“चुराता न्याय जो, रण को बुलाता भी वही है; युधिष्ठिर ! स्वत्व की अन्वेषणा पातक नहीं है। नरक उनके लिए, जो पाप को स्वीकारते हैं; न उनके हेतु जो रण में उसे ललकारते हैं।। (UPSC 2002, 20 Marks, )

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