चौंसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविंद नांहिं॥ सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥ समंदर लागी आगि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि कबीरा जागि, मंछी रूषाँ चढ़ि गई॥ (UPSC 1982, 20 Marks, )

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