बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल वह विश्व मुकुट सा उज्ज्वलतम शशिखंड सदृश था स्पष्ट भाल दो पद्म-पलाश चषक-से दृग देते अनुराग विराग ढाल गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश वह आनन जिसमें भरा गान वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान था एक हाथ में कर्म-कलश वसुधा-जीवनरस-सार लिये दूसरा विचारों के नभ को या मधुर अभय अवलंब दिये त्रिवली थी त्रिगुण-तरंगमयी, आलोकवसन लिपटा अराल⁠⁠⁠ चरणों में थी गति भरी ताल ।। (UPSC 1982, 20 Marks, )

बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल वह विश्व मुकुट सा उज्ज्वलतम शशिखंड सदृश था स्पष्ट भाल दो पद्म-पलाश चषक-से दृग देते अनुराग विराग ढाल गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश वह आनन जिसमें भरा गान वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान था एक हाथ में कर्म-कलश वसुधा-जीवनरस-सार लिये दूसरा विचारों के नभ को या मधुर अभय अवलंब दिये त्रिवली थी त्रिगुण-तरंगमयी, आलोकवसन लिपटा अराल⁠⁠⁠ चरणों में थी गति भरी ताल ।।
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नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पदतल में, पीपूष-स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा। संघर्ष सदा उर-अन्तर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा। आंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा। (UPSC 1981, 20 Marks, )

नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पदतल में, पीपूष-स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा। संघर्ष सदा उर-अन्तर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा। आंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा।
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“उस हिमालय के ऊपर प्रभात-सूर्य की सुनहरी प्रभा से आलोकित प्रभा का, पीले पोखराज का सा, एक महल था। उसी से नवनीत की पुतली झाँक कर विश्व को देखती थी। वह हिम की शीतलता से सुसंगठित थी। सुनहरी किरणों को जलन हुई। तप्त होकर महल को गला दिया। पुतली! उसका मंगल हो, हमारे अश्रु की शीतलता उसे सुरक्षित रखे। कल्पना की भाषा के पंख गिर जाते हैं, मौन-नीड़ में निवास करने दो। छेड़ो मत मित्र!” (UPSC 2018, 10 Marks, )

“उस हिमालय के ऊपर प्रभात-सूर्य की सुनहरी प्रभा से आलोकित प्रभा का, पीले पोखराज का सा, एक महल था। उसी से नवनीत की पुतली झाँक कर विश्व को देखती थी। वह हिम की शीतलता से सुसंगठित थी। सुनहरी किरणों को जलन हुई। तप्त होकर महल को गला दिया। पुतली! उसका मंगल हो, हमारे अश्रु की शीतलता उसे सुरक्षित रखे। कल्पना की भाषा के पंख गिर जाते हैं, मौन-नीड़ में निवास करने दो। छेड़ो मत मित्र!”
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“राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ इसका दायित्व भी बढ़ गया है। पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को अब अनायास और अवश्य अपनी शरण में आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।” (UPSC 2015, 10 Marks, )

“राष्ट्रनीति, दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ इसका दायित्व भी बढ़ गया है। पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को अब अनायास और अवश्य अपनी शरण में आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।”
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“कविता करना अनन्त पुण्य का फल है। इस दुराशा और अनन्त उत्कण्ठा से कवि-जीवन व्यतीत करने की इच्छा हुई। संसार के समस्त अभावों को असन्तोष कहकर हृदय को धोखा देता रहा। परन्तु कैसी विडम्बना! लक्ष्मी के लालों का भ्रू-भंग और क्षोभ की ज्वाला के अतिरिक्त मिला क्या! - एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन, जो दूसरों की दया में अपना अस्तित्व रखता है!” (UPSC 2008, 20 Marks, )

“कविता करना अनन्त पुण्य का फल है। इस दुराशा और अनन्त उत्कण्ठा से कवि-जीवन व्यतीत करने की इच्छा हुई। संसार के समस्त अभावों को असन्तोष कहकर हृदय को धोखा देता रहा। परन्तु कैसी विडम्बना! लक्ष्मी के लालों का भ्रू-भंग और क्षोभ की ज्वाला के अतिरिक्त मिला क्या! - एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन, जो दूसरों की दया में अपना अस्तित्व रखता है!”
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राष्ट्रनीति दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद को समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ उसका दायित्व भी बढ़ गया है; पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को वे अब अनायास और अवश्य अपनी शरण आने वाली वस्तु समझने लगे हैं। (UPSC 2002, 20 Marks, )

