पर उस स्पन्दित. सन्नाटे में मोन प्रियवंद साध रहा था वीराग- नहीं स्वयं अपने को शोध रहा था। सघन निविड में वह अपने को। सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को। कौन प्रियंवद है कि दंभ कर। इस अभिमंत्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?।। (UPSC 2001, 20 Marks, )

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