देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति मेरे वसंत की प्रथम गीति – शृंगार, रहा जो निराकार, रह कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना माही। (UPSC 1993, 20 Marks, )

Enroll Now