही लिया था उसे। आज यदि आप अपनी नाराज़गी देंगे तो उसे भी सिर-आँखों पर ही लूँगा। मेरी गलती पर नाराज़ होना आपका अधिकार है और उसे झेलना मेरा कर्तव्य।
      • यह तुम नहीं, तुम्हारा स्वार्थ बोल रहा है। स्वार्थ को इतनी छूट देना ठीक नहीं कि वह विवेक को ही खा जाये। अखबारों को तो आजाद रहना ही चाहिए। वे ही तो हमारे कामों को, हमारी बातों का असली दर्पण होते हैं। मेरा तो उसूल है कि दर्पण को धुँधला मत होने दो। हाँ, अपनी छवि देखने का साहस होना चाहिए आदमी में।
      • यह तो सुकुल बाबू ही हैं कि टिके हुए हैं। केवल टिके हुए ही नहीं, सबको ठिकाने लेकर टिके हुए हैं। पर मन बेहद क्षुब्ध हो गया है उनका। उन्हें ख़ुद लगने लगा कि राजनीति गुण्डागर्दी के निकट चली गई है। जिस देश में देवतुल्य राजनेताओं की परम्परा रही हो, वहां राजनीति का ऐसा पतन!
      • सुकुल बाबू ने खड़े होकर ही इस चुनाव को इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया है। सीट केवल एक, पर पूरे मंत्रिमण्डल के लिए जैसे एकदम निर्णायक! यही कारण है कि आज हर घटना को इस सीट से जोड़कर ही देखा-परखा जा रहा है। वरना और दिन होते तो क्या बिसू और बिसू की मौत!
      • आलोच्य उपन्यास के परिवेश में शशि-शेखर के संबंध में भाई-बहन का रूप मिलता है या प्रेमी-प्रेयसी का रूप या अखंड विश्वास में बँधे दो प्राणियों में इन दोनों रूपों से परे का—इस मतवैभित्र्य पर आप अपना पक्ष तर्क-प्रमाणपूर्वक दें।
      • आप लोगों की नाराज़गी मुझ पर है तो मुझे ही झेलनी चाहिए और अकेले ही झेलनी चाहिए। दूसरों को इसमें साझीदार बनाना तो दूसरों के साथ अन्याय होगा। कुछ समय पहले आप लोगों ने अपना प्यार और विश्वास दिया था मुझे। मैंने सिर-आँखों पर ही लिया था उसे। आज यदि आप अपनी नाराज़गी देंगे तो उसे भी सिर-आँखों पर ही लूँगा। मेरी गलती पर नाराज़ होना आपका अधिकार है और उसे झेलना मेरा कर्तव्य।
      • यह तुम नहीं, तुम्हारा स्वार्थ बोल रहा है। स्वार्थ को इतनी छूट देना ठीक नहीं कि वह विवेक को ही खा जाये। अखबारों को तो आजाद रहना ही चाहिए। वे ही तो हमारे कामों को, हमारी बातों का असली दर्पण होते हैं। मेरा तो उसूल है कि दर्पण को धुँधला मत होने दो। हाँ, अपनी छवि देखने का साहस होना चाहिए आदमी में।
      • यह तो सुकुल बाबू ही हैं कि टिके हुए हैं। केवल टिके हुए ही नहीं, सबको ठिकाने लेकर टिके हुए हैं। पर मन बेहद क्षुब्ध हो गया है उनका। उन्हें ख़ुद लगने लगा कि राजनीति गुण्डागर्दी के निकट चली गई है। जिस देश में देवतुल्य राजनेताओं की परम्परा रही हो, वहां राजनीति का ऐसा पतन!
      • सुकुल बाबू ने खड़े होकर ही इस चुनाव को इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया है। सीट केवल एक, पर पूरे मंत्रिमण्डल के लिए जैसे एकदम निर्णायक! यही कारण है कि आज हर घटना को इस सीट से जोड़कर ही देखा-परखा जा रहा है। वरना और दिन होते तो क्या बिसू और बिसू की मौत!
      • आलोच्य उपन्यास के परिवेश में शशि-शेखर के संबंध में भाई-बहन का रूप मिलता है या प्रेमी-प्रेयसी का रूप या अखंड विश्वास में बँधे दो प्राणियों में इन दोनों रूपों से परे का—इस मतवैभित्र्य पर आप अपना पक्ष तर्क-प्रमाणपूर्वक दें।
    • राजेन्द्र यादव
      • ‘भोलाराम का जीव’ कहानी के माध्यम से हरिशंकर परसाई की व्यंग्य चेतना स्पष्ट कीजिए।
      • "राजेन्द्र यादव एक प्रयोगधर्मी कहानीकार हैं" — इस कथन की ‘टूटना’ कहानी के आधार पर तर्कसंगत दृष्टि से विचार कीजिए।
      • ‘भोलाराम का जीव’ के माध्यम से हरिशंकर परसाई की व्यंग्य चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • ‘जिंदगी और जोंक’ में रजुआ की जिजीविषा पर प्रकाश डालिए।
      • “दूध और दवा” कहानी की मूल संवेदना आदर्श और यथार्थ के द्वंद एवं संघर्ष से निर्मित है। — इस कथन के संदर्भ में कहानी की समीक्षा कीजिए।
      • “नन्हो” कहानी की भाषा ग्रामीण मुहावरों और शब्दों से युक्त जीवंत भाषा है। इस कथन के आलोक में कहानी के भाषा-सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए।
      • प्रवृत्तिगत दृष्टि से क्या नई कहानी पूर्ववर्ती कहानी की मात्र निरंतरता है या विच्छेद? तर्क सम्मत उत्तर दीजिए।
      • राजेन्द्र यादव की कहानियों में समकालीनता का स्वर है, प्रतिपादित कीजिए।
      • राजेन्द्र यादव की कहानियों की विशेषताएँ बताइए।
      • इस बात पर सम्यक्‌ रूप से विचार कीजिए कि नई कहानी की ‘बाला’ अनुभव से स्वयं गुजरने की यात्रा है।
      • नयी कहानी ने पूर्ववर्ती कहानी का कहाँ, किस रूप में अतिक्रमण किया है? ‘एक दुनिया समानांतर’ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
      • एक कहानी संग्रह को संपादक ने ‘एक दुनिया समानांतर’ क्यों कहा है? स्पष्ट कीजिए।
      • “एक दुनिया समानांतर” की किसी एक कहानी की समीक्षा कीजिए।
      • ‘एक दुनिया समानांतर’ को ध्यान में रखते हुए नयी कहानी की मुख्य विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
      • राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित कहानी-संग्रह ‘एक दुनिया समानांतर’ में से आप किस कहानी को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं? कहानी-कला के आधार पर अपने मत का सप्रमाण विवेचन कीजिए।
      • ‘भोलाराम का जीव’ कहानी के माध्यम से हरिशंकर परसाई की व्यंग्य चेतना स्पष्ट कीजिए।
      • "राजेन्द्र यादव एक प्रयोगधर्मी कहानीकार हैं" — इस कथन की ‘टूटना’ कहानी के आधार पर तर्कसंगत दृष्टि से विचार कीजिए।
      • ‘भोलाराम का जीव’ के माध्यम से हरिशंकर परसाई की व्यंग्य चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • ‘जिंदगी और जोंक’ में रजुआ की जिजीविषा पर प्रकाश डालिए।
