संदेसनि मधुवन-कूप भरे। जो कोउ पथिक गए हैं ह्यां'तें फिरि नहि अवन करे ॥ कैव स्याम सिखाय समोधे कैवै बीच मरे ? अपने नहिं पठवत नन्दनन्दन उमरेउ फेरि धरे ॥ मसि खूँटी कागद जल भीजें, सर दव लागि जरे। पाती लिखें कहो क्यों करि जो पलक कपाट अरे ?॥ (UPSC 1988, 20 Marks, )

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