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महत्ता के चरण में था विषादाकुल मन ! मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर बताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्य, उसकी महत्ता ! (UPSC 2019, 10 Marks, )
महत्ता के चरण में था विषादाकुल मन ! मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर बताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्य, उसकी महत्ता !View Answer
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पिस गया वह भीतरी औ' बाहरी दो कठिन पाटों वीच, ऐसी ट्रेजिडी है नीच ! बावड़ी में वह स्वयं पागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहा वह कोठरी में किस तरह अपना गणित करता रहा औ' मर गया। (UPSC 2017, 10 Marks, )
पिस गया वह भीतरी औ' बाहरी दो कठिन पाटों वीच, ऐसी ट्रेजिडी है नीच ! बावड़ी में वह स्वयं पागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहा वह कोठरी में किस तरह अपना गणित करता रहा औ' मर गया।View Answer
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थे गरजती, गूँजती आन्दोलिता गहराइयों से उठ रहीं ध्वनियाँ, अतः उद्भ्रान्त शब्दों के नये आवर्त में हर शब्द निज प्रति-शब्द को भी काटता, वह रूप अपने बिम्ब से ही जूझ विकृताकार-कृति है बन रहा, ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ।। (UPSC 2012, 12 Marks, )
थे गरजती, गूँजती आन्दोलिता गहराइयों से उठ रहीं ध्वनियाँ, अतः उद्भ्रान्त शब्दों के नये आवर्त में हर शब्द निज प्रति-शब्द को भी काटता, वह रूप अपने बिम्ब से ही जूझ विकृताकार-कृति है बन रहा, ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ।।Enroll Now
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किन्तु, गहरी बावड़ी को भीतरी दीवार पर तिरछी गिरी रवि-रश्मि के उड़ते हुए परमाणु, जब तल तक पहुंचते हैं कभी तब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य ने झुककर “नमस्ते” कर दिया।। (UPSC 2004, 20 Marks, )
किन्तु, गहरी बावड़ी को भीतरी दीवार पर तिरछी गिरी रवि-रश्मि के उड़ते हुए परमाणु, जब तल तक पहुंचते हैं कभी तब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य ने झुककर “नमस्ते” कर दिया।।Enroll Now
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एक-एक वस्तु या एक-एक प्राणाग्नि-बम है ये परमास्त्र है, प्रक्षेपास्त्र है, यम है। शून्याकाश में से होते हुए वे अरे, अरि पर ही टूटे पड़े अनिवार। यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हाँ भई। कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी॥ (UPSC 1999, 20 Marks, )
एक-एक वस्तु या एक-एक प्राणाग्नि-बम है ये परमास्त्र है, प्रक्षेपास्त्र है, यम है। शून्याकाश में से होते हुए वे अरे, अरि पर ही टूटे पड़े अनिवार। यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हाँ भई। कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी॥Enroll Now
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पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव, हाथों से महसूस अनुभव करता हूँ दुनियाँ, मस्तक अनुभव करता है आकाश, दिल में तड़पता है अन्धेरे का अन्दाज, आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगती, केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी। आत्मा में, भीषण सत-चित्-वेदना जल उठी, दहकी। विचार हो गए विचरण-सहचर। (UPSC 1997, 20 Marks, )
पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव, हाथों से महसूस अनुभव करता हूँ दुनियाँ, मस्तक अनुभव करता है आकाश, दिल में तड़पता है अन्धेरे का अन्दाज, आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगती, केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी। आत्मा में, भीषण सत-चित्-वेदना जल उठी, दहकी। विचार हो गए विचरण-सहचर।Enroll Now
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सचमुच, मुझको तो जिंदगी-सरहद सूर्यों के प्रांगण पार भी जाती-सी दीखती! मैं परिणत हूँ कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ — वर्तमान समाज चल नहीं सकता, स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी छल नहीं सकता मुक्ति के मन को, जन को। (UPSC 1996, 20 Marks, )
सचमुच, मुझको तो जिंदगी-सरहद सूर्यों के प्रांगण पार भी जाती-सी दीखती! मैं परिणत हूँ कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ — वर्तमान समाज चल नहीं सकता, स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी छल नहीं सकता मुक्ति के मन को, जन को।Enroll Now
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विचित्र प्रोसेशन, गंभीर क्विक मार्च... कलाबत्तूवाली काला ज़रीदार ड्रेस पहने चमकदार बैंड-दल— अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति आँतों के जालों से, बाजे वे दमकते हैं भयंकर गंभीर गीत-स्वप्न-तरंगें उभारते रहते, ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर। (UPSC 1995, 20 Marks, )
