"तुमने लिखा था कि एक दोष गुणों के समूह में उसी प्रकार छिप जाता है जैसे इन्दु की किरणों में कलंक; परन्तु दारिद्रय नहीं छिपता, सौ-सौ गुणों में भी नहीं छिपता। नहीं, छिपता ही नहीं, सौ-सौ गुणों को छा लेता है-एक-एक करके नष्ट कर देता है।"
(UPSC 2010, 20 Marks, )