यह तुम नहीं, तुम्हारा स्वार्थ बोल रहा है। स्वार्थ को इतनी छूट देना ठीक नहीं कि वह विवेक को ही खा जाये। अखबारों को तो आजाद रहना ही चाहिए। वे ही तो हमारे कामों को, हमारी बातों का असली दर्पण होते हैं। मेरा तो उसूल है कि दर्पण को धुँधला मत होने दो। हाँ, अपनी छवि देखने का साहस होना चाहिए आदमी में। (UPSC 2008, 20 Marks, )

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