      • “दूध और दवा” कहानी की मूल संवेदना आदर्श और यथार्थ के द्वंद एवं संघर्ष से निर्मित है। — इस कथन के संदर्भ में कहानी की समीक्षा कीजिए।
      • “नन्हो” कहानी की भाषा ग्रामीण मुहावरों और शब्दों से युक्त जीवंत भाषा है। इस कथन के आलोक में कहानी के भाषा-सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए।
      • प्रवृत्तिगत दृष्टि से क्या नई कहानी पूर्ववर्ती कहानी की मात्र निरंतरता है या विच्छेद? तर्क सम्मत उत्तर दीजिए।
      • राजेन्द्र यादव की कहानियों में समकालीनता का स्वर है, प्रतिपादित कीजिए।
      • राजेन्द्र यादव की कहानियों की विशेषताएँ बताइए।
      • इस बात पर सम्यक्‌ रूप से विचार कीजिए कि नई कहानी की ‘बाला’ अनुभव से स्वयं गुजरने की यात्रा है।
      • नयी कहानी ने पूर्ववर्ती कहानी का कहाँ, किस रूप में अतिक्रमण किया है? ‘एक दुनिया समानांतर’ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
      • एक कहानी संग्रह को संपादक ने ‘एक दुनिया समानांतर’ क्यों कहा है? स्पष्ट कीजिए।
      • “एक दुनिया समानांतर” की किसी एक कहानी की समीक्षा कीजिए।
      • ‘एक दुनिया समानांतर’ को ध्यान में रखते हुए नयी कहानी की मुख्य विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
      • राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित कहानी-संग्रह ‘एक दुनिया समानांतर’ में से आप किस कहानी को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं? कहानी-कला के आधार पर अपने मत का सप्रमाण विवेचन कीजिए।
    • राजेन्द्र यादव की रचनाएँ
      • और यह राजधानी ! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ..... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं, जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचाती। उन सड़कों के किनारे घर हैं, बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता।
      • एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रान्त भावना चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा में झुकी हुई वीपिंग 'विलो' की काँपती टहनियाँ, पैरों तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़-खड़—वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिटरी का खाकी हैट लिए खड़ा है—चौड़े, उठे सबल कन्धे, अपना सिर वहाँ टिका दो तो जैसे सिमटकर खो जायगा....।
      • “क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गये पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में मेरे सब गहने बेचकर हम लोग खा गए। फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। फाके होने लगे थे। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।''
      • याद वह करती है, किंतु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल भरे शीशे को साफ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता। सिर्फ उस दर्द को याद करती है, जो पहले कभी होता था। तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है।
      • और यह राजधानी! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचातीं। उन सड़कों के किनारे घर हैं; बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। उन घरों के बाहर फाटक हैं, जिन पर कुत्तों से सावधान रहने की चेतावनी है, फूल तोड़ने की मनाही है और घंटी बजाकर इन्तजार करने की मजबूरी है।
      • 'लीड काइंडली लाइट'—संगीत के सुर मानों एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अबाध शून्यता में बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लंबे चौकोर शीशों पर झिलमिला रही है जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसा-मसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है।
      • पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस मेरी बाहों की जकड़ कसती जाती है; कसती जाती है। रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था।
      • दोपहर की उस घड़ी में मीडोज अलसाया-सा ऊँघता जान पड़ता था। जब हवा का कोई भूला-भटका झोंका आ जाता था, तब चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर उड़कर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था। किन्तु जंगल की खामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाजें नीरवता के हल्के झीने परदे पर सलवटें बिछा जाती हैं, मूक लहरों-सी तिरती हैं, मानों कोई दबे पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है—देखो, मैं यहाँ हूँ।
      • कलाकार के लिए कला की अन्तःशक्ति के उद्बोधन के बाद सबसे महत्वपूर्ण विभूति है कला के प्रति एक पवित्र आदरभाव; उसी प्रकार क्रांतिकारी के लिए क्रांति की अन्तःशक्ति के बाद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है क्रान्तिकारिता के, विद्रोह-भावना के प्रति एक पूजा भाव। इसी के द्वारा उसमें इतनी सामर्थ्य आती है कि वह अपने कार्य में अपने को खोकर, उसमें अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्णत: लवलीन करके भी उसकी तटस्थ विवेचना कर सकता है; इसी के द्वारा, वह बहता है तो अपनी इच्छा से बहता है, मरता है तो आत्म-बलिदान की भावना से मरता है, संसार में अपने को सुलाता है तो अपने व्यक्तित्व को पहचानकर।
      • मैं सोचता हूं कि यद्यपि हमारा सिद्धान्त इस बात को स्वतः मान लेता है कि मानव की प्रत्येक प्रेरणा किसी भौतिक जरूरत से उत्पन्न होती है, तथापि हम इस बात में भी अखण्ड विश्वास करते हैं कि मानव में कोई ऊर्ध्वगामी शक्ति है, कोई नसर्गिक सत्प्रेरणा! इन दो परस्पर विरोधी मूल तत्वों का हल करना ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसके हल हो जाने के बाद अन्य प्रश्नों का तो कोई विशेष महत्व रहता ही नहीं; पर यह एक प्रश्न ही इतना बड़ा, इतना गूढ़ और इतना व्यापक है कि हमें पद-पद पर इसके उदाहरण मिलते हैं, हम सारा जीवन ही इसके हल में बिता देते हैं, और फिर भी समस्या वैसी ही रह जानी है।
