"सौन्दर्य का ऐसा साक्षात्कार मैंने कभी नहीं किया। जैसे वह सौन्दर्य अस्पृश्य होते हुए भी मांसल हो। मुझे अनुभव हुआ कि वह क्या है, जो भावना को कविता का रूप देता है। क्यों कोई पर्वत-शिखरों को सहलाती हुई मेघमालाओं में खो जाता है !"
(UPSC 2011, 20 Marks, )