ऊधो ! प्रीति न मरन विचारै। प्रीति पतंग जरै पावक परि, जरत अंग नहि टारै।। प्रीति परेवा उड़ता गगन चढि, गिरत न आप सम्हारै। प्रीति मधुप केतकी-कुसुम बसि, कंटक आपु प्रहरै॥ प्रीति जानु जैसे पय पानी, जानि अपनपो जारै। प्रीति कुरंग नाद रस लुब्धक, तानि-तानि सर मारै॥ "प्रीति जान जननी सुत कारन, को न अपनपो हारै। सूर स्याम सो प्रीति गोपिन की, कहु कैसे निरुवारै।
(UPSC 1999, 20 Marks, )
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ऊधो ! प्रीति न मरन विचारै। प्रीति पतंग जरै पावक परि, जरत अंग नहि टारै।। प्रीति परेवा उड़ता गगन चढि, गिरत न आप सम्हारै। प्रीति मधुप केतकी-कुसुम बसि, कंटक आपु प्रहरै॥ प्रीति जानु जैसे पय पानी, जानि अपनपो जारै। प्रीति कुरंग नाद रस लुब्धक, तानि-तानि सर मारै॥ "प्रीति जान जननी सुत कारन, को न अपनपो हारै। सूर स्याम सो प्रीति गोपिन की, कहु कैसे निरुवारै।
(UPSC 1999, 20 Marks, )