      • नियमों के अनुसार चलना आसान है और संसार ऐसे व्यक्तियों का आदर भी करता है, जो नियमानुसार चलते हैं। किन्तु जीवन बाध्य नहीं है कि वह आसान हो या आदर की पात्रता दे? जीवन इससे परे है, नियमों में नहीं बंधता और यशोलिप्सा से ऊँचा है..... जो नियमों से नहीं चलते, किन्तु नियमों की मूल प्रेरणा को समझकर अपना नियम स्वयं बनाते हैं, जीवन तो उन्हीं का है।
      • और यह राजधानी ! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ..... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं, जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचाती। उन सड़कों के किनारे घर हैं, बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता।
      • एक पगली-सी स्मृति, एक उद्भ्रान्त भावना चैपल के शीशों के परे पहाड़ी सूखी हवा में झुकी हुई वीपिंग 'विलो' की काँपती टहनियाँ, पैरों तले चीड़ के पत्तों की धीमी-सी चिर-परिचित खड़-खड़—वहीं पर गिरीश एक हाथ में मिलिटरी का खाकी हैट लिए खड़ा है—चौड़े, उठे सबल कन्धे, अपना सिर वहाँ टिका दो तो जैसे सिमटकर खो जायगा....।
      • “क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गये पेंशन पर बैठे, पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब नहीं आता था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में मेरे सब गहने बेचकर हम लोग खा गए। फिर बर्तन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। फाके होने लगे थे। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।''
      • याद वह करती है, किंतु जैसे किसी पुरानी तस्वीर के धूल भरे शीशे को साफ कर रही हो। अब वैसा दर्द नहीं होता। सिर्फ उस दर्द को याद करती है, जो पहले कभी होता था। तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है।
      • और यह राजधानी! जहाँ सब अपना है, अपने देश का है ... पर कुछ भी अपना नहीं है, अपने देश का नहीं है। तमाम सड़कें हैं जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़कें कहीं नहीं पहुँचातीं। उन सड़कों के किनारे घर हैं; बस्तियाँ हैं पर किसी भी घर में वह नहीं जा सकता। उन घरों के बाहर फाटक हैं, जिन पर कुत्तों से सावधान रहने की चेतावनी है, फूल तोड़ने की मनाही है और घंटी बजाकर इन्तजार करने की मजबूरी है।
      • 'लीड काइंडली लाइट'—संगीत के सुर मानों एक ऊँची पहाड़ी पर चढ़कर हाँफती हुई साँसों को आकाश की अबाध शून्यता में बिखेरते हुए नीचे उतर रहे हैं। बारिश की मुलायम धूप चैपल के लंबे चौकोर शीशों पर झिलमिला रही है जिसकी एक महीन चमकीली रेखा ईसा-मसीह की प्रतिमा पर तिरछी होकर गिर रही है।
      • पर मुझसे कुछ नहीं बोला जाता। बस मेरी बाहों की जकड़ कसती जाती है; कसती जाती है। रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे तन-मन पर छा जाती है। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था।
      • दोपहर की उस घड़ी में मीडोज अलसाया-सा ऊँघता जान पड़ता था। जब हवा का कोई भूला-भटका झोंका आ जाता था, तब चीड़ के पत्ते खड़खड़ा उठते थे। कभी कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने झाड़ियों से उड़कर नाले के किनारे बैठ जाता था, पानी में सिर डुबोता था, फिर उड़कर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबक जाता था। किन्तु जंगल की खामोशी शायद कभी चुप नहीं रहती। गहरी नींद में डूबी सपनों-सी कुछ आवाजें नीरवता के हल्के झीने परदे पर सलवटें बिछा जाती हैं, मूक लहरों-सी तिरती हैं, मानों कोई दबे पाँव झाँककर अदृश्य संकेत कर जाता है—देखो, मैं यहाँ हूँ।
      • कलाकार के लिए कला की अन्तःशक्ति के उद्बोधन के बाद सबसे महत्वपूर्ण विभूति है कला के प्रति एक पवित्र आदरभाव; उसी प्रकार क्रांतिकारी के लिए क्रांति की अन्तःशक्ति के बाद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है क्रान्तिकारिता के, विद्रोह-भावना के प्रति एक पूजा भाव। इसी के द्वारा उसमें इतनी सामर्थ्य आती है कि वह अपने कार्य में अपने को खोकर, उसमें अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्णत: लवलीन करके भी उसकी तटस्थ विवेचना कर सकता है; इसी के द्वारा, वह बहता है तो अपनी इच्छा से बहता है, मरता है तो आत्म-बलिदान की भावना से मरता है, संसार में अपने को सुलाता है तो अपने व्यक्तित्व को पहचानकर।
      • मैं सोचता हूं कि यद्यपि हमारा सिद्धान्त इस बात को स्वतः मान लेता है कि मानव की प्रत्येक प्रेरणा किसी भौतिक जरूरत से उत्पन्न होती है, तथापि हम इस बात में भी अखण्ड विश्वास करते हैं कि मानव में कोई ऊर्ध्वगामी शक्ति है, कोई नसर्गिक सत्प्रेरणा! इन दो परस्पर विरोधी मूल तत्वों का हल करना ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसके हल हो जाने के बाद अन्य प्रश्नों का तो कोई विशेष महत्व रहता ही नहीं; पर यह एक प्रश्न ही इतना बड़ा, इतना गूढ़ और इतना व्यापक है कि हमें पद-पद पर इसके उदाहरण मिलते हैं, हम सारा जीवन ही इसके हल में बिता देते हैं, और फिर भी समस्या वैसी ही रह जानी है।
      • नियमों के अनुसार चलना आसान है और संसार ऐसे व्यक्तियों का आदर भी करता है, जो नियमानुसार चलते हैं। किन्तु जीवन बाध्य नहीं है कि वह आसान हो या आदर की पात्रता दे? जीवन इससे परे है, नियमों में नहीं बंधता और यशोलिप्सा से ऊँचा है..... जो नियमों से नहीं चलते, किन्तु नियमों की मूल प्रेरणा को समझकर अपना नियम स्वयं बनाते हैं, जीवन तो उन्हीं का है।
    • हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान
      • हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान।
      • हिन्दी के विकास में अपभ्रंश के योगदान का आकलन कीजिए।
      • हिन्दी के विकास में अपभ्रंश की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
      • हिन्दी भाषा के विकास में अपभ्रंश के योगदान का विवेचन कीजिए।
      • हिन्दी भाषा के विकास में अपभ्रंश के योगदान पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी भाषा के विकास में अपभ्रंश के योगदान पर विचार दीजिए।
      • हिन्दी भाषा के विकास में अपभ्रंश के योगदान पर विचार कीजिए।
      • अपभ्रंश का भाषिक परिचय देते हुए, हिन्दी के विकास में उसकी भूमिका को सोदाहरण विश्लेषित कीजिए।
      • हिन्दी साहित्य पर अपभ्रंश का प्रभाव।
      • हिन्दी भाषा और साहित्य को अपभ्रंश के योगदान पर प्रकाश डालिए।
    • अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिन्दी: सम्बन्ध और अंतर
      • अपभ्रंश और अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना के मुख्य अंतर
      • अपभ्रंश और अवहट्ठ का तुलनात्मक मूल्यांकन।
      • अपभ्रंश और अवहट्ट का पारस्परिक सम्बन्ध।
      • अपभ्रंश और अलंकृत।
      • हिन्दी भाषा के विकास में व्याकरणिक और शाब्दिक दृष्टियों से अपभ्रंश और अवहट्ठ भाषाओं के योगदान पर प्रकाश डालिए।
      • अवहट्ट का व्याकरणिक स्वरूप एवं अपभ्रंश के विकास में उसकी स्थिति को स्पष्ट करते हुए हिन्दी में उसका योगदान निरूपित कीजिए।
      • अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में प्रमुख अंतर।
      • आरंभिक हिन्दी के विकास में अपभ्रंश की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
      • परवर्ती अपभ्रंश ने हिन्दी भाषा के प्रारम्भिक रूप को व्याकरणिक स्तर पर किस प्रकार प्रभावित किया? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
      • परवर्ती अपभ्रंश से विकासमान प्रारम्भिक हिन्दी की व्याकरणिक एवं शब्दकोशगत विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
      • भाषिक विकास प्रक्रिया की दृष्टि से अपभ्रंश और पुरानी हिंदी के अन्तः सम्बन्धो की घनिष्ठता पर प्रकाश डालिए।
      • परवर्ती अपभ्रंश से पुरानी हिन्दी के संरचनात्मक विकास की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
      • अपभ्रंश एवं प्रारम्भिक हिन्दी की व्याकरण-संबंधी विशेषताएं बताते हुए दोनों भाषाओं का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
      • 'अवहट्ठ'' की विशेषताएँ समझाते हुए आदिकालीन हिन्दी में उसके महत्त्व पर विचार कीजिए।
      • अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिन्दी के सम्बन्धों पर टिप्पणी कीजिए।
      • अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिन्दी – इन तीनों में परस्पर क्या सम्बन्ध है? इनकी सूक्ष्म भाषायी सीमा- रेखाओं को स्पष्ट कीजिए।
    • स्वतंत्रता आन्दोलन में हिन्दी की भूमिका
      • स्वाधीनता आंदोलन की संघर्ष भाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा पर विचार कीजिए।
      • भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की राष्ट्रीय चेतना की मुखर अभिव्यक्ति हिन्दी साहित्य में हुई है - सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
      • “स्वातंत्र्य-संग्राम में राष्ट्रभाषा हिन्दी की विशिष्ट भूमिका रही है।” - स्पष्ट कीजिए।
    • हिन्दी की वर्तमान स्थिति
      • स्वाधीन भारत में हिंदी-प्रयोग के नवीन आयाम पर प्रकाश डालिए।
      • स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिंदी के विकास में आने वाली चुनौतियाँ।
      • स्वातंत्रयोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति।
      • स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं ? स्पष्ट कीजिए।
      • स्वाधीन भारत में हिंदी-प्रयोग के नवीन आयाम पर प्रकाश डालिए।
      • स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिंदी के विकास में आने वाली चुनौतियाँ।
      • स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति।
      • स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं? स्पष्ट कीजिए।
    • राजभाषा के रूप में हिन्दी: संवैधानिक स्थिति
      • 'राजभाषा की संवैधानिक स्थिति' पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
      • इस तथ्य की समीक्षा कीजिए कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत राजभाषा की प्रगति कहाँ तक हो पायी है।
      • राजभाषा-सम्बन्धी संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए बताइए कि इनका सही क्रियान्वयन किस प्रकार संभव है।
      • राजभाषा के रूप में हिन्दी की संवैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए बताइए कि उसके संवर्धन के ठोस उपाय क्या हो सकते हैं।
      • राजभाषा हिन्दी की संवैधानिक स्थिति बताते हुए, उसके उचित संवर्धन के उपाय सुझाइये।
    • देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता
      • देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता।
      • देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता।
      • वैज्ञानिक लिपि के रूप में देवनागरी लिपि के वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
      • देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता।
      • देवनागरी लिपि को किस रूप में वैज्ञानिक लिपि कहा जा सकता है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
      • देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता के प्रमुख आधार बिन्दुओं का उल्लेख करते हुए बताइएं कि हिन्दी के मानक रूप की प्रतिष्ठा में उसका (लिपिकां) क्या योग रहा है?
