सिय-राम-सरूप अगाध अन्प बिलोचन मीनन को जलु है। श्रुति रामकथा, मुख राम को नाम, हिये पुनि रामहिं को थलु है॥ मति रामहि सो; गति रामहिं सों, रति राम सों, रामहिं को बलु है। सबकी न कहैं तुलसी के मते इतना जग जीवन को फलु है॥ (UPSC 1980, 20 Marks, )

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