बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैँ। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजै।। बृथा बहति जमुना, खग बोलत बृथा कमल फुलैं अलि ‘गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनी दधिसुत किरन भानु भई भुँजैं।। ए, ऊधो, कहियो माधव सों विरह कदन करि मारत लुँजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यौँ गुँजैं। (UPSC 1997, 20 Marks, )

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