    • नागरी लिपि के लिए अपेक्षित सुधार
      • नागरी लिपि की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उसमें अपेक्षित सुधारों पर प्रकाश डालिए।
      • भाषा के आधुनिकीकरण की त्वरित अवस्था के संदर्भ में देवनागरी लिपि के लिए वांछित मानकता पर विचार कीजिए।
      • सर्वमान्य लिपि के रूप में स्वीकृति के लिए देवनागरी लिपि में किन सुधारों की अपेक्षा है। सुझाव दीजिए।
      • 'देवनागरी लिपि में कुछ सुधार अपेक्षित हैं, जिससे वह अपने मूल रूप को खोए बिना, अधिक सुविधाजनक हो सके। अपना सुविचारित मत दीजिए।
    • नागरी लिपि के कम्प्यूटरीकरण के लिए अपेक्षित सुधार
      • राजभाषा हिन्दी विषयक कंप्यूटर साधित कार्यक्रमों का परिचय दीजिए।
      • देवनागरी लिपि के मानकीकरण के लिए किए गए प्रयत्नों को स्पष्ट करते हुए संगणक यंत्र (कम्प्यूटर) एवं आधुनिक दूरसंचार सुविधाओं को दृष्टि में रखते हुए उसमें आवश्यक सुधारों पर प्रकाश डालिए।
      • देवनागरी लिपि के कम्प्यूटरीकरण के लिए अपेक्षित सुधारों के सुझाव दीजिए।
    • ब्रजभाषा और अवधी का विकास (साहित्यिक भाषा के रूप में)
      • साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज के विकास में मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों के योगदान पर प्रकाश डालिए।
      • मध्यकाल में साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रज का विकास।
      • साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रजभाषा के स्वरूपगत विकास का वर्णन कीजिए।
      • ब्रजभाषा के स्वरूपगत विकास का परिचय दीजिए।
      • साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रजभाषा के अखिल भारतीय विस्तार पर प्रकाश डालिए।
      • मध्यकाल में साहित्यिक भाषा के रूप में अवध के विकास की विवेचना कीजिए।
      • साहित्यिक भाषा के रूप में अवध के स्वरूपगत विकास का विवेचन कीजिए।
      • साहित्यिक अवध के स्वरूपगत विकास का उल्लेख उदाहरण सहित कीजिए।
      • मध्ययुगीन साहित्यिक अवध के स्वरूपगत विकास को सोदाहरण समझाए।
      • मध्यकाल में साहित्यिक भाषा के रूप में अवध के विकास की विवेचना कीजिए।
      • साहित्यिक भाषा के रूप में अवध के स्वरूपगत विकास का विवेचन कीजिए।
      • साहित्यिक अवध के स्वरूपगत विकास का उल्लेख उदाहरण सहित कीजिए।
      • मध्ययुगीन साहित्यिक अवध के स्वरूपगत विकास को सोदाहरण समझाए।
    • ब्रजभाषा और अवधी का विकास (काव्यभाषा के रूप में)
      • आधुनिक काल में काव्य-भाषा के रूप में खड़ी बोली का विकास ब्रज के स्थान पर क्यों हुआ - इस कथन की तर्कपूर्ण व्याख्या कीजिए।
      • मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में अवध का विकास।
      • मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में अवध के विकास को विवेचित कीजिए।
      • मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में अवध का विकास।
      • मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में अवध के विकास को विवेचित कीजिए।
    • ब्रजभाषा और अवधी का योगदान
      • ब्रजभाषा की अवस्थिति में निहित गंभीर कलात्मकता की पहचान को मध्यकालीन साहित्य की विशिष्टता के रूप में कहाँ तक आरेखित किया जा सकता है? आलोचना लिखिए।
      • अवध भाषा की अखिल भारतीय लोकप्रियता के कारणों का विवेचन कीजिए।
      • साहित्यिक भाषा के रूप में अवध के महत्त्व का आकलन कीजिए।
      • हिन्दी के विकास में अवध के योगदान की समीक्षा कीजिए।
      • अवध भाषा का साहित्यिक योगदान।
      • मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में अवध की शक्ति और सीमा का विवेचन कीजिए।
      • लोकमंगल की अवधारणा को प्रसारित करने में अवध के योगदान पर प्रकाश डालिए।
      • अवध भाषा की अखिल भारतीय लोकप्रियता के कारणों का विवेचन कीजिए।
      • साहित्यिक भाषा के रूप में अवध के महत्त्व का आकलन कीजिए।
      • हिन्दी के विकास में अवध के योगदान की समीक्षा कीजिए।
      • अवध भाषा का साहित्यिक योगदान।
      • मध्यकाल में काव्यभाषा के रूप में अवध की शक्ति और सीमा का विवेचन कीजिए।
      • लोकमंगल की अवधारणा को प्रसारित करने में अवध के योगदान पर प्रकाश डालिए।
      • मध्यकाल में ब्रजभाषा और अवधी का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास पर प्रकाश डालिए।
      • अवधी तथा ब्रजभाषा के स्वरुप का अंतर स्पष्ट करते हुए, हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में अवधी अथवा ब्रजभाषा का योगदान निरूपित कीजिए।
      • संत साहित्य में अवधी का योगदान।
    • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली और नागरी लिपि की स्थिति और स्वरूप
      • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए।
      • उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की स्थिति।
      • भारतेंदु-युग में खड़ी बोली का स्वरूप।
      • उन्नीसवीं शताब्दी में नागरी लिपि की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
    • खड़ी बोली और नागरी लिपि की व्याकरणिक विशेषताएँ
      • खड़ी बोली हिन्दी की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • खड़ी बोली की व्याकरणिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
      • खड़ी बोली की व्याकरणिक विशेषताएँ।
      • देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली खड़ी बोली हिन्दी के मानक रूप का, उसकी व्याकरणगत विशेषताओं के साथ, विवेचन कीजिए।
      • खड़ी बोली की भाषा सम्बन्धी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए आधुनिक काल में प्रमुख साहित्यिक भाषा के रूप में उसे विकसित करने में योग देने वाले तत्वों पर विचार कीजिए।
