नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पदतल में, पीपूष-स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा। संघर्ष सदा उर-अन्तर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा। आंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा। (UPSC 1981, 20 Marks, )

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