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कौन हो तुम वसंत के दूत विरस पतझड़ में अति सुकुमार। घन-तिमिर में चपला की रेख, तपन में शीतल मंद बयार। नखत की आशा-किरण समान, हृदय के कोमल कवि की कांत - कल्पना की लघु लहरी दिव्य, कह रही मानस-हलचल शांत।। (UPSC 2022, 10 Marks, )
कौन हो तुम वसंत के दूत विरस पतझड़ में अति सुकुमार। घन-तिमिर में चपला की रेख, तपन में शीतल मंद बयार। नखत की आशा-किरण समान, हृदय के कोमल कवि की कांत - कल्पना की लघु लहरी दिव्य, कह रही मानस-हलचल शांत।।View Answer
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दुःख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात। एक परदा यह झीना नील, छिपाये है जिसमें सुख गात। जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल— ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल॥ (UPSC 2021, 10 Marks, )
दुःख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात। एक परदा यह झीना नील, छिपाये है जिसमें सुख गात। जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल— ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल॥View Answer
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अंधकार के अट्रहास सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य, 'छिपी सृष्टि के कण-कण में तू यह सुंदर रहस्य है नित्य। जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घनमाला में, सौदामिनी संधि सा सुंदर क्षण भर रहा उजाला में।। (UPSC 2017, 10 Marks, )
अंधकार के अट्रहास सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य, 'छिपी सृष्टि के कण-कण में तू यह सुंदर रहस्य है नित्य। जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घनमाला में, सौदामिनी संधि सा सुंदर क्षण भर रहा उजाला में।।View Answer
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चेतना का सुंदर इतिहास अखिल मानव भावों का सत्य; विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य अक्षरों से अंकित हो नित्य। विधाता की कल्याणी सृष्टि सफल हों इस भूतल पर पूर्ण; पटें सागर, बिखेरें ग्रह-पुंज और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।। (UPSC 2016, 10 Marks, )
चेतना का सुंदर इतिहास अखिल मानव भावों का सत्य; विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य अक्षरों से अंकित हो नित्य। विधाता की कल्याणी सृष्टि सफल हों इस भूतल पर पूर्ण; पटें सागर, बिखेरें ग्रह-पुंज और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।।View Answer
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विश्व की दुर्बलता बल बने पराजय का बढ़ता व्यापार हंसाता रहे उसे सविलास शक्ति का क्रीड़ामय संचार। शक्ति के विद्युतकण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं हो निरुपाय समन्वय उसको करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाय। (UPSC 2015, 10 Marks, )
विश्व की दुर्बलता बल बने पराजय का बढ़ता व्यापार हंसाता रहे उसे सविलास शक्ति का क्रीड़ामय संचार। शक्ति के विद्युतकण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं हो निरुपाय समन्वय उसको करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाय।View Answer
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“विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान, यही दुःख-सुख, विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार उमड़ता कारण-जलधि समान, व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुख-मणिगण द्युतिमान॥” (UPSC 2014, 10 Marks, )
“विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान, यही दुःख-सुख, विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार उमड़ता कारण-जलधि समान, व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुख-मणिगण द्युतिमान॥”View Answer
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सुरा सुरभिमय वदन अरुण वे नयन भरे आलस अनुराग; कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पतृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये। आह! जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।। (UPSC 2013, 10 Marks, )