राष्ट्रनीति दार्शनिकता और कल्पना का लोक नहीं है। इस कठोर प्रत्यक्षवाद को समस्या बड़ी कठिन होती है। गुप्त साम्राज्य की उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ उसका दायित्व भी बढ़ गया है; पर उस बोझ को उठाने के लिए गुप्तकुल के शासक प्रस्तुत नहीं, क्योंकि साम्राज्य-लक्ष्मी को वे अब अनायास और अवश्य अपनी शरण आने वाली वस्तु समझने लगे हैं।
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परमात्मशक्ति का उत्थान पतन और पतन का उत्थान किया करती है। इसी का नाम है दम्भ का दमन। स्वयं प्रकृति की नियामिका शक्ति कृत्रिम स्वार्थसिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसा कार्य कोई जानबूझ कर नहीं करता, और न उसका प्रत्यक्ष में कोई कड़ा कारण दिखाई पड़ता है। उलट-फेर को शान्त और विचारशील महापुरुष ही समझते पर उसे रोकना उनके वश की भी बात नहीं है, क्योंकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है। (UPSC 2001, 20 Marks, )

परमात्मशक्ति का उत्थान पतन और पतन का उत्थान किया करती है। इसी का नाम है दम्भ का दमन। स्वयं प्रकृति की नियामिका शक्ति कृत्रिम स्वार्थसिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसा कार्य कोई जानबूझ कर नहीं करता, और न उसका प्रत्यक्ष में कोई कड़ा कारण दिखाई पड़ता है। उलट-फेर को शान्त और विचारशील महापुरुष ही समझते पर उसे रोकना उनके वश की भी बात नहीं है, क्योंकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है।
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मेरा साम्राज्य करुणा का था, मेरा धर्म प्रेम का था। आनन्द-समुद्र में शान्ति-द्वीप का अधिवासी ब्राह्मण मैं, चन्द्र-सूर्य-नक्षत्र मेरे दीप थे, अनन्त आकाश वितान था, शस्यश्यामला कोमला विश्वम्भरा मेरी शय्या थी। बौद्धिक विनोद कर्म था, सन्तोष धन था। उस अपनी, ब्राह्मण की, जन्म-भूमि को छोड़कर कहाँ आ गया! सौहार्द के स्थान पर कुचक्र, फूलों के प्रतिनिधि काँटे, प्रेम के स्थान में भय। ज्ञानामृत के परिवर्तन में कुमंत्रणा। पतन और कहाँ तक हो सकता है! (UPSC 1995, 20 Marks, )

मेरा साम्राज्य करुणा का था, मेरा धर्म प्रेम का था। आनन्द-समुद्र में शान्ति-द्वीप का अधिवासी ब्राह्मण मैं, चन्द्र-सूर्य-नक्षत्र मेरे दीप थे, अनन्त आकाश वितान था, शस्यश्यामला कोमला विश्वम्भरा मेरी शय्या थी। बौद्धिक विनोद कर्म था, सन्तोष धन था। उस अपनी, ब्राह्मण की, जन्म-भूमि को छोड़कर कहाँ आ गया! सौहार्द के स्थान पर कुचक्र, फूलों के प्रतिनिधि काँटे, प्रेम के स्थान में भय। ज्ञानामृत के परिवर्तन में कुमंत्रणा। पतन और कहाँ तक हो सकता है!
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मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहा हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है। (UPSC 1993, 20 Marks, )

मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहा हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
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मुझे इस देश में जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है। यहाँ के श्यामल-कुंज, घने जंगल सरिताओं की माला पहने हुए शैल-श्रेणी, हरी-भरी वर्षा, गर्मी की चाँदनी, शीत-काल की धूप, और भोले कृषक तथा सरला कृषक-बालिकाएँ, बाल्यकाल की सुनी हुई कहानियों की जीवित प्रतिमाएँ है। यह स्वप्नों का देश, यह त्याग और ज्ञान का पालना, यह प्रेम की रंगभूमि—भारतभूमि क्या भुलायी जा सकती है? कदापि नहीं। अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है; यह भारत मानवता की जन्मभूमि है। (UPSC 1992, 20 Marks, )

मुझे इस देश में जन्मभूमि के समान स्नेह होता जा रहा है। यहाँ के श्यामल-कुंज, घने जंगल सरिताओं की माला पहने हुए शैल-श्रेणी, हरी-भरी वर्षा, गर्मी की चाँदनी, शीत-काल की धूप, और भोले कृषक तथा सरला कृषक-बालिकाएँ, बाल्यकाल की सुनी हुई कहानियों की जीवित प्रतिमाएँ है। यह स्वप्नों का देश, यह त्याग और ज्ञान का पालना, यह प्रेम की रंगभूमि—भारतभूमि क्या भुलायी जा सकती है? कदापि नहीं। अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है; यह भारत मानवता की जन्मभूमि है।
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परन्तु संसार—कठोर संसार ने सिखा दिया है कि तुम्हें परखना होगा। समझदारी आने पर यौवन चला जाता है—जब तक माला गूँथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चञ्चल स्थिति तब तक उस श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। (UPSC 1991, 20 Marks, )