      • खड़ी बोली की भाषा सम्बन्धी विशेषताएँ बताइए और आधुनिक काल में प्रमुख साहित्यिक भाषा के रूप में उसके विकास में योग देने वाली परिस्थितियों का विवरण दीजिए।
    • हिन्दी साहित्य के इतिहास के चार कालों की साहित्यिक प्रवृत्तियाँ
      • भक्तिकालीन हिन्दी के विभिन्न रूप।
      • आदिकालीन साहित्य के अध्ययन की प्रमुख समस्याएँ लिखिए।
      • सिद्धों की 'अटपटी बानी' (संध्या भाषा)।
      • सिद्ध-नाथ साहित्य का भाषिक तथा साहित्यिक अवदान।
      • नाथ साहित्य।
      • हिंदी रासो काव्यों की प्रमुख विशेषताएँ।
      • रासोकाव्य : विकास और प्रवृत्तियाँ।
      • पृथ्वीराज रासो।
      • रासो काव्य-परम्परा का परिचय देते हुए पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर प्रकाश डालिए।
      • विद्यापति की गंगा-भक्ति।
      • विद्यापति की कविताओं में व्यक्त भक्ति के स्वरूप का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • विद्यापति की कविताओं में विद्यमान भक्ति-भावना।
      • विद्यापति की काव्य-कला का मूल्यांकन कीजिए।
      • विद्यापति की कविता की प्रमुख विशेषताएँ।
      • विद्यापति भक्तकवि हैं या श्रृंगारी कवि? सप्रमाण विवेचन कीजिए।
      • भक्ति रंगमंच का स्वरूप।
      • 'भक्ति' कविता में अभिव्यक्त भारतबोध को स्पष्ट करते हुए भाषाई और सांस्कृतिक समन्वय के चिह्नों को रेखांकित कीजिए।
      • भक्तिकालीन काव्य की प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।
      • भक्तमाल।
      • संत काव्य-परंपरा का उल्लेख करते हुए उनकी प्रमुख प्रवृत्तियों की विवेचना कीजिए।
      • कबीर की काव्य-भाषा।
      • कबीर की प्रासंगिकता।
      • कबीर के काव्य पर निम्नलिखित दर्शनों के प्रभाव का विवेचन कीजिए : (क) भारतीय षड़्-दर्शन, (ख) जैन-बौद्ध दर्शन, (ग) इस्लाम और सूफ़ी दर्शन
      • कबीर की भक्ति।
      • हिंदी सूफी कवियों की लोकोन्मुखता
      • हिन्दी सूफी काव्य का सांस्कृतिक महत्त्व।
      • 'चंदायन' अथवा “मधुमालती' का प्रतिपाद्य।
      • सूफी-काव्यधारा के विकास को रेखांकित करते हुए जायसी के सांस्कृतिक प्रदेय का मूल्यांकन कीजिए।
      • जायसी की कविता और उसमें ध्वनित लोकचित्र।
      • पद्मावत में लोकतत्व।।
      • कृष्णभक्त मुसलिम कवयित्रियों की भक्ति-चेतना।
      • रासलीला की अखिल भारतीय व्याप्ति को स्पष्ट करते हुए इसके पाठ और प्रदर्शन पद्धति पर प्रकाश डालिए।
      • कृष्णभक्ति काव्य धारा के विकास में विविध संप्रदायों का योगदान।
      • मध्यकालीन कृष्ण भक्ति-काव्य।
      • पुष्टिमार्ग और अष्टछाप।
      • सूरदास का विरह-वर्णन।
      • सूरदास की कविता के आधार पर उनकी लोकचेतना पर प्रकाश डालिए।
      • अष्टछाप और सूरदास।
      • केशव का आचार्य।
      • ‘तुलसी का काव्य लोकमंगल की साधना है।’ इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • तुलसी की लोकमंगल सम्बन्धी अवधारणा।
      • गोस्वामी तुलसीदास रामराज्य के माध्यम से कल्याणकारी-राज्य का आदर्श उपस्थित करते हैं - मूल्यांकन कीजिए।
      • तुलसीदास की प्रासंगिकता।
      • ‘अयोध्याकांड’ के आधार पर तुलसी के भाव-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
      • तुलसी के काव्य पर विभिन्न भारतीय दर्शनों के प्रभाव का विवेचन कीजिए।
      • रीतिकालीन कवियों की श्रृंगार चेतना के गार्हस्थ्य-बोध का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • रीतिकालीन कविता में प्रकृति।
      • रीतिबद्ध काव्य के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए।
      • रीतिबद्ध काव्यधारा में केशवदास के कवि-कर्म का मूल्यांकन कीजिए।
      • रीतिबद्ध काव्य और रीतिमुक्त काव्य में क्या अन्तर है ? स्पष्ट कीजिए।
      • रीतिमुक्त कवियों की प्रणव चेतना।
      • केशव की संवाद-योजना की विशेषताएँ।
      • तुलसीदास और केशवदास की रामभक्ति से जुड़ी कविताओं में पृथकता के कारण।
      • केशव की संवाद-योजना।
      • बिहारी शृंगार रस के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। - इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
      • बिहारी का काव्य-वैभव।
      • बिहारी की काव्यगत विशेषताओं का विवेचन अनुभूति एवं अभिव्यक्ति - उभय दृष्टियों से कीजिए।
      • पद्माकर की काव्य-कला पर प्रकाश डालिए।
      • पद्माकर और देव की रीतिबद्ध कविता।
      • घनानंद की 'भाषा प्रवीणता' को स्पष्ट कीजिए।
      • घनानंद की काव्यगत विशेषताएँ।
      • प्रेम की पीर के कवि घनानंद।
      • घनानंद की कविता में व्यक्त स्वानुभूति और स्वच्छंदता का विवेचन कीजिए।
      • रीतिकालीन काव्य की स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए घनानन्द के काव्य की सोदाहरण विवेचना कीजिए।
      • “भारतीय नवजागरण हिन्दी गद्य के विकास की आधार-भूमि है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • भारतेन्दु की राष्ट्रीय चेतना।
      • बालकृष्ण भट्ट एवं प्रताप नारायण मिश्र के वैशिष्ट्य को निर्धारित कीजिए।
      • हिन्दी गद्य के विकास में बालकृष्ण भट्ट का योगदान।
      • ‘हिन्दी प्रदीप’ के माध्यम से बालकृष्ण भट्ट का हिन्दी-पत्रकारिता को प्रदत्त योगदान।
      • “ब्राह्मण पत्र” के माध्यम से प्रताप नारायण मिश्र का हिन्दी-पत्रकारिता को प्रदत्त योगदान।
      • 'शब्द-काव्य की साधना के लिए वस्तु-काव्य का अनुशीलन परम आवश्यक है', इस कथन की व्याख्या कीजिए।
      • छायावादी काव्य की प्रमुख दो विशेषताएँ।
      • छायावाद में नवजागरण के स्वर।
      • माखन लाल चतुर्वेदी की कविता में सांस्कृतिक राष्ट्रीयता।
      • छायावादी साहित्य में क्या भारतीय नवजागरण की अभिव्यक्ति हुई है? हुई है तो कैसे?
