अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रकट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हट धारा। भँवर कूबरी - बचन - प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली विपतिबारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात सव साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाँची॥ गहि पद विनय कीन्हि बेठारी। जनि दिन-कर-कुल होसि कुठारी॥
(UPSC 1987, 20 Marks, )
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अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रकट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ दोउ बर कूल कठिन हट धारा। भँवर कूबरी - बचन - प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली विपतिबारिधि अनुकूला॥ लखी नरेस बात सव साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाँची॥ गहि पद विनय कीन्हि बेठारी। जनि दिन-कर-कुल होसि कुठारी॥
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