विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान; यही दु:ख सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान। नित्य समरसता का अधिकार, उमड़ता कारण जलधि समान; व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”। (UPSC 1979, 20 Marks, )

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