सुरा सुरभिमय वदन अरुण वे नयन भरे आलस अनुराग; कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पतृक्ष का पीत पराग। विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये। आह! जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।।View Answer
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नित्य-यौवन छवि से हो दीप्त विश्व की करुण कामना मूर्ति, स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण प्रकट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति। उषा की पहिली लेखा कांत, माधुरी से भीगी भर मोद, मद भरी जैसे उठे सलज्ज भोर की तारक-द्युति की गोद।। (UPSC 2010, 20 Marks, )
नित्य-यौवन छवि से हो दीप्त विश्व की करुण कामना मूर्ति, स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण प्रकट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति। उषा की पहिली लेखा कांत, माधुरी से भीगी भर मोद, मद भरी जैसे उठे सलज्ज भोर की तारक-द्युति की गोद।।Enroll Now
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“विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्तंभित विश्व महान; यही दुख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा में नीली लहरों बीच बिखरते सुख मणि गण द्युतिमान!” (UPSC 2006, 20 Marks, )
“विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्तंभित विश्व महान; यही दुख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा में नीली लहरों बीच बिखरते सुख मणि गण द्युतिमान!”Enroll Now
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महा-नृत्य का विषम सम, अरी अखिल स्पंदनों की तू माप, तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप। अधंकार के अट्टहास-सी, मुखरित सतत चिरंतन सत्य, छिपी सृष्टि के कण-कण में तू, यह सुन्दर रहस्य है नित्य।। (UPSC 2001, 20 Marks, )
महा-नृत्य का विषम सम, अरी अखिल स्पंदनों की तू माप, तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप। अधंकार के अट्टहास-सी, मुखरित सतत चिरंतन सत्य, छिपी सृष्टि के कण-कण में तू, यह सुन्दर रहस्य है नित्य।।Enroll Now
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यह क्या मधुर-स्वप्न-सी झिलमिल सदय हृदय में अधिक अधीर व्याकुलता-सी व्यक्त हो रही आशा बन कर प्राण-समीर। यह कितनी स्पृहणीय बन गई मधुर जागरण-सी छविमान स्मिति की लहरों-सी उठती है नाच रही ज्यों मधुमय तान। (UPSC 1999, 20 Marks, )
यह क्या मधुर-स्वप्न-सी झिलमिल सदय हृदय में अधिक अधीर व्याकुलता-सी व्यक्त हो रही आशा बन कर प्राण-समीर। यह कितनी स्पृहणीय बन गई मधुर जागरण-सी छविमान स्मिति की लहरों-सी उठती है नाच रही ज्यों मधुमय तान।Enroll Now
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दया, माया, ममता लो आज मधुरिमा लो, अगाध विश्वास; हमारा हृदय-रत्न-निधि स्वच्छ तुम्हारे लिए खुला है पास। बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल; विश्व-भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल। (UPSC 1998, 20 Marks, )
दया, माया, ममता लो आज मधुरिमा लो, अगाध विश्वास; हमारा हृदय-रत्न-निधि स्वच्छ तुम्हारे लिए खुला है पास। बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल; विश्व-भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल।Enroll Now
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मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ, मैं शालीनता सिखाती हूँ, नूपुर-सी लिपट मनाती हूँ। लाली बन सरल कपोलों में, आँखों में अंजन-सी लगती, कुंचित अलकों-सी घुंघराली, मन की मरोर बन कर जगती। (UPSC 1997, 20 Marks, )
मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ, मैं शालीनता सिखाती हूँ, नूपुर-सी लिपट मनाती हूँ। लाली बन सरल कपोलों में, आँखों में अंजन-सी लगती, कुंचित अलकों-सी घुंघराली, मन की मरोर बन कर जगती।Enroll Now
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उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं: जिसमें अनन्त अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती; ठोकर जो लगने वाली है। उसको धीरे से समझाती। (UPSC 1996, 20 Marks, )
उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं: जिसमें अनन्त अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती; ठोकर जो लगने वाली है। उसको धीरे से समझाती।Enroll Now
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कर रही लीलामय आनंद, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त, विश्व का उन्मीलन अभिराम, इसी में सब होते अनुरक्त। काम-मंगल में मंडित श्रेय, सर्ग है इच्छा का परिणाम। तिरस्कृत कर उसको तुम भूल, बनाते हो असफल भवधाम।। (UPSC 1995, 20 Marks, )
कर रही लीलामय आनंद, महाचिति सजग हुई सी व्यक्त, विश्व का उन्मीलन अभिराम, इसी में सब होते अनुरक्त। काम-मंगल में मंडित श्रेय, सर्ग है इच्छा का परिणाम। तिरस्कृत कर उसको तुम भूल, बनाते हो असफल भवधाम।।Enroll Now
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संकुचित असीम अमोघ शक्ति जीवन को बाधा-मय पथ पर ले चले भेद से भरी भक्ति या कभी अपूर्ण अजंता में हो रागमयी-सी महासक्ति ... तुम समझ न सको, बुराई से शुभ-इच्छा की है बड़ी शक्ति, हो विफल तर्क से भरी युक्ति। (UPSC 1994, 20 Marks, )
संकुचित असीम अमोघ शक्ति जीवन को बाधा-मय पथ पर ले चले भेद से भरी भक्ति या कभी अपूर्ण अजंता में हो रागमयी-सी महासक्ति ... तुम समझ न सको, बुराई से शुभ-इच्छा की है बड़ी शक्ति, हो विफल तर्क से भरी युक्ति।Enroll Now
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उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।। (UPSC 1993, 20 Marks, )
उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।।Enroll Now
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नेत्र निमीलन करती मानो प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने, जलधि लहरियों की अँगड़ाई बार-बार जाती सोने। सिंधु सेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी, प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये सी ऐठीं-सी। (UPSC 1992, 20 Marks, )
नेत्र निमीलन करती मानो प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने, जलधि लहरियों की अँगड़ाई बार-बार जाती सोने। सिंधु सेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी, प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये सी ऐठीं-सी।Enroll Now
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सौंदर्य जलधि से भर लाये केवल तुम अपना गरल पात्र, तुम अति अबोध, अपनी अपूर्णता को न स्वयं तुम समझ सके ... 'कुछ मेरा हो' यह राग-भाव संकुचित पूर्णता है अजान — मानस-जलनिधि का क्षुद्र-यान॥ (UPSC 1991, 20 Marks, )
सौंदर्य जलधि से भर लाये केवल तुम अपना गरल पात्र, तुम अति अबोध, अपनी अपूर्णता को न स्वयं तुम समझ सके ... 'कुछ मेरा हो' यह राग-भाव संकुचित पूर्णता है अजान — मानस-जलनिधि का क्षुद्र-यान॥Enroll Now
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उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती। (UPSC 1989, 20 Marks, )
उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती। ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।Enroll Now
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दिग्दाहों से धूम उठे, या जलघर उठे क्षितिज तट के। सधन गगन में भीम प्रकम्पन, झंझा के चलते झटके ॥ अन्धकारे में मलिन मित्त की धुंधली आभा लीन हुई; वरुण व्यस्त थे, घनी कालिमा स्तर स्तर जमती पीन हुई। (UPSC 1988, 20 Marks, )
दिग्दाहों से धूम उठे, या जलघर उठे क्षितिज तट के। सधन गगन में भीम प्रकम्पन, झंझा के चलते झटके ॥ अन्धकारे में मलिन मित्त की धुंधली आभा लीन हुई; वरुण व्यस्त थे, घनी कालिमा स्तर स्तर जमती पीन हुई।Enroll Now
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घिर रहे थे घुँघराले बाल अंस अव लम्बित मुख के पास। नील घन- शावक से सुकुमार सुधा भरने को विधु के पास॥ और उस मुख पर वह मुसक्यान ! रक्त किसलय पर ले विश्राम अरुण की एक किरण अम्लान अधिक अलसाई हो अभिराम ! (UPSC 1986, 20 Marks, )
घिर रहे थे घुँघराले बाल अंस अव लम्बित मुख के पास। नील घन- शावक से सुकुमार सुधा भरने को विधु के पास॥ और उस मुख पर वह मुसक्यान ! रक्त किसलय पर ले विश्राम अरुण की एक किरण अम्लान अधिक अलसाई हो अभिराम !Enroll Now
