अँखियाँ हरि दरसन की भूखी। कैसे रहैं रूपरंसराची ये बतियाँ सुनि रूखी।। अवधि गनत इकटक मग जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी।। बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। ‘सूर’ सिकत हठि नाव चलाओ ये सरिता हैं सूखी।।
(UPSC 1998, 20 Marks, )