कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरण के रूप में की गयी स्थापनाओं का मूल्यांकन कीजिए।
(UPSC 2014, 15 Marks, )
Theme:
कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरणिक स्थापनाओं का मूल्यांकन
Where in Syllabus:
(Hindi Grammar Evaluation)
कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरण के रूप में की गयी स्थापनाओं का मूल्यांकन कीजिए।
कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरण के रूप में की गयी स्थापनाओं का मूल्यांकन कीजिए।
(UPSC 2014, 15 Marks, )
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कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरणिक स्थापनाओं का मूल्यांकन
Where in Syllabus:
(Hindi Grammar Evaluation)
कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरण के रूप में की गयी स्थापनाओं का मूल्यांकन कीजिए।
Introduction
कामता प्रसाद गुरु ने हिंदी व्याकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी स्थापनाएँ भाषा की संरचना और नियमों पर आधारित हैं। उन्होंने पाणिनि और पतंजलि जैसे प्राचीन व्याकरणाचार्यों के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया। उनकी व्याकरणिक दृष्टि ने हिंदी भाषा के विकास में एक नई दिशा प्रदान की। उनके कार्यों का मूल्यांकन करते समय उनकी व्याकरणिक विधियों और भाषा के प्रति उनके दृष्टिकोण को समझना आवश्यक है।
कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरणिक स्थापनाओं का मूल्यांकन
● भाषा का मानकीकरण: महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से कामता प्रसाद गुरु ने भाषा के मानकीकरण के लिए एक व्यापक व्याकरण लिखा। इसमें उन्होंने विभिन्न भाषाओं के प्रचलित शब्दों को ज्यों का त्यों स्वीकार करने की बात कही।
● परसर्ग और संज्ञा का विभाजन: गुरुजी ने परसर्ग को संज्ञा से अलग करके लिखने का सुझाव दिया, जैसे - "गाय का दूध", "राम ने"।
● सर्वनाम और परसर्ग: सर्वनाम के प्रयोग में परसर्गों को सटाकर लिखने की बात कही गई, जैसे - "उसका", "आपका"।
● लिंग निर्धारण: लिंग निर्धारण के लिए स्वीकृत और प्रचलित मान्यता का पालन करने पर जोर दिया गया। उदाहरण के लिए, "अग्नि", "आत्मा", "मृत्यु", "वायु" को स्त्रीलिंग मानने की बात कही गई।
● उर्दू और हिंदी शब्दों का लिंग निर्धारण: उर्दूदान हिंदी लेखक "धर्मशाला", "पाठशाला", "चर्चा", "माला", "मर्यादा" आदि शब्दों को पुल्लिंग रूप में प्रयोग कर रहे थे, जिन्हें स्त्रीलिंग मानने पर बल दिया गया।
● बहुवचन रूप: पुल्लिंग शब्दों के बहुवचन रूप जैसे "सूरमे", "राजे", "देवते" को अप्रचलित मानकर "सूरमा", "राजा", "देवता" को मान्य किया गया। इसी प्रकार "राजाओं", "देवताओं" का प्रयोग किया गया।
● स्त्रीलिंग संबोधन: संस्कृत की तरह स्त्रीलिंग संबोधन जैसे "शकुन्तले!", "सोते!" को अमान्य घोषित किया गया।
● सर्वनामों का परिनिष्ठापन: "इनने", "उनने" के लिए "इन्होंने", "उन्होंने" को परिनिष्ठित किया गया।
● बहुवचन रूप: "यह", "वह" के बहुवचन रूप "ये", "वे" लिखे जाने लगे।
● विराम चिह्नों का प्रयोग: विरामादि चिह्नों के प्रयोग को भी व्यवस्थित किया गया।
● भाषा और व्याकरण का संबंध: कामता प्रसाद गुरु का कथन था कि भाषा व्याकरण के अधीन है, लेकिन व्याकरण भाषा की शुद्धता और व्यावहारिकता का विवेचन करता है।
● परसर्ग और संज्ञा का विभाजन: गुरुजी ने परसर्ग को संज्ञा से अलग करके लिखने का सुझाव दिया, जैसे - "गाय का दूध", "राम ने"।
● सर्वनाम और परसर्ग: सर्वनाम के प्रयोग में परसर्गों को सटाकर लिखने की बात कही गई, जैसे - "उसका", "आपका"।
● लिंग निर्धारण: लिंग निर्धारण के लिए स्वीकृत और प्रचलित मान्यता का पालन करने पर जोर दिया गया। उदाहरण के लिए, "अग्नि", "आत्मा", "मृत्यु", "वायु" को स्त्रीलिंग मानने की बात कही गई।
● उर्दू और हिंदी शब्दों का लिंग निर्धारण: उर्दूदान हिंदी लेखक "धर्मशाला", "पाठशाला", "चर्चा", "माला", "मर्यादा" आदि शब्दों को पुल्लिंग रूप में प्रयोग कर रहे थे, जिन्हें स्त्रीलिंग मानने पर बल दिया गया।
● बहुवचन रूप: पुल्लिंग शब्दों के बहुवचन रूप जैसे "सूरमे", "राजे", "देवते" को अप्रचलित मानकर "सूरमा", "राजा", "देवता" को मान्य किया गया। इसी प्रकार "राजाओं", "देवताओं" का प्रयोग किया गया।
● स्त्रीलिंग संबोधन: संस्कृत की तरह स्त्रीलिंग संबोधन जैसे "शकुन्तले!", "सोते!" को अमान्य घोषित किया गया।
● सर्वनामों का परिनिष्ठापन: "इनने", "उनने" के लिए "इन्होंने", "उन्होंने" को परिनिष्ठित किया गया।
● बहुवचन रूप: "यह", "वह" के बहुवचन रूप "ये", "वे" लिखे जाने लगे।
● विराम चिह्नों का प्रयोग: विरामादि चिह्नों के प्रयोग को भी व्यवस्थित किया गया।
● भाषा और व्याकरण का संबंध: कामता प्रसाद गुरु का कथन था कि भाषा व्याकरण के अधीन है, लेकिन व्याकरण भाषा की शुद्धता और व्यावहारिकता का विवेचन करता है।
Conclusion
कामता प्रसाद गुरु की वैयाकरण स्थापनाएँ भारतीय भाषाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। उनकी व्याकरणिक दृष्टि ने हिंदी भाषा को संरचित और समृद्ध किया। गुरुजी की स्थापनाएँ भाषा की सरलता और वैज्ञानिकता पर आधारित हैं। उनके कार्यों ने भाषा शिक्षण में नए आयाम जोड़े। डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा, "गुरुजी की व्याकरणिक दृष्टि ने हिंदी को नई दिशा दी।" आगे बढ़ते हुए, उनकी स्थापनाओं का गहन अध्ययन और अनुसरण भाषा के विकास में सहायक होगा।