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अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी ! अरी आधि, मधुमय अभिशाप हृदय-गगन में धूमकेतु-सी, पुण्य-सृष्टि में सुंदर पाप। मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चित जाति का जीव अमर मरेगा क्या? तू कितनी गहरी डाल रही है नींव। (UPSC 1985, 20 Marks, )
अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी ! अरी आधि, मधुमय अभिशाप हृदय-गगन में धूमकेतु-सी, पुण्य-सृष्टि में सुंदर पाप। मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चित जाति का जीव अमर मरेगा क्या? तू कितनी गहरी डाल रही है नींव।Enroll Now
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बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल वह विश्व मुकुट सा उज्ज्वलतम शशिखंड सदृश था स्पष्ट भाल दो पद्म-पलाश चषक-से दृग देते अनुराग विराग ढाल गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश वह आनन जिसमें भरा गान वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान था एक हाथ में कर्म-कलश वसुधा-जीवनरस-सार लिये दूसरा विचारों के नभ को या मधुर अभय अवलंब दिये त्रिवली थी त्रिगुण-तरंगमयी, आलोकवसन लिपटा अराल चरणों में थी गति भरी ताल ।। (UPSC 1982, 20 Marks, )
बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल वह विश्व मुकुट सा उज्ज्वलतम शशिखंड सदृश था स्पष्ट भाल दो पद्म-पलाश चषक-से दृग देते अनुराग विराग ढाल गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश वह आनन जिसमें भरा गान वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान था एक हाथ में कर्म-कलश वसुधा-जीवनरस-सार लिये दूसरा विचारों के नभ को या मधुर अभय अवलंब दिये त्रिवली थी त्रिगुण-तरंगमयी, आलोकवसन लिपटा अराल चरणों में थी गति भरी ताल ।।Enroll Now
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नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पदतल में, पीपूष-स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा। संघर्ष सदा उर-अन्तर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा। आंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा। (UPSC 1981, 20 Marks, )
नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पदतल में, पीपूष-स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा। संघर्ष सदा उर-अन्तर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा। आंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा।Enroll Now
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हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खलखेला हरी-भरी-सी दौड़-धूप, ओ जल-माया की चल-रेखा। इस ग्रहकक्षा की हलचल-री तरल गरल की लघु-लहरी, जरा अमर-जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बहरी। (UPSC 1980, 20 Marks, )
हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खलखेला हरी-भरी-सी दौड़-धूप, ओ जल-माया की चल-रेखा। इस ग्रहकक्षा की हलचल-री तरल गरल की लघु-लहरी, जरा अमर-जीवन की, और न कुछ सुनने वाली, बहरी।Enroll Now
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विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान; यही दु:ख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”। (UPSC 1979, 20 Marks, )
विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान; यही दु:ख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”।Enroll Now
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“संपूर्ण संसार कर्मण्य वीरों की चित्रशाला है। वीरत्व एक स्वावलंबी गुण है। प्राणियों का विकास संभवतः इसी विचार के ऊर्जित होने से हुआ है। जीवन में वही तो विजयी होता है जो दिन-रात 'युद्धस्व विगतज्वरः’ का शंखनाद सुना करता है।” (UPSC 2022, 10 Marks, )
“संपूर्ण संसार कर्मण्य वीरों की चित्रशाला है। वीरत्व एक स्वावलंबी गुण है। प्राणियों का विकास संभवतः इसी विचार के ऊर्जित होने से हुआ है। जीवन में वही तो विजयी होता है जो दिन-रात 'युद्धस्व विगतज्वरः’ का शंखनाद सुना करता है।”View Answer
