उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती। (UPSC 1989, 20 Marks, )

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