      • छायावाद और भक्तिकाव्य।
      • छायावाद और कामायनी।
      • प्रयोगवादी कविता की भाषा।
      • प्रयोगवादी काव्यान्दोलन में अज्ञेय की भूमिका का विवेचन कीजिए।
      • प्रयोगवाद का हिन्दी कविता के विकास में क्या योगदान है? स्पष्ट कीजिए।
      • साठोत्तरी हिन्दी कविता में लयात्मकता के हास के कारण एवं परिणाम का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
      • “नागार्जुन जनवादी कवि हैं” - इस कथन की तर्कसंगत व्याख्या कीजिए।
      • सांस्कृतिकता और राष्ट्रीयता के आधार पर मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर के काव्य का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
      • भारतीय साहित्य की उपेक्षिता नारी को अपना अधिकार दिलाकर मैथिलीशरण गुप्त ने नारी विमर्श को एक नवीन दिशा दी है - कैसे? समझाकर लिखिए।
      • “कामायनी” के आधार पर जयशंकर प्रसाद की सौन्दर्य-चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • ‘जयशंकर प्रसाद और उनकी कामायनी’ विषय पर एक नातिदीर्घ समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुत कीजिए।
      • जयशंकर “प्रसाद” की सौन्दर्य-चेतना।
      • 'निराला' की कविता का मुख्य स्वर स्पष्ट कीजिए।
      • निराला की काव्य चेतना।
      • दिनकर की काव्य-कृतियों में “उर्वशी” के प्रति आकर्षण के प्रमुख कारणों का उद्घाटन कीजिए।
      • 'दिनकर' की राष्ट्रीय-चेतना पर प्रकाश डालिए।
      • 'अज्ञेय' के काव्य की प्रमुख विशेषताओं का निरूपण कीजिए।
      • “तारसप्तक” का प्रकाशन हिन्दी कविता के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ था” – इस कथन का तर्कसंगत उत्तर दीजिए।
      • ‘अज्ञेय' की काव्य-भाषा पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
      • अज्ञेय की कहानी की वस्तुगत और शिल्पगत विशेषतायें।
      • मुक्तिबोध की काव्य-संवेदना की प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
      • नागार्जुन की कविताओं में भारतीय समाज की विसंगतियों और विडम्बनाओं को यथार्थ रूप में उकेरा गया है। स्पष्ट कीजिए।
      • नागार्जुन की कविताओं में भारतीय समाज की विसंगतियों और विडम्बनाओं को यथार्थ रूप में उकेरा गया है। स्पष्ट कीजिए।
      • नागार्जुन की काव्य-भाषा पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
      • जनकवि के रूप में नागार्जुन का मूल्याँकन कीजिए।
    • Hindi Literature Optional 2025 Paper 1 With Solution
      • अपभ्रंश और अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना के मुख्य अंतर
      • सिद्ध-नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का आरंभिक रूप
      • हिन्दी भाषा के मानकीकरण की वर्तमान चुनौतियाँ
      • भाषा और बोली में अंतर
      • मध्यकाल में अवधी और ब्रजभाषा का साहित्यिक अंतर्सम्बन्ध
      • 19वीं सदी के खड़ी बोली आंदोलन के ऐतिहासिक कारकों और उपलब्धियों की विवेचना कीजिए।
      • राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिन्दी के सामने उपस्थित वर्तमानकालीन चुनौतियों पर प्रकाश डालिए।
      • संत साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली के स्वरूप की सोदाहरण चर्चा कीजिए।
      • मानक हिन्दी की व्याकरणिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ क्या है? किस सीमा तक इसे संस्कृत की व्याकरणिक संरचना पर आधारित कहा जा सकता है?
      • ब्रजभाषा के विकास में सूर-पूर्व कवियों के योगदान पर टिप्पणी कीजिए।
      • देवनागरी लिपि के मानक रूप का परिचय देते हुए मानकीकरण हेतु किये गये प्रमुख प्रयत्नों की चर्चा कीजिए।
      • स्वाधीनता आंदोलन ने जनभाषा के रूप में हिन्दी के विकास को किस तरह प्रभावित किया?