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“इस गतिशील जगत् में परिवर्तन पर आश्चर्य! परिवर्तन रुका कि महापरिवर्तन --प्रलय हुआ! परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शांति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है। समय पुरुष और स्त्री की गेंद लेकर दोनों हाथ से खेलता है।” (UPSC 2020, 10 Marks, )
“इस गतिशील जगत् में परिवर्तन पर आश्चर्य! परिवर्तन रुका कि महापरिवर्तन --प्रलय हुआ! परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शांति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है। समय पुरुष और स्त्री की गेंद लेकर दोनों हाथ से खेलता है।”View Answer
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“उस हिमालय के ऊपर प्रभात-सूर्य की सुनहरी प्रभा से आलोकित प्रभा का, पीले पोखराज का सा, एक महल था। उसी से नवनीत की पुतली झाँक कर विश्व को देखती थी। वह हिम की शीतलता से सुसंगठित थी। सुनहरी किरणों को जलन हुई। तप्त होकर महल को गला दिया। पुतली! उसका मंगल हो, हमारे अश्रु की शीतलता उसे सुरक्षित रखे। कल्पना की भाषा के पंख गिर जाते हैं, मौन-नीड़ में निवास करने दो। छेड़ो मत मित्र!” (UPSC 2018, 10 Marks, )
“उस हिमालय के ऊपर प्रभात-सूर्य की सुनहरी प्रभा से आलोकित प्रभा का, पीले पोखराज का सा, एक महल था। उसी से नवनीत की पुतली झाँक कर विश्व को देखती थी। वह हिम की शीतलता से सुसंगठित थी। सुनहरी किरणों को जलन हुई। तप्त होकर महल को गला दिया। पुतली! उसका मंगल हो, हमारे अश्रु की शीतलता उसे सुरक्षित रखे। कल्पना की भाषा के पंख गिर जाते हैं, मौन-नीड़ में निवास करने दो। छेड़ो मत मित्र!”View Answer
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“अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है। अपने को नियामक और कर्ता समझने की बलवती स्पृहा उससे बेगार कराती है। उत्सवों में परिचारक और अस्त्रों में ढाल से भी अधिकार-लोलुप मनुष्य क्या अच्छे हैं?” (UPSC 2016, 10 Marks, )
“अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है। अपने को नियामक और कर्ता समझने की बलवती स्पृहा उससे बेगार कराती है। उत्सवों में परिचारक और अस्त्रों में ढाल से भी अधिकार-लोलुप मनुष्य क्या अच्छे हैं?”View Answer
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“राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ इसका दायित्व भी बढ़ गया है। पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को अब अनायास और अवश्य अपनी शरण में आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।” (UPSC 2015, 10 Marks, )
“राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ इसका दायित्व भी बढ़ गया है। पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को अब अनायास और अवश्य अपनी शरण में आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।”View Answer
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“कष्ट हृदय की कसौटी है - तपस्या अग्नि है - सम्राट! यदि इतना भी न कर सके तो क्या! सब क्षणिक सुखों का अंत है। जिसमें सुखों का अंत न हो, इसलिए सुख करना ही न चाहिए। मेरे इस जीवन के देवता और उस जीवन के प्राप्य! क्षमा!” (UPSC 2014, 10 Marks, )
“कष्ट हृदय की कसौटी है - तपस्या अग्नि है - सम्राट! यदि इतना भी न कर सके तो क्या! सब क्षणिक सुखों का अंत है। जिसमें सुखों का अंत न हो, इसलिए सुख करना ही न चाहिए। मेरे इस जीवन के देवता और उस जीवन के प्राप्य! क्षमा!”View Answer
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“कवित्व वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, सत् का असत् से, जड़ का चेतन से, और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से सम्बन्ध कौन कराती है? कविता ही न!” (UPSC 2013, 10 Marks, )
“कवित्व वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, सत् का असत् से, जड़ का चेतन से, और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से सम्बन्ध कौन कराती है? कविता ही न!”View Answer
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“उपनिषदों के 'नेति-नेति' से ही गौतम का अनात्मवाद पूर्ण है। यह प्राचीन महर्षियों का कथित सिद्धान्त 'मध्यमा-प्रतिपदा' के नाम से संसार में प्रचारित हुआ। व्यक्ति-रूप में आत्मा के सदृश कुछ नहीं है।” (UPSC 2011, 20 Marks, )
