“धिक्‌ जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राम का जो नं थका, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय, बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युत्‌-गति हतचेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन। (UPSC 2007, 20 Marks, )

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