बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल वह विश्व मुकुट सा उज्ज्वलतम शशिखंड सदृश था स्पष्ट भाल दो पद्म-पलाश चषक-से दृग देते अनुराग विराग ढाल गुंजरित मधुप से मुकुल सदृश वह आनन जिसमें भरा गान वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान था एक हाथ में कर्म-कलश वसुधा-जीवनरस-सार लिये दूसरा विचारों के नभ को या मधुर अभय अवलंब दिये त्रिवली थी त्रिगुण-तरंगमयी, आलोकवसन लिपटा अराल⁠⁠⁠ चरणों में थी गति भरी ताल ।। (UPSC 1982, 20 Marks, )

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