दुःखों के दागों को तमगों-सा पहना, अपने ही खयालों में दिन-रात रहना, असंग बुद्धि व अकेले में सहना, जिंदगी निष्क्रिय बन गयी तलघर, अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया! (UPSC 1987, 20 Marks, )

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