माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवै पड़ंत। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत।। कबीर सूता क्या करे, उठि न रोवै दुक्ख। जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख।। (UPSC 2008, 20 Marks, )

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