सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था: वह तो सब कुछ की तथता थी महाशून्य, वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सब में गाता है। (UPSC 2025, 10 Marks, )
सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था: वह तो सब कुछ की तथता थी महाशून्य, वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सब में गाता है।View Answer
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अलस अँगड़ाई लेकर मानो जाग उठी थी वीणा : किलक उठे थे स्वर-शिशु। नीरव पद रखता जालिक मायावी सधे करों से धीरे-धीरे डाल रहा था जाल हेम तारों का। (UPSC 2020, 15 Marks, )
अलस अँगड़ाई लेकर मानो जाग उठी थी वीणा : किलक उठे थे स्वर-शिशु। नीरव पद रखता जालिक मायावी सधे करों से धीरे-धीरे डाल रहा था जाल हेम तारों का।View Answer
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सबने भी अलग-अलग संगीत सुना इसको वह कृपा वाक्य था प्रभुओं का उसको आतंक मुक्ति का आश्वासन इसको वह भरी तिजोरी में सोने की खनक। उसे बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुशबू। किसी एक को नयी वधू की सहमी सी पायल ध्वनि किसी दूसरे को शिशु की किलकारी 'एक किसी को जाल फँसी मछली की तड़पन--एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की। 'एक तीसरे को मंडी की ठेलमठेल, ग्राहकों की आस्पर्धा भली बोलियाँ, चौथे को मंदिर की ताल-युक्त घंटा-ध्वनि। और पाँचवें को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोर और छठें को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की अविराम थपक 'बटिया पर चमरौधे की रुंधी चाम सातवें के लिए-- और आठवें को कुलिया की कटी मेड़ से बहते जल की छुल-छुल। इसे गमक नद्टिन की ऐड़ी के घुँघरू की। उसे युद्ध का ढोल। इसे संझा-गोधूली की लघु टुन-टुन उसे प्रलय का डमरू नाद। इसको जीवन की पहली अंगड़ाई पर उसको महाजृंभ विकराल काल सब डूबे, तिरे, झिपे जागे हो रहे वशंबद स्तब्ध इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी।। (UPSC 2015, 10 Marks, )
सबने भी अलग-अलग संगीत सुना इसको वह कृपा वाक्य था प्रभुओं का उसको आतंक मुक्ति का आश्वासन इसको वह भरी तिजोरी में सोने की खनक। उसे बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुशबू। किसी एक को नयी वधू की सहमी सी पायल ध्वनि किसी दूसरे को शिशु की किलकारी 'एक किसी को जाल फँसी मछली की तड़पन--एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की। 'एक तीसरे को मंडी की ठेलमठेल, ग्राहकों की आस्पर्धा भली बोलियाँ, चौथे को मंदिर की ताल-युक्त घंटा-ध्वनि। और पाँचवें को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोर और छठें को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की अविराम थपक 'बटिया पर चमरौधे की रुंधी चाम सातवें के लिए-- और आठवें को कुलिया की कटी मेड़ से बहते जल की छुल-छुल। इसे गमक नद्टिन की ऐड़ी के घुँघरू की। उसे युद्ध का ढोल। इसे संझा-गोधूली की लघु टुन-टुन उसे प्रलय का डमरू नाद। इसको जीवन की पहली अंगड़ाई पर उसको महाजृंभ विकराल काल सब डूबे, तिरे, झिपे जागे हो रहे वशंबद स्तब्ध इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी।।View Answer
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“श्रेय नहीं कुछ मेरा: मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब-कुछ को सौंप दिया था - सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था: वह तो सब-कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सब में गाता है। (UPSC 2014, 10 Marks, )
“श्रेय नहीं कुछ मेरा: मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब-कुछ को सौंप दिया था - सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था: वह तो सब-कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सब में गाता है।View Answer
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“ओ विशाल तरु! शत-सहस्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा, कितनी बरसातों, कितने खद्योतों ने आरती उतारी दिन भौरे कर गये गुंजरित, रातों में झिल्ली ने अनथक मंगल-गान सुनाये, सांझ-सवेरे अनगिन अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा-काकलि डाली-डाली को कँपा गयी -। (UPSC 2010, 20 Marks, )
“ओ विशाल तरु! शत-सहस्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा, कितनी बरसातों, कितने खद्योतों ने आरती उतारी दिन भौरे कर गये गुंजरित, रातों में झिल्ली ने अनथक मंगल-गान सुनाये, सांझ-सवेरे अनगिन अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा-काकलि डाली-डाली को कँपा गयी -।Enroll Now
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“श्रेय नहीं कुछ मेरा : मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब कुछ को सौंप दिया था - सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था : वह तो सब कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सबमें गाता है।“ (UPSC 2007, 20 Marks, )
“श्रेय नहीं कुछ मेरा : मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब कुछ को सौंप दिया था - सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था : वह तो सब कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सबमें गाता है।“Enroll Now
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श्रेय नहीं कुछ मेरा : मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैं ने सब-कुछ को सौंप दिया था - सुना आप ने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था : वह तो सब-कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन। सब में गाता है। (UPSC 2003, 20 Marks, )
श्रेय नहीं कुछ मेरा : मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैं ने सब-कुछ को सौंप दिया था - सुना आप ने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था : वह तो सब-कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन। सब में गाता है।Enroll Now
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पर उस स्पन्दित. सन्नाटे में मोन प्रियवंद साध रहा था वीराग- नहीं स्वयं अपने को शोध रहा था। सघन निविड में वह अपने को। सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को। कौन प्रियंवद है कि दंभ कर। इस अभिमंत्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?।। (UPSC 2001, 20 Marks, )
पर उस स्पन्दित. सन्नाटे में मोन प्रियवंद साध रहा था वीराग- नहीं स्वयं अपने को शोध रहा था। सघन निविड में वह अपने को। सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को। कौन प्रियंवद है कि दंभ कर। इस अभिमंत्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?।।Enroll Now
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