मनुष्य-समाज समय की नदी के तट पर स्थित वन के समान है। समय की नदी में आने वाले प्लावन इस वन की भूमि को उर्वरा करते रहते हैं। इसी प्रकार सागल के नगर-समाज में परिवर्तन के अनेक प्लावन आये और भावनाओं और अनुभूतियों के उर्वर स्तर समाज की भूमि पर छोड़ते गये।
(UPSC 2012, 12 Marks, )