“उपनिषदों के 'नेति-नेति' से ही गौतम का अनात्मवाद पूर्ण है। यह प्राचीन महर्षियों का कथित सिद्धान्त 'मध्यमा-प्रतिपदा' के नाम से संसार में प्रचारित हुआ। व्यक्ति-रूप में आत्मा के सदृश कुछ नहीं है।”Enroll Now
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“कविता करना अनन्त पुण्य का फल है। इस दुराशा और अनन्त उत्कण्ठा से कवि-जीवन व्यतीत करने की इच्छा हुई। संसार के समस्त अभावों को असन्तोष कहकर हृदय को धोखा देता रहा। परन्तु कैसी विडम्बना! लक्ष्मी के लालों का भ्रू-भंग और क्षोभ की ज्वाला के अतिरिक्त मिला क्या! - एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन, जो दूसरों की दया में अपना अस्तित्व रखता है!” (UPSC 2008, 20 Marks, )
“कविता करना अनन्त पुण्य का फल है। इस दुराशा और अनन्त उत्कण्ठा से कवि-जीवन व्यतीत करने की इच्छा हुई। संसार के समस्त अभावों को असन्तोष कहकर हृदय को धोखा देता रहा। परन्तु कैसी विडम्बना! लक्ष्मी के लालों का भ्रू-भंग और क्षोभ की ज्वाला के अतिरिक्त मिला क्या! - एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन, जो दूसरों की दया में अपना अस्तित्व रखता है!”Enroll Now
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“आर्य, रक्तपात शत्रु को पराजित करने का सफल उपाय नहीं। शस्त्र द्वारा शत्रु को वध किया जा सकता है, उसे कुछ काल के लिए वश में किया जा सकता है, परन्तु विजय नहीं किया जा सकता। मनुष्य मृत्यु की अपेक्षा पराभव को केवल कायरता और प्रतिहिंसा की भावना से ही स्वीकार करता है।” (UPSC 2008, 20 Marks, )
“आर्य, रक्तपात शत्रु को पराजित करने का सफल उपाय नहीं। शस्त्र द्वारा शत्रु को वध किया जा सकता है, उसे कुछ काल के लिए वश में किया जा सकता है, परन्तु विजय नहीं किया जा सकता। मनुष्य मृत्यु की अपेक्षा पराभव को केवल कायरता और प्रतिहिंसा की भावना से ही स्वीकार करता है।”Enroll Now
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जब स्वजन लोग अपने शील-शिष्टाचार का नालन करें—आत्मसमर्पण, सहानुभूति, सत्पथ का अवलंबन करें, तो दुर्दिन का साहस नहीं कि उस कुटुम्ब की ओर आँख उठाकर देखे। इसलिए इस कठोर समय में भगवान् की स्निग्धकरुणा का शीतल ध्यान कर। (UPSC 2007, 20 Marks, )
जब स्वजन लोग अपने शील-शिष्टाचार का नालन करें—आत्मसमर्पण, सहानुभूति, सत्पथ का अवलंबन करें, तो दुर्दिन का साहस नहीं कि उस कुटुम्ब की ओर आँख उठाकर देखे। इसलिए इस कठोर समय में भगवान् की स्निग्धकरुणा का शीतल ध्यान कर।Enroll Now
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विजय का क्षणिक उल्लास हृदय की भूख मिटा देगा? कभी नहीं। वीरों का भी क्या ही व्यवसाय है, क्या ही उन्मत्त भावना है। चक्रपालित! संसार में जो सबसे महान है, वह क्या है? त्याग! त्याग का ही दूसरा नाम महत्त्व है। प्राणों का मोह त्याग करना वीरता का रहस्य है। (UPSC 2004, 20 Marks, )
विजय का क्षणिक उल्लास हृदय की भूख मिटा देगा? कभी नहीं। वीरों का भी क्या ही व्यवसाय है, क्या ही उन्मत्त भावना है। चक्रपालित! संसार में जो सबसे महान है, वह क्या है? त्याग! त्याग का ही दूसरा नाम महत्त्व है। प्राणों का मोह त्याग करना वीरता का रहस्य है।Enroll Now
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राष्ट्रनीति दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद को समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ उसका दायित्व भी बढ़ गया है; पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को वे अब अनायास और अवश्य अपनी शरण आने वाली वस्तु समझने लगे हैं। (UPSC 2002, 20 Marks, )
राष्ट्रनीति दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद को समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ उसका दायित्व भी बढ़ गया है; पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को वे अब अनायास और अवश्य अपनी शरण आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।Enroll Now