      • जायसी और तुलसीदास द्वारा प्रयुक्त अवधी के रूपों में मुख्य अंतरों की सोदाहरण विवेचना कीजिए।
      • खुसरो के साहित्य में प्रयुक्त हिन्दी की विशेषताएँ लिखिए।
      • हिन्दी उपन्यास और यथार्थवाद
      • कबीर की लोकोन्मुखता
      • दिनकर की सामाजिक चेतना
      • सिद्ध साहित्य का परवर्ती हिन्दी साहित्य पर प्रभाव
      • हेमचन्द्र की कविता
      • कृष्णा सोबती के उपन्यासों की स्त्री-दृष्टि पर वर्तमान स्त्री-विमर्श के संदर्भ में विचार कीजिए।
      • विद्यापति की आध्यात्मिकता पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की टिप्पणी की समीक्षा कीजिए।
      • विजयदेव नारायण साही द्वारा किये गये जायसी के मूल्यांकन की समीक्षा कीजिए।
      • प्रगतिवादी आलोचना को वर्तमान समय में किस प्रकार की चुनौतियाँ मिल रही है? सोदाहरण विवेचना कीजिए।
      • 'हिन्दी नवजागरण' की उपलब्धियों और सीमाओं पर विचार कीजिए।
      • हिन्दी नई कहानी की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
      • हिन्दी रंगमंच के विकास से संबंधित प्रमुख बहसों की विवेचना कीजिए।
      • मोहन राकेश के नाटकों में व्यक्त आधुनिक मनुष्य के नैतिक द्वंदों की विवेचना कीजिए।
      • हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में दलित विमर्श के हस्तक्षेप की समीक्षा कीजिए।
    • Hindi Literature Optional 2025 Paper 2 With Solution
      • तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेस्वर कालहु कर काला ।। ब्रह्म अनामय अज भगवंता । व्यापक अजित अनादि अनंता ।।
      • कुहुकि कुहुकि जसि कोइल रोई । रकत आँसु घुँघुची बन बोई ।। पै कर मुखी नैन तन राती । को सिराव बिरहा दुःख ताती ।।
      • विषमता की पीड़ा से व्यस्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान । यही दुःख सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान ।
      • विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण, हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण, आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर ।
      • सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था: वह तो सब कुछ की तथता थी महाशून्य, वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सब में गाता है।
      • 'कबीर ग्रन्थावली' के आधार पर कबीर के आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डालिए।
      • "कवितावली के उत्तरकाण्ड में मध्यकाल के भयावह यथार्थ की समीक्षा की गई है" — इस कथन की सत्यता को स्पष्ट कीजिए।
      • 'भारत-भारती' में अभिव्यक्त राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप विश्लेषण कीजिए।
      • "कामायनी आधुनिक सभ्यता का प्रतिनिधि महाकाव्य है" — स्पष्ट कीजिए।
      • "युद्ध की समस्या मनुष्य की सारी समस्याओं की जड़ है" — दिनकर के 'कुरुक्षेत्र' काव्य के आधार पर इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
      • "विश्व की विभूति में मन को रमाने का जैसा अवसर भक्ति भावना में है; वैसा अन्तःसाध्या में नहीं" — सूरदास कृत 'भ्रमरगीत' के आधार पर इस कथन की युक्तिसंगत समीक्षा कीजिए।
      • "बिहारी की कविता श्रृंगारी है किन्तु प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँच पाती" — इस कथन की सम्यक विवेचना कीजिए।
      • 'कुकुरमुत्ता' कविता के मूल प्रतिपाद्य को स्पष्ट कीजिए।
      • 'ब्रह्मराक्षस' कविता की प्रतीक-योजना पर प्रकाश डालिए।
      • मे जीवन में पहली बार समझ पाई कि क्यों कोई पर्वत-शिखरों को सहलाती मेघ-मालाओं में खो जाता है, क्यों किसी को अपने तन-मन की अपेक्षा आकाश में बनते-मिटते चित्रों का इतना मोह हो रहता है।
      • कविता ही हृदय को प्रकृत दशा में लाती है और जगत के बीच क्रमशः उसका अधिकाधिक प्रसार करती हुई उसे मनुष्यत्व की उच्च भूमि पर ले जाती है।
      • जिस तरह मर्द के मर जाने से औरत अनाथ हो जाती है, उसी तरह औरत के मर जाने से मर्द के हाथ-पाँव टूट जाते हैं।
      • राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है।
      • काले साँप का काटा आदमी बच सकता है, हलाहल जहर पीने वाले की मौत रुक सकती है, किन्तु जिस पौधे को एक बार कर्मनाशा का पानी छू ले, वह फिर हरा नहीं हो सकता।
      • "‘कविता क्या है’ निबंध काव्य के सर्वांगपूर्ण विवेचन की दृष्टि से अद्वितीय बन पड़ा है" — इस कथन की सत्यता पर प्रकाश डालिए ।
      • "प्रसाद के नाटक भारत के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।" — ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक के आधार पर इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
      • भारतीय ग्रामीण जीवन को वैध सम्मान दिलाने की दृष्टि से ‘मैला आँचल’ उपन्यास की समीक्षा कीजिए।
      • "‘भारत दुर्दशा’ अतीत गौरव की चमकदार स्मृति है; आँसू भरा वर्तमान है और भविष्य निर्माण की प्रेरणा है।" — इस कथन की समीक्षा कीजिए।
      • ‘गोदान’ उपन्यास के मूल प्रतिपाद्य पर प्रकाश डालिए।
      • ‘भोलाराम का जीव’ कहानी के माध्यम से हरिशंकर परसाई की व्यंग्य चेतना स्पष्ट कीजिए।
      • ‘तुलसी साहित्य के सामंत विरोधी मूल्य’ निबंध के आधार पर डॉ. रामविलास शर्मा की तुलसी-विषयक मान्यताओं की समीक्षा कीजिए।
      • ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक के आधार पर लेखक के नारी संबंधी दृष्टिकोण पर प्रकाश डालिए।
      • "‘महाभोज’ उपन्यास राजनीति और अपराध के आपसी गठजोड़ पर करारा प्रहार करता है" — स्पष्ट कीजिए।
  1. PYQs and Practice Questions
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  4. P2B 4. निबंध निलय : संपादक : डॉ. सत्येन्द्र। बाल कृष्ण भट्ट, प्रेमचन्द, गुलाब राय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, अज्ञेय, कुबेरनाथ राय।
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