मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ, मैं शालीनता सिखाती हूँ, नूपुर-सी लिपट मनाती हूँ। लाली बन सरल कपोलों में, आँखों में अंजन-सी लगती, कुंचित अलकों-सी घुंघराली, मन की मरोर बन कर जगती। (UPSC 1997, 20 Marks, )

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