परन्तु संसार—कठोर संसार ने सिखा दिया है कि तुम्हें परखना होगा। समझदारी आने पर यौवन चला जाता है—जब तक माला गूँथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चञ्चल स्थिति तब तक उस श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है।
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‘तुम मालव हो और यह मागध, यही तुम्हारे मान का अवसान है न? परन्तु आत्म-सम्मान इतने ही से सन्तुष्ट नहीं होगा। मालव और मागध को भूलकर जब तुम आर्यावर्त्त का नाम लोगे, तभी वह मिलेगा। क्या तुम नहीं देखते हो कि आगामी दिवसों में, आर्यावर्त्त के सब स्वतंत्र राष्ट्र एक के अनंतर दूसरे विदेशी विजेता से पददलित होंगे?’ (UPSC 1990, 20 Marks, )

‘तुम मालव हो और यह मागध, यही तुम्हारे मान का अवसान है न? परन्तु आत्म-सम्मान इतने ही से सन्तुष्ट नहीं होगा। मालव और मागध को भूलकर जब तुम आर्यावर्त्त का नाम लोगे, तभी वह मिलेगा। क्या तुम नहीं देखते हो कि आगामी दिवसों में, आर्यावर्त्त के सब स्वतंत्र राष्ट्र एक के अनंतर दूसरे विदेशी विजेता से पददलित होंगे?’
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मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है। (UPSC 1989, 20 Marks, )

मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
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चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम! (UPSC 1988, 20 Marks, )

चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम!
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अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं। (UPSC 1987, 20 Marks, )

अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं।
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समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता। (UPSC 1984, 20 Marks, )

समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता।
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समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं। (UPSC 1982, 20 Marks, )

समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं।
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मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है। (UPSC 1989, 20 Marks, )

मेरी आवश्यकताएँ परमात्मा की विभूति प्रकृति पूरी करती हैं। उसके रहते दूसरों का शासन कैसा? समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई हैं। मृत्यु के द्वारा वहीं इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-मूल खाकर अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझको डरने का कारण है।
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चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम! (UPSC 1988, 20 Marks, )

चतुर सेवक के समान संसार को जगाकर अन्धकार हट गया। रजनी की निस्तब्धता काकली से चंचल हो उठी है। नीला आकाश स्वच्छ होने लगा है, या निद्राक्लान्त निशा, उषा की शुभ्र चादर ओढ़कर नींद की गोद में लेटने चली है। यह जागरण का अवसर है। जागरण का अर्थ है कर्मक्षेत्र में अवतीर्ण होना। और कर्मक्षेत्र क्या है? जीवन-संग्राम!
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अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं। (UPSC 1987, 20 Marks, )

अकस्मात् जीवन-कानन में, एक राका-रजनी की छाया में छिपकर मधुर वसन्त घुस आता है। शरीर की सब क्यारियाँ हरी-भरी हो जाती हैं। सौन्दर्य का कोकिल—‘कौन?’ कहकर सब को रोकने-टोकने लगता है, पुकारने लगता है। राजकुमारी! फिर उसी में प्रेम का मुकुल लग जाता है, आँसू-भरी स्मृतियाँ मकरन्द-सी उसमें छिपी रहती हैं।
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समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता। (UPSC 1984, 20 Marks, )

समस्त आलोक, चैतन्य और प्राणशक्ति, प्रभु की दी हुई है। मृत्यु के द्वारा वही इसको लौटा लेता है। जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्धा से बढ़कर दूसरा दम्भ नहीं। मैं फल-पूल खाकर, अंजलि से जलपान कर, तृण-शय्या पर आँख बन्द किए सो रहता हूँ। न मुझसे किसी को डर है और न मुझसे किसी को डरने का कारण है। तुम यदि हठात मुझे ले जाना चाहो तो केवल मेरे शरीर को ले जा सकते हो, मेरी स्वतंत्र आत्मा पर तुम्हारे देवपुत्र का भी अधिकार नहीं हो सकता।
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समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं। (UPSC 1982, 20 Marks, )

समझदारी आने पर यौवन चला जाती है—जब तक माला गूंथी जाती है, तब तक फूल कुम्हला जाते हैं। जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, बनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य हृदय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रख सकता। मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक श्यामल कोमल हृदय को मरुभूमि बना देती है। यही दो विषमताएँ हैं।
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