अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब। पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार तब कहीं देखने मिलेगी हमको नीली झील की लहरीली थाहें जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता अरुण कमल एक — धँसना ही होगा झील के हिम-शीत सुनील जल में।
(UPSC 1994, 20 Marks, )