अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी ! अरी आधि, मधुमय अभिशाप हृदय-गगन में धूमकेतु-सी, पुण्य-सृष्टि में सुंदर पाप। मनन करावेगी तू कितना? उस निश्चित जाति का जीव अमर मरेगा क्या? तू कितनी गहरी डाल रही है नींव। (UPSC 1985, 20 Marks, )

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