विचित्र प्रोसेशन, गंभीर क्विक मार्च... कलाबत्तूवाली काला ज़रीदार ड्रेस पहने चमकदार बैंड-दल— अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति आँतों के जालों से, बाजे वे दमकते हैं भयंकर गंभीर गीत-स्वप्न-तरंगें उभारते रहते, ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर।Enroll Now
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अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब। पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार तब कहीं देखने मिलेगी हमको नीली झील की लहरीली थाहें जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता अरुण कमल एक — धँसना ही होगा झील के हिम-शीत सुनील जल में। (UPSC 1994, 20 Marks, )
अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब। पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार तब कहीं देखने मिलेगी हमको नीली झील की लहरीली थाहें जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता अरुण कमल एक — धँसना ही होगा झील के हिम-शीत सुनील जल में।Enroll Now
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वह बिठा देता है तुंग शिखर के खतरनाक, खुरदरे कगार-तट पर शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको। कहता है - "पार करो पर्वत-संधि के गहवर, रस्सी के पुल पर चलकर दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो" अरे आई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा, मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से। (UPSC 1992, 20 Marks, )
वह बिठा देता है तुंग शिखर के खतरनाक, खुरदरे कगार-तट पर शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको। कहता है - "पार करो पर्वत-संधि के गहवर, रस्सी के पुल पर चलकर दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो" अरे आई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा, मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से।Enroll Now
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बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये, करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये, बन गये पत्थर, बहुत-बहुत ज़्यादा लिया, दिया बहुत-बहुत कम, मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम! (UPSC 1990, 20 Marks, )
बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये, करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये, बन गये पत्थर, बहुत-बहुत ज़्यादा लिया, दिया बहुत-बहुत कम, मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!Enroll Now
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दुःखों के दागों को तमगों-सा पहना, अपने ही खयालों में दिन-रात रहना, असंग बुद्धि व अकेले में सहना, जिंदगी निष्क्रिय बन गयी तलघर, अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया! (UPSC 1987, 20 Marks, )
दुःखों के दागों को तमगों-सा पहना, अपने ही खयालों में दिन-रात रहना, असंग बुद्धि व अकेले में सहना, जिंदगी निष्क्रिय बन गयी तलघर, अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!Enroll Now
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पर्चा पढ़ते हुए उड़ता हूँ हवा में, चक्रवात-गतियों में घूमता हूँ नभ पर, ज़मीन पर एक साथ सर्वत्र सचेत उपस्थित। प्रत्येक स्थान पर लगा हूँ मैं काम में, प्रत्येक चौराहे, दुराहे व राहों के मोड़ पर सड़क पर खड़ा हूँ, मानता हूँ, मानता हूँ, मनवाता अड़ा हूँ! (UPSC 1985, 20 Marks, )
पर्चा पढ़ते हुए उड़ता हूँ हवा में, चक्रवात-गतियों में घूमता हूँ नभ पर, ज़मीन पर एक साथ सर्वत्र सचेत उपस्थित। प्रत्येक स्थान पर लगा हूँ मैं काम में, प्रत्येक चौराहे, दुराहे व राहों के मोड़ पर सड़क पर खड़ा हूँ, मानता हूँ, मानता हूँ, मनवाता अड़ा हूँ!Enroll Now
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वह रहस्यमय व्यक्ति अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है पूर्ण अवस्था वह निज-संभावनाओं निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की, मेरे परिपूर्ण की आविर्भाव हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह, आत्मा की प्रतिमा। (UPSC 1984, 20 Marks, )
वह रहस्यमय व्यक्ति अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है पूर्ण अवस्था वह निज-संभावनाओं निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की, मेरे परिपूर्ण की आविर्भाव हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह, आत्मा की प्रतिमा।Enroll Now
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बौद्धिक वर्ग है कीतदास, किराये के विचारों का उद्भास। बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियां पुत गयीं। नपुंसक श्रद्धा सड़क के नीचे गटर में छिप गयी। कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी। (UPSC 1981, 20 Marks, )
बौद्धिक वर्ग है कीतदास, किराये के विचारों का उद्भास। बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियां पुत गयीं। नपुंसक श्रद्धा सड़क के नीचे गटर में छिप गयी। कहीं आग लग गयी, कहीं गोली चल गयी।Enroll Now
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