परमात्मशक्ति का उत्थान पतन और पतन का उत्थान किया करती है। इसी का नाम है दम्भ का दमन। स्वयं प्रकृति की नियामिका शक्ति कृत्रिम स्वार्थसिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसा कार्य कोई जानबूझ कर नहीं करता, और न उसका प्रत्यक्ष में कोई कड़ा कारण दिखाई पड़ता है। उलट-फेर को शान्त और विचारशील महापुरुष ही समझते पर उसे रोकना उनके वश की भी बात नहीं है, क्योंकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है।
(UPSC 2001, 20 Marks, )
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परमात्मशक्ति का उत्थान पतन और पतन का उत्थान किया करती है। इसी का नाम है दम्भ का दमन। स्वयं प्रकृति की नियामिका शक्ति कृत्रिम स्वार्थसिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसा कार्य कोई जानबूझ कर नहीं करता, और न उसका प्रत्यक्ष में कोई कड़ा कारण दिखाई पड़ता है। उलट-फेर को शान्त और विचारशील महापुरुष ही समझते पर उसे रोकना उनके वश की भी बात नहीं है, क्योंकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है।
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