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परमात्मशक्ति का उत्थान पतन और पतन का उत्थान किया करती है। इसी का नाम है दम्भ का दमन। स्वयं प्रकृति की नियामिका शक्ति कृत्रिम स्वार्थसिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसा कार्य कोई जानबूझ कर नहीं करता, और न उसका प्रत्यक्ष में कोई कड़ा कारण दिखाई पड़ता है। उलट-फेर को शान्त और विचारशील महापुरुष ही समझते पर उसे रोकना उनके वश की भी बात नहीं है, क्योंकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है। (UPSC 2001, 20 Marks, )
परमात्मशक्ति का उत्थान पतन और पतन का उत्थान किया करती है। इसी का नाम है दम्भ का दमन। स्वयं प्रकृति की नियामिका शक्ति कृत्रिम स्वार्थसिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसा कार्य कोई जानबूझ कर नहीं करता, और न उसका प्रत्यक्ष में कोई कड़ा कारण दिखाई पड़ता है। उलट-फेर को शान्त और विचारशील महापुरुष ही समझते पर उसे रोकना उनके वश की भी बात नहीं है, क्योंकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है।Enroll Now
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कवित्व वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, असत् का सत् से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से संबंध कौन कराती है, कविता न? (‘स्कन्दगुप्त’ नाटक, जयशंकर प्रसाद, प्रथम अंक, तृतीय दृश्य, पृष्ठ 47)। (UPSC 2000, 20 Marks, )
कवित्व वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, असत् का सत् से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत का अन्तर्जगत से संबंध कौन कराती है, कविता न? (‘स्कन्दगुप्त’ नाटक, जयशंकर प्रसाद, प्रथम अंक, तृतीय दृश्य, पृष्ठ 47)।Enroll Now
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मेरा साम्राज्य करुणा का था, मेरा धर्म प्रेम का था। आनन्द-समुद्र में शान्ति-द्वीप का अधिवासी ब्राह्मण मैं, चन्द्र-सूर्य-नक्षत्र मेरे दीप थे, अनन्त आकाश वितान था, शस्यश्यामला कोमला विश्वम्भरा मेरी शय्या थी। बौद्धिक विनोद कर्म था, सन्तोष धन था। उस अपनी, ब्राह्मण की, जन्म-भूमि को छोड़कर कहाँ आ गया! सौहार्द के स्थान पर कुचक्र, फूलों के प्रतिनिधि काँटे, प्रेम के स्थान में भय। ज्ञानामृत के परिवर्तन में कुमंत्रणा। पतन और कहाँ तक हो सकता है! (UPSC 1995, 20 Marks, )
मेरा साम्राज्य करुणा का था, मेरा धर्म प्रेम का था। आनन्द-समुद्र में शान्ति-द्वीप का अधिवासी ब्राह्मण मैं, चन्द्र-सूर्य-नक्षत्र मेरे दीप थे, अनन्त आकाश वितान था, शस्यश्यामला कोमला विश्वम्भरा मेरी शय्या थी। बौद्धिक विनोद कर्म था, सन्तोष धन था। उस अपनी, ब्राह्मण की, जन्म-भूमि को छोड़कर कहाँ आ गया! सौहार्द के स्थान पर कुचक्र, फूलों के प्रतिनिधि काँटे, प्रेम के स्थान में भय। ज्ञानामृत के परिवर्तन में कुमंत्रणा। पतन और कहाँ तक हो सकता है!Enroll Now
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मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहा हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है। (UPSC 1993, 20 Marks, )
मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहा हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।Enroll Now
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मुझे इस देश में जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है। यहाँ के श्यामल-कुंज, घने जंगल सरिताओं की माला पहने हुए शैल-श्रेणी, हरी-भरी वर्षा, गर्मी की चाँदनी, शीत-काल की धूप, और भोले कृषक तथा सरला कृषक-बालिकाएँ, बाल्यकाल की सुनी हुई कहानियों की जीवित प्रतिमाएँ है। यह स्वप्नों का देश, यह त्याग और ज्ञान का पालना, यह प्रेम की रंगभूमि—भारतभूमि क्या भुलायी जा सकती है? कदापि नहीं। अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है; यह भारत मानवता की जन्मभूमि है। (UPSC 1992, 20 Marks, )
मुझे इस देश में जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है। यहाँ के श्यामल-कुंज, घने जंगल सरिताओं की माला पहने हुए शैल-श्रेणी, हरी-भरी वर्षा, गर्मी की चाँदनी, शीत-काल की धूप, और भोले कृषक तथा सरला कृषक-बालिकाएँ, बाल्यकाल की सुनी हुई कहानियों की जीवित प्रतिमाएँ है। यह स्वप्नों का देश, यह त्याग और ज्ञान का पालना, यह प्रेम की रंगभूमि—भारतभूमि क्या भुलायी जा सकती है? कदापि नहीं। अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है; यह भारत मानवता की जन्मभूमि है।Enroll Now
