आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ विषम विषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भंवर अवतं अपारा॥ केवट बुध विद्या बड़ नावा। सकर्हिं न खेड एेक नहिं आवा॥ बनचर कोल किरात विचारे। धके विलोकि पथिक हिय हारे॥ आश्रम उदधि मिली जव जाई। मनहुं उठेड अंबुधि अकुलाई॥ सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥ भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥ (UPSC 1994, 20 Marks, )

Enroll Now