हिन्दी का तत्सम संदर्भित मानकीकरण।
(UPSC 2024, 10 Marks, )
Theme:
हिन्दी का तत्सम मानकीकरण प्रक्रिया
Where in Syllabus:
(Linguistics)
हिन्दी का तत्सम संदर्भित मानकीकरण।
हिन्दी का तत्सम संदर्भित मानकीकरण।
(UPSC 2024, 10 Marks, )
Theme:
हिन्दी का तत्सम मानकीकरण प्रक्रिया
Where in Syllabus:
(Linguistics)
हिन्दी का तत्सम संदर्भित मानकीकरण।
Introduction
हिन्दी का तत्सम संदर्भित मानकीकरण भारतीय भाषाओं के विकास में एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें संस्कृत से सीधे लिए गए शब्दों का मानकीकरण किया जाता है। महात्मा गांधी और राजा राममोहन राय जैसे विचारकों ने भाषा के शुद्धिकरण और मानकीकरण पर जोर दिया। यह प्रक्रिया भाषा की शुद्धता और समृद्धि को बनाए रखने में सहायक होती है, जिससे हिन्दी भाषा की वैज्ञानिकता और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित किया जा सके।
हिन्दी का तत्सम मानकीकरण प्रक्रिया
● मानक भाषा: यह एक ऐसी भाषा होती है जिसका प्रयोग किसी देश या राज्य के शिक्षित वर्ग द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, व्यापारिक, वैज्ञानिक और प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है।
● मानकीकरण: यह प्रक्रिया है जिसमें भाषा का बोलचाल के स्तर से ऊपर उठकर एक मानक रूप ग्रहण किया जाता है।
● तत्सम शब्दों का प्रयोग:
● विसर्ग का प्रयोग: संस्कृत के जिन शब्दों में विसर्ग का प्रयोग होता है, उन्हें तत्सम रूप में प्रयुक्त करते समय विसर्ग का प्रयोग अवश्य किया जाए। उदाहरण: दुःखानुभूति, स्वतः, प्रायः।
● हलंत रूपों का प्रयोग: तत्सम शब्दों का प्रयोग वांछनीय हो तब हलंत रूपों का ही प्रयोग किया जाए, विशेष रूप से जब उनसे समस्त पद या व्युत्पन्न शब्द बनते हों। उदाहरण: साक्षात् (साक्षात्कार), सत् (सत्साहित्य)।
● हल् चिह्न का लोप: जिन शब्दों में हल् चिह्न लुप्त हो चुका हो, उनमें उसे फिर से लगाने का प्रयत्न न किया जाए। उदाहरण: महान, विद्वान।
● उच्चारण के प्रकार:
● स्वरों का प्रयोग: हिन्दी में ऐ (है), औ (औ) का प्रयोग दो प्रकार के उच्चारण को व्यक्त करने के लिए होता है। पहले प्रकार के उच्चारण 'है', 'और' आदि में मूल स्वरों की तरह होता है, जबकि दूसरे प्रकार के उच्चारण 'गवैया', 'कौवा' आदि शब्दों में संध्यक्षरों के रूप में होता है।
● संशोधन की आवश्यकता नहीं: 'गवय्या', 'कव्वा' आदि शब्दों में संशोधन की आवश्यकता नहीं है। संस्कृत के तत्सम शब्द 'शय्या' को 'शैया' न लिखा जाए।
● मानकीकरण: यह प्रक्रिया है जिसमें भाषा का बोलचाल के स्तर से ऊपर उठकर एक मानक रूप ग्रहण किया जाता है।
● तत्सम शब्दों का प्रयोग:
● विसर्ग का प्रयोग: संस्कृत के जिन शब्दों में विसर्ग का प्रयोग होता है, उन्हें तत्सम रूप में प्रयुक्त करते समय विसर्ग का प्रयोग अवश्य किया जाए। उदाहरण: दुःखानुभूति, स्वतः, प्रायः।
● हलंत रूपों का प्रयोग: तत्सम शब्दों का प्रयोग वांछनीय हो तब हलंत रूपों का ही प्रयोग किया जाए, विशेष रूप से जब उनसे समस्त पद या व्युत्पन्न शब्द बनते हों। उदाहरण: साक्षात् (साक्षात्कार), सत् (सत्साहित्य)।
● हल् चिह्न का लोप: जिन शब्दों में हल् चिह्न लुप्त हो चुका हो, उनमें उसे फिर से लगाने का प्रयत्न न किया जाए। उदाहरण: महान, विद्वान।
● उच्चारण के प्रकार:
● स्वरों का प्रयोग: हिन्दी में ऐ (है), औ (औ) का प्रयोग दो प्रकार के उच्चारण को व्यक्त करने के लिए होता है। पहले प्रकार के उच्चारण 'है', 'और' आदि में मूल स्वरों की तरह होता है, जबकि दूसरे प्रकार के उच्चारण 'गवैया', 'कौवा' आदि शब्दों में संध्यक्षरों के रूप में होता है।
● संशोधन की आवश्यकता नहीं: 'गवय्या', 'कव्वा' आदि शब्दों में संशोधन की आवश्यकता नहीं है। संस्कृत के तत्सम शब्द 'शय्या' को 'शैया' न लिखा जाए।
Conclusion
हिन्दी का तत्सम संदर्भित मानकीकरण भाषा की शुद्धता और समृद्धि के लिए आवश्यक है। महात्मा गांधी ने कहा था, "भाषा का विकास उसके मानकीकरण में है।" मानकीकरण से भाषा की स्पष्टता और संप्रेषणीयता बढ़ती है। पंडित नेहरू ने भी भाषा के विकास में तत्सम शब्दों के महत्व को रेखांकित किया। आगे बढ़ने के लिए, हमें भाषा आयोग की सिफारिशों का पालन करना चाहिए और शिक्षा में तत्सम शब्दों का समावेश सुनिश्चित करना चाहिए।