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परन्तु संसार—कठोर संसार ने सिखा दिया है कि तुम्हें परखना होगा। समझदारी आने पर यौवन चला जाता है—जब तक माला गूँथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चञ्चल स्थिति तब तक उस श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। (UPSC 1991, 20 Marks, )
परन्तु संसार—कठोर संसार ने सिखा दिया है कि तुम्हें परखना होगा। समझदारी आने पर यौवन चला जाता है—जब तक माला गूँथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चञ्चल स्थिति तब तक उस श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है।Enroll Now
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‘तुम मालव हो और यह मागध, यही तुम्हारे मान का अवसान है न? परन्तु आत्म-सम्मान इतने ही से सन्तुष्ट नहीं होगा। मालव और मागध को भूलकर जब तुम आर्यावर्त्त का नाम लोगे, तभी वह मिलेगा। क्या तुम नहीं देखते हो कि आगामी दिवसों में, आर्यावर्त्त के सब स्वतंत्र राष्ट्र एक के अनंतर दूसरे विदेशी विजेता से पददलित होंगे?’ (UPSC 1990, 20 Marks, )
‘तुम मालव हो और यह मागध, यही तुम्हारे मान का अवसान है न? परन्तु आत्म-सम्मान इतने ही से सन्तुष्ट नहीं होगा। मालव और मागध को भूलकर जब तुम आर्यावर्त्त का नाम लोगे, तभी वह मिलेगा। क्या तुम नहीं देखते हो कि आगामी दिवसों में, आर्यावर्त्त के सब स्वतंत्र राष्ट्र एक के अनंतर दूसरे विदेशी विजेता से पददलित होंगे?’Enroll Now
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मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है। (UPSC 1989, 20 Marks, )
मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।Enroll Now
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चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम! (UPSC 1988, 20 Marks, )
चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम!Enroll Now
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अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं। (UPSC 1987, 20 Marks, )
अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं।Enroll Now
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मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की? (UPSC 1985, 20 Marks, )
मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की?Enroll Now
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समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता। (UPSC 1984, 20 Marks, )
समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता।Enroll Now
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समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं। (UPSC 1982, 20 Marks, )
समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं।Enroll Now
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मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है। (UPSC 1989, 20 Marks, )
मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।Enroll Now
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चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम! (UPSC 1988, 20 Marks, )
चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम!Enroll Now
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अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं। (UPSC 1987, 20 Marks, )
अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं।Enroll Now
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मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की? (UPSC 1985, 20 Marks, )
मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की?Enroll Now
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समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता।Enroll Now
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समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं।Enroll Now
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